मामला सारांश (At a Glance)
| पहलू | विवरण |
| आयोग | बेंगलुरु अर्बन जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग |
| पीठ | अध्यक्ष के. अनीता शिवकुमार एवं सदस्य सुमा अनिलकुमार |
| आदेश की तारीख | 14 जुलाई 2026 |
| मुख्य कारण | व्यावसायिक गतिविधि होने के कारण ‘उपभोक्ता’ न होना और 9,701 दिनों की अक्षम्य देरी |
| लागत/जुर्माना | कंज्यूमर वेलफेयर फंड (Consumer Welfare Fund) में ₹2,000 जमा करने का निर्देश |
Share Purchase: बेंगलुरु के 79 वर्षीय शेयर ब्रोकर के.एन. गोपालकृष्ण की 1990 में खरीदे गए शेयरों को वापस पाने की दशकों पुरानी कानूनी लड़ाई आखिरकार समाप्त हो गई।
यह आदेश आयोग की अध्यक्ष के. अनीता शिवकुमार और सदस्य सुमा अनिलकुमार की पीठ द्वारा 14 जुलाई 2026 को जारी किया गया। अदालत का समय बर्बाद करने के लिए याचिकाकर्ता पर ₹2,000 का जुर्माना भी लगाया गया। बेंगलुरु अर्बन जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (Bengaluru Urban District Consumer Disputes Redressal Commission) ने याचिका को खारिज करते हुए माना कि याचिकाकर्ता उपभोक्ता (Consumer) की श्रेणी में नहीं आता है और याचिका दायर करने में हुआ 26 वर्षों (9,701 दिनों) का विलंब पूरी तरह से अक्षम्य (Inexcusable) है।
उपभोक्ता आयोग के मुख्य कानूनी निष्कर्ष
- व्यावसायिक गतिविधि (Commercial Activity)
- आयोग ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता ने स्वयं स्वीकार किया था कि वह एक शेयर ब्रोकर है, जो ग्राहकों के लिए शेयर खरीदता और बेचता है। शेयर ट्रेडिंग एक कमर्शियल एक्टिविटी है, जो उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (Consumer Protection Act) के दायरे से बाहर है।
- अत्यधिक और अमान्य देरी (9,701 Days Delay)
- नवंबर 1990 में कारण उत्पन्न होने के बाद उपभोक्ता शिकायत दर्ज करने में 26 साल से अधिक का विलंब हुआ। आयोग ने देरी की इस लंबी अवधि के लिए दी गई दलीलों को खारिज कर दिया।
- सेवा में कोई कमी नहीं (No Deficiency in Service)
- कंपनियों (Larsen & Toubro, Reliance, और UltraTech) की ओर से सेवा में किसी भी प्रकार की कमी नहीं पाई गई। शेयर प्रमाण पत्र चोरी होना और उसके बाद का मुकदमा याचिकाकर्ता की अपनी परिस्थितियों का परिणाम था।
विवाद की पृष्ठभूमि और घटनाक्रम (Case Timeline)
- शेयरों की खरीद (15 नवंबर 1990): के.एन. गोपालकृष्ण ने बेंगलुरु स्टॉक एक्सचेंज से लार्सन एंड टुब्रो (L&T) और रिलायंस के शेयर ₹70,722 में खरीदे थे। कुछ शेयर बेचने के बाद उन्होंने दोनों कंपनियों के 300-300 शेयर अपने पास रखे।
- चोरी और FIR (नवंबर 1990): पंजीकरण के लिए ले जाते समय शेयर सर्टिफिकेट चोरी हो गए, जिसकी प्राथमिकी (FIR) अलसूर गेट पुलिस स्टेशन में दर्ज कराई गई।
- दिवालिया / सिविल केस (1991 – 1999): कंपनियों से शेयर ट्रांसफर रोकने के आग्रह पर रिलायंस ने सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की सलाह दी। 1991 में दायर सिविल सूट को सिविल कोर्ट ने 1 दिसंबर 1999 को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ता को कंपनी अधिनियम (Companies Act) के तहत उपलब्ध राहत का लाभ उठाना चाहिए था। याचिकाकर्ता ने इस फैसले को आगे चुनौती नहीं दी।
- उपभोक्ता आयोग का रुख (2026): वर्षों बाद, उन्होंने अल्ट्राटेक (UltraTech) को भी पक्षकार बनाते हुए डीमैट खाते में शेयर, लाभांश (Dividends) और बोनस शेयर ट्रांसफर करने की मांग के साथ उपभोक्ता आयोग का रुख किया, जिसे प्रवेश स्तर (Admission Stage) पर ही खारिज कर दिया गया।

