मुख्य बिंदु (Key Indicators)
- 198 से अधिक सुनवाई और ₹13 करोड़ फीस: 2020 से शुरू हुई मध्यस्थता में 198 से अधिक सुनवाई आयोजित की जा चुकी हैं और विवादित राशि (₹528 करोड़) में से लगभग ₹13 करोड़ रुपये फीस के रूप में खर्च हो चुके हैं।
- राजस्थान हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: राजस्थान हाईकोर्ट के जस्टिस समीर जैन ने लगातार देरी पर आपत्ति जताते हुए अप्रैल 2025 से मध्यस्थों की फीस में 5% प्रति माह कटौती कर पैसा वापस करने और 45 दिनों में सुनवाई पूरी करने का आदेश दिया था।
- सुप्रीम कोर्ट का रुख: सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थों की याचिका पर विचार करते हुए हाईकोर्ट के फीस वापसी वाले आदेश पर अंतरिम रोक तो लगा दी है, लेकिन यह भी स्वीकार किया कि “देरी बहुत अधिक है” और यह मध्यस्थता अनुकूल माहौल के लिए ठीक नहीं है।
- सिविल कोर्ट से तुलना: न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने मौखिक टिप्पणी की कि “अगर तर्क 2024 से 2026 तक चलते रहेंगे, तो मध्यस्थता का भविष्य क्या होगा? सामान्य सिविल मुकदमों में भी अब तक डिक्री मिल गई होती।”
Contract Dispute: मध्यस्थता (Arbitration) की कार्यवाहियों में लगने वाले अत्यधिक समय और भारी खर्च पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता व्यक्त की है।
वर्षों तक खिंचने वाली मध्यस्थता कार्यवाही मूल उद्देश्य को ही खत्म कर देती है
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वर्षों तक खिंचने वाली मध्यस्थता कार्यवाही वैकल्पिक विवाद समाधान (ADR) के मूल उद्देश्य को ही खत्म कर देती है। यह मामला जयपुर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (JVVNL) और एचसीएल इंफोसिससिस्टम्स (HCL Infosystems) के बीच चल रहे विवाद से जुड़ा है, जिसमें मध्यस्थता न्यायाधिकरण (Arbitral Tribunal) के सदस्यों ने राजस्थान उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें देरी के कारण उनकी फीस में 5% कटौती (प्रति माह) का आदेश दिया गया था।न्यायालय ने टिप्पणी की कि वर्षों तक चलने वाली लंबी सुनवाई मध्यस्थता को पारंपरिक मुकदमों के त्वरित और लागत प्रभावी विकल्प के रूप में चुनने के मूल उद्देश्य को ही खत्म कर देती है।
पीठ और मामले की पृष्ठभूमि
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ एचसीएल इन्फोसिस्टम्स लिमिटेड (HCL Infosystems Limited) तथा जयपुर विद्युत वितरण निगम लिमिटेड सहित राजस्थान की बिजली वितरण कंपनियों के बीच चल रहे मध्यस्थता विवाद से जुड़ी अपीलों पर सुनवाई कर रही थी।
- विवाद की पृष्ठभूमि: यह विवाद 2009 में राजस्थान भर में आईटी और बिजली बुनियादी ढांचा कार्यों (Restructured Accelerated Power Development and Reforms Programme) के लिए एचसीएल को दिए गए लगभग ₹528.20 करोड़ के अनुबंधों से संबंधित है।
- मध्यस्थता का प्रारंभ: इस मामले में मध्यस्थता सितंबर 2019 में शुरू की गई थी और ट्रिब्यूनल के समक्ष पहली प्रारंभिक सुनवाई जुलाई 2020 में हुई थी।
- 198 सुनवाइयां और करोड़ों का खर्च: 2020 से अब तक इस मामले में 198 सुनवाइयां हो चुकी हैं और केवल मध्यस्थों की फीस के रूप में लगभग ₹13 करोड़ का भारी-भरकम भुगतान किया जा चुका है, इसके बावजूद प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई।
मामले के मुख्य तथ्य और कानूनी विश्लेषण
यह मामला 2009 में राजस्थान की पावर वितरण कंपनियों द्वारा एचसीएल (HCL) को दिए गए आईटी और पावर इंफ्रास्ट्रक्चर कॉन्ट्रैक्ट (₹528.20 करोड़) के विवाद से जुड़ा है। सितंबर 2019 में आर्बिट्रेशन क्लॉज लागू किया गया और जुलाई 2020 में तीन सदस्यीय आर्बिट्रेशन ट्रिब्यूनल की पहली सुनवाई हुई।
राजस्थान हाईकोर्ट का फैसला और मध्यस्थों की अपील जब 4 साल से अधिक समय बीतने के बाद भी विवाद न सुलझ सका, तो राजस्थान हाईकोर्ट ने देरी का दायित्व ट्रिब्यूनल पर डालते हुए आदेश दिया था कि अप्रैल 2025 के बाद से हर महीने की देरी के लिए आर्बिट्रेटर्स की फीस में 5% की कटौती की जाए और वह पैसा पक्षकारों को लौटाया जाए। इस आदेश के खिलाफ स्वयं पूर्व जजों के ट्रिब्यूनल ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट की मौखिक टिप्पणियां सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने माना कि हालांकि फीस कटौती का आदेश फिलहाल स्थगित (Stay) रहेगा, लेकिन प्रक्रियात्मक देरी की जांच करना बेहद जरूरी है।
न्यायमूर्ति बागची ने कहा: हम मध्यस्थता-अनुकूल (Arbitration-friendly) माहौल की बात करते हैं, लेकिन इस प्रक्रिया को देखिए। मध्यस्थता को एक कुशल, किफायती और त्वरित विकल्प माना गया था। लेकिन वर्षों तक सुनवाई चलना चिंताजनक है।
वर्तमान स्थिति शीर्ष अदालत ने सभी पक्षों को 10 दिनों के भीतर अपनी लिखित दलीलें प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आर्बिट्रेशन की कार्यवाही जारी रह सकती है, लेकिन जब तक सुप्रीम कोर्ट अगला आदेश नहीं देता, तब तक ट्रिब्यूनल अपना अंतिम फैसला (Final Award) जारी या घोषित नहीं करेगा।
राजस्थान उच्च न्यायालय का आदेश
राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति समीर जैन ने बार-बार समय विस्तार दिए जाने के बावजूद मध्यस्थता में हुई अत्यधिक देरी पर सख्त आपत्ति जताई थी:
- उच्च न्यायालय ने कहा कि 2009 के कार्यादेशों से उपजा विवाद वर्षों तक अनिर्णीत रहना त्वरित विवाद समाधान की मूल भावना के विपरीत है।
- अदालत ने 30 अप्रैल 2025 के बाद की देरी के लिए मध्यस्थता ट्रिब्यूनल को जिम्मेदार ठहराया और आदेश दिया कि निपटारे तक प्रत्येक माह की देरी के लिए मध्यस्थों की फीस में 5 प्रतिशत की कटौती की जाए तथा वसूली गई अतिरिक्त राशि दोनों पक्षों को आनुपातिक रूप से लौटाई जाए।
- उच्च न्यायालय ने ट्रिब्यूनल को जयपुर आर्बिट्रेशन एंड मीडिएशन सेंटर में दैनिक (Day-to-day) सुनवाई करने और 27 मई के फैसले के 45 दिनों के भीतर अंतिम फैसला (Award) सुनाने का निर्देश दिया था।
मध्यस्थों का सुप्रीम कोर्ट का रुख और शीर्ष अदालत की सख्त टिप्पणी
उच्च न्यायालय के इस फैसले के खिलाफ ट्रिब्यूनल के तीनों सदस्यों सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपक वर्मा, उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति दिनेश चंद्र सोमानी और न्यायमूर्ति एन. कुमार ने स्वयं सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
17 अगस्त 2026 को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने फीस कटौती पर पूर्व में रोक तो लगाई, लेकिन अत्यधिक देरी पर गंभीर सवाल खड़े किए:
- न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा:“हम मध्यस्थता-अनुकूल (Arbitration-friendly) माहौल की बात करते हैं और स्थिति देखिए। यह अत्यंत अनुचित है। बेशक, हमारी यह टिप्पणी किसी व्यक्तिगत मध्यस्थ पर नहीं है, बल्कि पूरी प्रक्रिया पर है। मध्यस्थता को एक कुशल, सुविधाजनक और लागत प्रभावी विकल्प होना चाहिए था। यदि 2024 से 2026 तक केवल बहस ही चलती रहे… तो मध्यस्थता का भविष्य क्या होगा? यह देरी बहुत अधिक है।”
- न्यायमूर्ति बागची ने यह भी जोड़ा कि यदि दोनों पक्षों ने सामान्य दीवानी मुकदमा (Civil Suit) लड़ा होता, तो शायद अब तक उन्हें अदालत से डिक्री (फैसला) मिल चुकी होती।
- अदालत ने कहा कि यद्यपि एक मध्यस्थ के निधन के बाद दूसरे मध्यस्थ की नियुक्ति जैसी परिस्थितियां थीं, फिर भी कुल मिलाकर हुई देरी अत्यधिक है और इसकी गहन समीक्षा की आवश्यकता है।
सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम आदेश
- अंतिम फैसले पर रोक जारी: सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता कार्यवाही जारी रखने की अनुमति दी है, लेकिन ट्रिब्यूनल को निर्देश दिया है कि वह शीर्ष अदालत के अगले आदेश तक अपना अंतिम फैसला घोषित, तामील या अपलोड न करे।
- लिखित दलीलें: अदालत ने सभी पक्षों को 10 दिनों के भीतर अपनी लिखित दलीलें दाखिल करने और आपस में साझा करने का निर्देश दिया है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने संकेत दिया कि वह इस मामले के माध्यम से देश में मध्यस्थता कार्यवाहियों को नियंत्रित करने वाले व्यापक दिशानिर्देशों और मानकों पर विचार करेगा।
सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणियां
- 198 सुनवाई के बाद भी फैसला अधूरा
- वर्ष 2020 में शुरू हुई इस मध्यस्थता प्रक्रिया में अब तक 198 से अधिक सुनवाई हो चुकी हैं और फीस के रूप में करोड़ों रुपये दिए जा चुके हैं।
- न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की: “अगर मामला 2024 से 2026 तक तर्कों में ही फंसा रहेगा… तो यह मध्यस्थता के भविष्य के लिए चिंताजनक है। इससे बेहतर तो साधारण दीवानी मुकदमा (Civil Suit) होता, जिसमें अब तक डिक्री मिल चुकी होती।”
- राजस्थान हाईकोर्ट का आदेश (जस्टिस समीर जैन)
- हाईकोर्ट ने ₹528 करोड़ के विवाद में लगभग ₹13 करोड़ की मध्यस्थता फीस (Arbitral Fees) खर्च होने पर नाराजगी जताई थी।
- हाईकोर्ट ने अप्रैल 2025 के बाद हुई देरी का जिम्मेदार ट्रिब्यूनल को ठहराते हुए, अंतिम फैसला आने तक फीस में प्रति माह 5% की कटौती करने और ली गई अतिरिक्त राशि पक्षों को लौटाने का आदेश दिया था।
- साथ ही, जयपुर मध्यस्थता केंद्र में प्रतिदिन सुनवाई करके 45 दिनों के भीतर अंतिम फैसला सुनाने का निर्देश दिया था।
- सुप्रीम कोर्ट का अंतरिम रुख
- शीर्ष अदालत ने मध्यस्थता कार्यवाही जारी रखने की अनुमति तो दे दी है, लेकिन न्यायाधिकरण द्वारा अंतिम निर्णय/अवार्ड सुनाने, अपलोड करने या जारी करने पर रोक लगा दी है।
- हाईकोर्ट के फीस काटने वाले आदेश पर भी फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रोक (Stay) बरकरार रखी है।
- कोर्ट ने सभी पक्षों को 10 दिनों के भीतर अपनी लिखित दलीलें (Written Submissions) दाखिल करने का निर्देश दिया है।
केस अवलोकन (Case Snapshot)
| पहलू | विवरण |
| अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | CJI सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना |
| मूल विवाद | HCL Infosystems और राजस्थान की बिजली वितरण कंपनियों के बीच ₹528.20 करोड़ का अनुबंध विवाद (2009 R-APDRP योजना) |
| मध्यस्थता पीठ | 3-सदस्यीय ट्रिब्यूनल (सुप्रीम कोर्ट एवं हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीशगण) |
| मुख्य मुद्दा | व्यावसायिक मध्यस्थता में अत्यधिक देरी और अत्यधिक फीस; Arbitration Act के समय-सीमा का उल्लंघन। |

