Tuesday, October 6, 2026
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Right To Work: क्या काम के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाया जाना चाहिए? ग्रामीण रोजगार योजनाओं में न्यूनतम मजदूरी की मांग; यह है सुप्रीम सवाल

केस अवलोकन (Case Snapshot)

पहलूविवरण
अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठCJI सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
मामलाअरुणा रॉय बनाम भारत संघ (Aruna Roy v. Union of India)
मुख्य मुद्दाकाम के अधिकार की संवैधानिक स्थिति; ग्रामीण रोजगार योजना में राज्यों द्वारा अधिसूचित न्यूनतम मजदूरी की अनिवार्यता।
नया कानूनविकसित भारत – रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम (1 जुलाई 2026 से लागू)

Right To Work: सुप्रीम कोर्ट ने ग्रामीण रोजगार योजनाओं के तहत न्यूनतम मजदूरी भुगतान और विलंबित वेतन के मुआवजे से जुड़ी याचिका पर सुनवाई के दौरान सवाल उठाया कि क्या ग्रामीण श्रमिकों के लिए वैधानिक रोजगार गारंटी को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा के मौलिक अधिकार के समकक्ष रखा जा सकता है [अरुणा रॉय बनाम भारत संघ]।

पीठ और अदालत की संवैधानिक टिप्पणियां

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने रेखांकित किया कि भारतीय संविधान काम के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता नहीं देता, बल्कि इसे राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों (DPSP – भाग IV) के अंतर्गत राज्य के दायित्वों और एक लोकतांत्रिक आकांक्षा के रूप में शामिल करता है।

  • काम का अधिकार बनाम मौलिक अधिकार: न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कहा:“संविधान काम के अधिकार को मौलिक अधिकार नहीं बनाता। वास्तव में यह भाग IV के तहत केवल एक लोकतांत्रिक आकांक्षा है। इस आकांक्षा को प्राप्त करने के लिए राज्य एक नीति तैयार करता है जहां वर्गीकृत मुआवजे के स्तर पर काम प्रदान किया जाता है। क्या हमें इसे अनुच्छेद 21 के समकक्ष रखना चाहिए?”
  • संवैधानिक और नीतिगत प्रभाव: न्यायमूर्ति बागची ने चेतावनी दी कि यदि काम के अधिकार को एक लागू करने योग्य मौलिक अधिकार बना दिया जाता है और भविष्य में राज्य अपने सामाजिक कल्याणकारी कार्यक्रमों को सीमित करता है, तो क्या अदालत परमादेश (Mandamus) जारी कर यह कह सकती है कि सरकार को मनरेगा या ‘विकसित भारत–रोजगार एवं आजीविका मिशन गारंटी (ग्रामीण)’ योजना को लागू करना ही होगा?

नए कानून की पृष्ठभूमि (MGNREGA से VB-G RAM G)

सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि 1 जुलाई 2026 से महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) की जगह नया कानून ‘विकसित भारत–रोजगार एवं आजीविका मिशन गारंटी (ग्रामीण)’ (VB-G RAM G) अधिनियम लागू हो चुका है:

  • कार्य दिवसों में वृद्धि: नया कानून प्रति ग्रामीण परिवार 100 दिनों के स्थान पर अब 125 दिनों के रोजगार की गारंटी देता है।
  • मजदूरी दर: नए कानून के तहत राष्ट्रीय औसत दैनिक मजदूरी दर मनरेगा के ₹298.8 से बढ़ाकर ₹327.4 प्रतिदिन अधिसूचित की गई है।

यहां पढ़ें: Action Against CM: क्या पदस्थ मुख्यमंत्री के खिलाफ अपराध पर CBI जांच कर सकती है?…ED ने सुप्रीम कोर्ट से निर्णय लेने का किया अनुरोध

न्यूनतम मजदूरी और व्यावहारिक चुनौतियां

याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि नए कानून के आने के बाद भी न्यूनतम मजदूरी का सवाल प्रासंगिक बना हुआ है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि राज्यों द्वारा तय न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान करना ‘बंधुआ/जबरन मजदूरी’ (Forced Labour) के समान माना जा सकता है।

सीजेआई सूर्यकांत ने इस मांग पर वित्तीय और व्यावहारिक सीमाओं को रेखांकित करते हुए कहा:

  • रोजगार का दायरा घटने का जोखिम: सीजेआई ने टिप्पणी की कि यदि रोजगार गारंटी योजना पर न्यूनतम मजदूरी की ऊंची सीमा अनिवार्य कर दी जाए, तो सीमित बजट (Fixed Budget) में कम लोगों को काम मिल पाएगा। बजट का आकार समान रहने पर वेतन दर बढ़ने से रोजगार का कुल दायरा सिकुड़ जाएगा।
  • गतिविधि का स्वरूप: सीजेआई ने स्पष्ट किया कि न्यूनतम मजदूरी अधिनियम का लागू होना इस बात पर निर्भर करेगा कि श्रमिकों को किस प्रकार के कार्य में लगाया गया है। यदि कार्य किसी उद्योग या अधिसूचित गतिविधि के दायरे में नहीं आता, तो न्यूनतम मजदूरी अधिनियम का दायरा स्वतः विस्तारित नहीं होगा।
  • मुआवजे का मुद्दा: मजदूरी में देरी के मुआवजे पर सीजेआई ने कहा कि यह बिंदु ‘स्वराज अभियान बनाम भारत संघ’ फैसले में पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है और उसके गैर-अनुपालन पर नई कार्रवाई की जा सकती है।

सुनवाई का परिणाम

सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि नया वैधानिक ढांचा (VB-G RAM G) लागू होने के बाद पुरानी याचिका का आधार बदल चुका है और इसके क्रियान्वयन से जुड़े नए आंकड़ों व विवरण की आवश्यकता होगी। इसके बाद अधिवक्ता प्रशांत भूषण नई योजना के तहत न्यूनतम मजदूरी और मुआवजे के मुद्दों को शामिल करते हुए एक नई याचिका (Fresh Petition) दाखिल करने पर सहमत हो गए।

सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां और कानूनी बिंदु

  1. संवैधानिक स्थिति और नीति निदेशक तत्व
    • न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की: “संविधान काम के अधिकार को मौलिक अधिकार नहीं बनाता। वास्तव में, यह भाग IV के तहत केवल एक लोकतांत्रिक आकांक्षा है… क्या हमें इसे अनुच्छेद 21 के बराबर बनाना चाहिए?”
    • कोर्ट ने कहा कि यदि राज्य अपनी कल्याणकारी योजनाओं को समेटता है, तो क्या अदालतें आदेश (Mandamus) जारी करके उन्हें MGNREGA या नई योजनाएं लागू करने के लिए मजबूर कर सकती हैं? यह एक बड़ा संवैधानिक प्रश्न है।
  2. न्यूनतम मजदूरी और रोजगार का दायरा
    • याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान करना संविधान के अनुसार “बेगार” या बंधुआ मजदूरी (Forced Labour) के समान है।
    • इसके जवाब में CJI सूर्य कांत ने व्यावहारिक कठिनाई की ओर इशारा करते हुए कहा: “यदि आप न्यूनतम मजदूरी की शर्त लगाएंगे, तो रोजगार का दायरा सिकुड़ जाएगा। जब बजट का आकार समान रहता है, तो मजदूरी दर बढ़ाने से कम लोगों को काम मिल पाएगा।”
  3. पुराना कानून बनाम नया कानून (VB-G RAM G Act)
    • अदालत को सूचित किया गया कि 1 जुलाई 2026 से MGNREGA को प्रतिस्थापित करके ‘विकसित भारत – रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) अधिनियम’ (VB-G RAM G Act) लागू कर दिया गया है।
    • नए कानून के तहत रोजगार का दायरा 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिन प्रति वर्ष कर दिया गया है और औसत राष्ट्रीय मजदूरी ₹298.8 से बढ़ाकर ₹327.4 प्रति दिन की गई है।
  4. ताजा याचिका दाखिल करने का निर्देश
    • कोर्ट ने कहा कि पुराने कानून (MGNREGA) पर आधारित इस याचिका का ढांचा नए वैधानिक ढांचे के आने से बदल गया है।
    • इसके बाद प्रशांत भूषण नए कानून (VB-G RAM G Act) के तहत न्यूनतम मजदूरी और देर से भुगतान के मुआवजे को चुनौती देने वाली एक नई/ताजा याचिका (Fresh Petition) दाखिल करने पर सहमत हो गए।
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