Thursday, October 1, 2026
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Reliance Industries Vs NTPC Limited: 20 साल पुराने मुकदमे में अड़ंगा लगाने पर रिलायंस इंडस्ट्रीज पर ₹10 लाख का जुर्माना, मामला यहां जानें

मामला सारांश (At a Glance)

पहलूविवरण
मामले का नामरिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाम एनटीपीसी लिमिटेड (RIL v. NTPC)
माननीय पीठन्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा एवं न्यायमूर्ति आलोक अराधे
विवाद का विषय132 ट्रिलियन BTU प्राकृतिक गैस आपूर्ति का 20 साल पुराना अनुबंध विवाद
लगाया गया जुर्माना₹10 लाख (RIL पर, SCAORA में जमा करने का आदेश)
प्रतिनिधित्वRIL: डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी, श्याम दीवान (वरिष्ठ अधिवक्ता)
NTPC: तुषार मेहता (सॉलिसिटर जनरल)

Reliance Industries Vs NTPC Limited: सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने एनटीपीसी लिमिटेड (NTPC Limited) द्वारा प्राकृतिक गैस आपूर्ति समझौते को लेकर दायर 20 साल पुराने एक वाणिज्यिक मुकदमे (Commercial Suit) में बार-बार बाधाएं उत्पन्न करने के लिए रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) पर ₹10 लाख का जुर्माना लगाया है।

न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा (Justice PS Narasimha) और न्यायमूर्ति आलोक अराधे (Justice Alok Aradhe) की पीठ ने रिलायंस की कानूनी रणनीति पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि कंपनी के पास मुकदमा लड़ने के असीमित संसाधन हैं, जिसके जरिए उसने मुकदमे को गवाही के स्तर (Evidence Stage) से आगे बढ़ने ही नहीं दिया।

सुप्रीम कोर्ट की तल्ख और तीखी टिप्पणियां

  1. असीमित वित्तीय ताकत का दुरुपयोग:“रिलायंस इंडस्ट्रीज के पास मुकदमेबाजी करने और मामले की प्रगति में बाधा डालने की शक्ति असीमित लगती है। वित्तीय संसाधनों की कोई कमी नहीं है, और अदालतों के लंबित मामलों को निपटाने में सहायता करने की कोई बाध्यता महसूस नहीं होती। ऐसा प्रतीत होता है कि हर चरण में कोई न कोई आपत्ति उठाना RIL के लिए मुफीद (Lucrative) है, और जब ट्रायल कोर्ट उसे खारिज करता है, तो वे अपील और विशेष अनुमति याचिका (SLP) के लिए ऊपर की अदालतों में पहुंच जाते हैं।”
  2. बहु-स्तरीय मुकदमेबाजी:“यह एक ऐसी मुकदमेबाजी है जिसमें कई ‘सीज़न’ हैं और हर सीज़न कई एपिसोड्स (एपिसोडिक डिले) से भरा हुआ है।”
  3. अदालती प्रक्रिया की धीमी गति पर दुख:
    • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2019 में ही इस मुकदमे को 9 महीने के भीतर निपटाने का निर्देश दिया गया था, लेकिन 7 साल बीत जाने के बाद भी यह मामला जस का तस साक्ष्य के स्तर पर अटका हुआ है। किसी पक्षकार को इस तरह मुकदमे को खींचने देना न्याय प्रणाली पर भी एक दुखद टिप्पणी है।

🔍 मामले की पृष्ठभूमि और विवाद की जड़ (Case Background)

  • विवाद की शुरुआत (2004-2005): एनटीपीसी ने अपने पावर प्लांट्स के लिए 17 वर्षों के लिए 132 ट्रिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट (BTU) प्राकृतिक गैस आपूर्ति के लिए टेंडर निकाला था। रिलायंस के प्रस्ताव के आधार पर NTPC ने जून 2004 में लेटर ऑफ इंटेंट (LoI) जारी किया। बाद में समझौते की शर्तों पर विवाद होने पर NTPC ने 2005 में अनुबंध लागू कराने के लिए दीवानी मुकदमा दायर किया।
  • दस्तावेजों को हटाने/संशोधन का मुद्दा (Redaction Dispute): रिलायंस के गवाह बी.के. गांगुली द्वारा दायर हलफनामों में कुछ आंतरिक ईमेल और बैठकों की बातचीत शामिल की गई थी। बॉम्बे हाई कोर्ट ने अगस्त 2024 में उन हिस्सों को हलफनामे से हटाने (Redact) का आदेश दिया, जिन्हें 2019 में सुप्रीम कोर्ट पहले ही अप्रासंगिक और अस्वीकार्य घोषित कर चुका था।
  • रिलायंस की अपील: रिलायंस ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 60 (मौखिक साक्ष्य) का हवाला देकर बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिलायंस 2019 के फैसले की फिर से समीक्षा कराने की कोशिश कर रही है, जिसकी अनुमति नहीं दी जा सकती।

अदालत के निर्देश (Directions)

  1. अपील खारिज व ₹10 लाख की कॉस्ट: सुप्रीम कोर्ट ने रिलायंस की याचिका खारिज कर दी और उसे 5 सप्ताह के भीतर ₹10 लाख की राशि ‘सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन’ (SCAORA) के पास जमा कराने का आदेश दिया।
  2. जल्द सुनवाई का आदेश: बॉम्बे हाई कोर्ट को निर्देश दिया गया कि वह 2005 से लंबित इस दीवानी मुकदमे का यथाशीघ्र निपटारा करे।

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