याचिकाकर्ता के मुख्य तर्क (Key Highlights of the Petition)
- 1. ‘आनंदमठ’ से पहले बनाम ‘आनंदमठ’ के बाद का पाठ:याचिका के अनुसार, आजादी के बाद से पिछले 79 वर्षों से भारत में वंदे मातरम के केवल शुरुआती दो छंद ही गाए जाते रहे हैं, जिन्हें 1870 के दशक की शुरुआत में लिखा गया था। ये दो छंद किसी भी धार्मिक देवी-देवता का आह्वान नहीं करते और केवल भारत की प्राकृतिक सुंदरता व मातृभूमि को नमन करते हैं।
- 2. ‘आनंदमठ’ के छंदों पर आपत्ति:याचिका में कहा गया है कि बंकिमचंद्र चटर्जी ने जब इस गीत को अपने उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया, तो इसमें तीसरे से छठे छंद जोड़े गए। याचिका के अनुसार, ये बाद के छंद हिंदू देवियों—दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती—की पूजा और एक वर्ग के खिलाफ युद्ध के आह्वान से जुड़े हैं।याचिका में कहा गया है:“गृह मंत्रालय का आदेश एक गैर-धार्मिक दो-छंद वाले राष्ट्रीय गीत को हटाकर ‘आनंदमठ’ के छह छंदों वाले गीत को थोपता है, जो असंवैधानिक और मूर्तिपूजा को बढ़ावा देने वाला है।”
- 3. ऐतिहासिक समझौते का हवाला (Rabindranath Tagore & Constituent Assembly):याचिका में उल्लेख किया गया है कि 1937 में रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर और 1950 में संविधान सभा द्वारा स्वीकृत समझौते के तहत केवल पहले दो छंदों को ही स्वीकार किया गया था ताकि सभी धर्मों और आस्थाओं के नागरिक बिना किसी झिझक के इसका सम्मान कर सकें।
- 4. मौलिक अधिकारों का उल्लंघन (Violation of Fundamental Rights):गैर-हिंदू नागरिकों (जैसे बौद्धों, मुसलमानों व अन्य) को विशिष्ट देवी-देवताओं की स्तुति करने के लिए बाध्य करना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् स्वतंत्रता), अनुच्छेद 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता), और अनुच्छेद 25(1) (धार्मिक स्वतंत्रता) के तहत दिए गए मौलिक अधिकारों पर अतिक्रमण है।
नई दिल्ली: भारत के राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ के गायन के प्रारूप, ऐतिहासिक आनंदमठ उपन्यास के संदर्भों, धार्मिक स्वतंत्रता और संविधान की प्रस्तावना में निहित ‘पंथनिरपेक्षता’ (Secularism) व ‘बंधुत्व’ (Fraternity) के विधिक संतुलन को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत में एक नई संवैधानिक चुनौती पेश की गई है।
आंबेडकरवादी विद्वान और नागरिक अधिकार पैरोकार बी.डी. बोरकर ने दायर की याचिका
वरिष्ठ न्यायविद एवं विधि प्रोफेसर मोहन गोपाल द्वारा तैयार और अधिवक्ता वैभव चौधरी के माध्यम से दायर इस रिट याचिका में गृह मंत्रालय के 28 जनवरी 2026 और 9 जुलाई 2026 के आदेशों को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इन आदेशों ने पिछले 79 वर्षों से चले आ रहे दो छंदों (Two Stanzas) वाले अ-धार्मिक व प्रकृति-आधारित राष्ट्रगीत के सर्वमान्य रूप को गैर-कानूनी ढंग से बदलते हुए बंकिम चंद्र चटर्जी के उपन्यास ‘आनंदमठ’ के छह छंदों वाले संपूर्ण पाठ को जबरन थोप दिया है, जो मूर्तिपूजा और सांप्रदायिक विभाजन को बढ़ावा देता है। नागपुर स्थित बौद्ध कार्यकर्ता, आंबेडकरवादी विद्वान और नागरिक अधिकार पैरोकार बी.डी. बोरकर (B.D. Borkar) ने केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) के उन दो प्रशासनिक आदेशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जिनके तहत औपचारिक राजकीय कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम’ के सभी छह छंदों (All Six Stanzas) का गायन अनिवार्य किया गया है।
याचिका में उठाए गए प्रमुख संवैधानिक व विधिक आधार
1. ‘धर्मनिरपेक्ष गणराज्य को धर्मतंत्र (Theocracy) में बदलने का प्रयास’ याचिका में तर्क दिया गया है कि राज्य द्वारा किसी एक विशिष्ट धर्म के देवी-देवताओं की स्तुति को राष्ट्रगीत के रूप में अनिवार्य करना भारत के संवैधानिक स्वरूप को बदलता है:“एक विशिष्ट धर्म की देवियों की सांप्रदायिक प्रार्थना को भारत के राष्ट्रगीत के रूप में अनिवार्य करके, आक्षेपित आदेश भारत की राजव्यवस्था के चरित्र को एक ‘धर्मनिरपेक्ष गणराज्य’ (Secular Republic) से बदलकर एक ‘धर्मतंत्र’ (Theocracy) में परिवर्तित कर देते हैं।”
याचिका आगे आरोप लगाती है:“‘आधिकारिक संस्करण’ के बजाने और गाने पर निर्देश प्रदान करने की आड़ में… आक्षेपित आदेशों ने मौजूदा राष्ट्रगीत को निरस्त कर दिया है और एक नया राष्ट्रगीत थोप दिया है, जो आनंदमठ का छह छंदों वाला गृहयुद्ध गीत है, जिसमें असंवैधानिक, मूर्तिपूजक और इस्लामोफोबिक (Islamophobic) सामग्री समाहित है।”
2. 1870 के मूल 2 छंद बनाम आनंदमठ (1882) के छंद 3 से 6 का अंतर:
- प्रकृति की वंदना (छंद 1 व 2):
- याचिका के अनुसार, बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा 1870 के दशक की शुरुआत में रचित मूल दो छंद किसी भी उपन्यास का हिस्सा नहीं थे। यह एक स्वतंत्र कविता थी, जिसमें केवल मातृभूमि के प्राकृतिक परिदृश्य, जल, फल और शस्य-श्यामल भूमि की वंदना की गई थी; इसमें किसी देवी-देवता या सांप्रदायिक संघर्ष का कोई उल्लेख नहीं था।
- युद्ध उद्घोष और देवियों की स्तुति (छंद 3 से 6):
- याचिका में कहा गया है कि बाद में 1882 में प्रकाशित उपन्यास ‘आनंदमठ’ में बंकिम चंद्र ने इस गीत को शामिल करते हुए तीसरे से छठे छंद जोड़े।
- इसमें मातृभूमि को हिंदू देवियों—दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती—का रूप दिया गया।
- याचिका के अनुसार, उपन्यास की कथावस्तु में यह सन्यासियों का एक सैन्य गीत (War Cry) बन जाता है, जहां वे अपनी सेना के शत्रुओं के खिलाफ युद्ध की विजय के लिए देवियों से प्रार्थना करते हैं।
3. तीसरे छंद (Stanza 3) के पाठ पर विशिष्ट आपत्ति: याचिका में श्री अरबिंदो द्वारा किए गए अंग्रेजी अनुवाद का हवाला देते हुए छंद 3 की पंक्तियों को रेखांकित किया गया है:
“छंद 3 में हिंदू संन्यासी गाते हैं: ‘To thee I call, Mother and Lord! Thou who savest, arise and save! To her I cry who ever her foemen drove Back from plain and sea ..And shook herself free.’ इस छंद में ‘शत्रुओं’ (Foemen) का संदर्भ—जिन्हें देवी ने मैदान और समुद्र से पीछे खदेड़ दिया और स्वयं को मुक्त कराया—आनंदमठ के कथानक में सीधे तौर पर उन ऐतिहासिक संदर्भों से जुड़ता है जो साथी नागरिकों के विरुद्ध सांप्रदायिक वैमनस्य की भावना पैदा करते हैं।”
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 1937 का कांग्रेस समझौता और 1950 की संविधान सभा
याचिका में दलील दी गई है कि राष्ट्रगीत के दो छंदों वाले प्रारूप को स्वतंत्रता के बाद से ही कानूनी मान्यता प्राप्त है:
- 1937 का टैगोर समझौता:
- वर्ष 1937 में फैजपुर/कोलकाता में जब राष्ट्रगीत को लेकर बहस हुई थी, तब रवींद्रनाथ टैगोर की सलाह पर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने यह ऐतिहासिक समझौता स्वीकार किया था कि केवल पहले दो छंद ही गाए जाएंगे, क्योंकि शेष छंदों में विशिष्ट धार्मिक मान्यताएं और मूर्तियां शामिल हैं जो गैर-हिंदू नागरिकों की धार्मिक आस्थाओं के आड़े आ सकती हैं।
- 24 जनवरी 1950 (संविधान सभा का वक्तव्य):
- संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 24 जनवरी 1950 को दिए गए अपने आधिकारिक वक्तव्य में स्पष्ट किया था कि ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के समान दर्जा प्राप्त होगा।
- याचिका का कहना है कि उस समय भी संविधान सभा द्वारा केवल उसी सर्वस्वीकृत 2-छंदों वाले संस्करण को मान्यता दी गई थी, न कि पूरे छह छंदों को।
जाति-विरोधी परंपरा और महात्मा ज्योतिराव फुले के दर्शन का संदर्भ
- याचिकाकर्ता ने जाति-विरोधी परंपराओं और महात्मा ज्योतिराव फुले की प्रसिद्ध कृति सार्वजनिक सत्य धर्म पुस्तक का हवाला दिया है, जिसमें सभी धर्मों और आस्थाओं के नागरिकों के आपसी प्रेम, सम्मान और बंधुत्व के साथ रहने की कल्पना की गई है।
- याचिका में कहा गया है कि बौद्ध, मुस्लिम, ईसाई और अन्य गैर-हिंदू नागरिकों को उन छंदों को गाने के लिए बाध्य करना जिनमें हिंदू देवियों की पूजा की गई है, उनकी अंतरात्मा और धार्मिक स्वतंत्रता का हनन करता है।
विधिक एवं संवैधानिक सिद्धांत
- अनुच्छेद 25 (अंतःकरण और धर्म की स्वतंत्रता):
- किसी भी नागरिक को ऐसे धार्मिक मंत्रों या देवी-देवताओं की स्तुति गाने के लिए विवश नहीं किया जा सकता जो उसकी व्यक्तिगत आस्था या धार्मिक सिद्धांतों (जैसे बौद्ध धर्म का अ-ईश्वरवादी दर्शन) के विरुद्ध हों।
- अनुच्छेद 19(1)(a) (मौन रहने का अधिकार):
- बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य (1986) के ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि किसी भी नागरिक को राष्ट्रगान या गीत गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता यदि उसकी धार्मिक मान्यताएं इसकी अनुमति नहीं देतीं, बशर्ते वह खड़े होकर उचित सम्मान प्रदर्शित करे।
- अनुच्छेद 13 (मूल अधिकारों से असंगत विधियां शून्य):
- याचिका का दावा है कि गृह मंत्रालय के दोनों प्रशासनिक आदेश संविधान के भाग III के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों का हनन करते हैं, इसलिए वे अनुच्छेद 13 के तहत प्रारंभ से ही शून्य (Void ab initio) हैं।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: बी.डी. बोरकर बनाम भारत संघ [रिट याचिका (सिविल) – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- याचिकाकर्ता: बी.डी. बोरकर (नागपुर स्थित बौद्ध कार्यकर्ता एवं आंबेडकरवादी विद्वान)
- प्रतिवादी: भारत संघ (गृह मंत्रालय के माध्यम से)
- ड्राफ्टकर्ता / परामर्शदाता: प्रोफेसर मोहन गोपाल (वरिष्ठ न्यायविद)
- दाखिलकर्ता अधिवक्ता: अधिवक्ता वैभव चौधरी
- प्रासंगिक संवैधानिक प्रावधान:
- भारत का संविधान:
- अनुच्छेद 13 (मौलिक अधिकारों के प्रतिकूल विधियों का शून्य होना)
- अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता)
- अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सहपठित मौन रहने का अधिकार)
- अनुच्छेद 21 (प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता तथा गरिमा का अधिकार)
- अनुच्छेद 25(1) (अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म को अबाध रूप से मानने का अधिकार)
- अनुच्छेद 29(2) (धर्म या जाति के आधार पर भेदभाव का प्रतिषेध)
- प्रस्तावना (पंथनिरपेक्षता और व्यक्ति की गरिमा व राष्ट्र की एकता सुनिश्चित करने वाला बंधुत्व)
- भारत का संविधान:
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य (1986, सुप्रीम कोर्ट) — ‘किसी नागरिक को राष्ट्रगान गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता यदि यह उसकी धार्मिक अंतरात्मा के विरुद्ध है; मौन रहकर सम्मानपूर्वक खड़े रहना अनादर नहीं है।’
- एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994, 9-जज संविधान पीठ) — ‘पंथनिरपेक्षता (Secularism) भारतीय संविधान के बुनियादी ढांचे (Basic Structure) का एक अभिन्न और अपरिवर्तनीय हिस्सा है; राज्य का कोई अपना धर्म नहीं हो सकता।’
- अरुणा रॉय बनाम भारत संघ (2002, सुप्रीम कोर्ट) — ‘धर्मनिरपेक्षता का अर्थ सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान है, न कि किसी विशिष्ट धार्मिक प्रथा को अनिवार्य करना।’
- वर्तमान स्थिति: याचिका सर्वोच्च न्यायालय की रजिस्ट्री में दायर; निकट भविष्य में शीर्ष अदालत की पीठ के समक्ष प्रारंभिक सुनवाई और दाखिले (Admission) के लिए सूचीबद्ध होने की संभावना।
Vande Matram-III:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| याचिकाकर्ता | बी.डी. बोरकर (BD Borkar – बौद्ध कार्यकर्ता एवं अंबेडकरवादी विद्वान) |
| चुनौतीपूर्ण आदेश | गृह मंत्रालय (MHA) के 28 जनवरी 2026 और 9 जुलाई 2026 के आदेश |
| मुख्य विवाद | वंदे मातरम के मूल 2 छंदों के बजाय बंकिमचंद्र चटर्जी के उपन्यास ‘आनंदमठ’ के पूरे 6 छंदों को अनिवार्य करना। |
| दावा | धार्मिक देवियों के आह्वान और मूर्तिपूजा/विभाजनकारी विचारों को अनिवार्य करना मौलिक अधिकारों (अनुच्छेद 19, 21, 25) का उल्लंघन है। |

