मुख्य बिंदु (Key Indicators)
- अपमान करने का इरादा अनिवार्य: केवल शब्द का प्रयोग पर्याप्त नहीं है; SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत अपराध साबित करने के लिए यह दिखाना आवश्यक है कि शब्द का इस्तेमाल पीड़ित को उसकी जाति के कारण अपमानित करने के इरादे से किया गया था।
- ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द: बरेली की विशेष अदालत (SC/ST एक्ट) द्वारा धारा 319 CrPC (BNSS 358) के तहत वेगराज और दौलत को समन भेजने का आदेश रद्द कर दिया गया।
- धारा 319 CrPC की सीमाएं: हाईकोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के संविधान पीठ के फैसले (Hardeep Singh v. State of Punjab) का हवाला देते हुए कहा कि धारा 319 के तहत किसी अतिरिक्त व्यक्ति को आरोपी के रूप में समन करने की शक्ति असाधारण (Extraordinary) है और इसके लिए प्रथम दृष्टया मामले से अधिक मजबूत व विश्वसनीय साक्ष्य की आवश्यकता होती है।
- पुलिस जांच में निर्दोष पाए गए थे: पुलिस ने अपनी चार्जशीट में केवल मुख्य आरोपी (हिम्मत सिंह) के खिलाफ आरोप तय किए थे और उसके पिता व भाई को साक्ष्यों के अभाव में क्लीन चिट (Exonerate) दे दी थी।
Calling By Caste Name: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति द्वारा केवल ‘चमार’ शब्द का उच्चारण कर देने मात्र से अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act) के प्रावधान स्वतः लागू नहीं होते, जब तक कि यह साबित करने के लिए ठोस सामग्री न हो कि इस शब्द का प्रयोग पीड़िता को उसकी जाति के आधार पर अपमानित या प्रताड़ित करने के इरादे या ज्ञान के साथ किया गया था [वेगराज सिंह एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य]।
यह है मुख्य कानूनी बिंदु
- इरादे (Intent) की अनिवार्यता: न्यायालय ने माना कि केवल गाली-गलौज या झगड़े के दौरान जातिसूचक शब्द बोलना ही एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत अपराध का गठन नहीं करता; इसके लिए पीड़िता को उसकी जाति के कारण अपमानित या भयभीत करने का स्पष्ट इरादा होना आवश्यक है।
- समन जारी करने का असाधारण अधिकार: अदालत ने रेखांकित किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 319 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता – BNSS की धारा 358) के तहत किसी गैर-नामित व्यक्ति को मुकदमे के लिए तलब करने का अधिकार एक ‘असाधारण शक्ति’ (Extraordinary Power) है, जिसका उपयोग अत्यंत सावधानी और पुख्ता साक्ष्यों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
- निचली अदालत का समन आदेश रद्द: उच्च न्यायालय ने बरेली की विशेष अदालत द्वारा दिए गए समन आदेश को निरस्त कर दिया, क्योंकि रिकॉर्ड पर अपीलकर्ताओं की संलिप्तता का कोई स्पष्ट और अकाट्य साक्ष्य नहीं था।
पीठ और मामले की पृष्ठभूमि
न्यायमूर्ति संतोष राय की एकल पीठ ने बरेली निवासी वेगराज सिंह और उनके बेटे दौलत द्वारा दायर आपराधिक अपील को स्वीकार करते हुए 13 अगस्त को यह फैसला सुनाया।
- मूल प्राथमिकी (FIR): बरेली के इज्जतनगर थाने में मुख्य आरोपी हिम्मत सिंह और उनके परिजनों के खिलाफ आईपीसी की धारा 376(2)(n) (दुष्कर्म), 504, 506 तथा एससी/एसटी एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था।
- पुलिस जांच: जांच अधिकारी ने केवल मुख्य आरोपी हिम्मत सिंह के खिलाफ आरोप पत्र (Charge-sheet) दाखिल किया, जबकि उसके पिता वेगराज और बड़े भाई दौलत को आरोपों से मुक्त (Exonerate) कर दिया।
- ट्रायल कोर्ट का समन आदेश: मुकदमे के दौरान विशेष अदालत (SC/ST Act) के समक्ष पीड़िता (PW-1) ने अपने मुख्य बयान में आरोप लगाया कि वेगराज और दौलत ने उसे गालियां दीं और ‘चमार’ शब्द का इस्तेमाल किया। इस बयान के आधार पर विशेष न्यायाधीश ने 21 मार्च 2025 को दोनों को धारा 319 CrPC (धारा 358 BNSS) के तहत बतौर आरोपी तलब (Summon) कर लिया, जिसे उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी।
मामले के मुख्य तथ्य और कानूनी विश्लेषण
यह मामला बरेली के इज्जतनगर थाने में वर्ष 2024 में दर्ज हुई एक एफआईआर से जुड़ा है, जिसमें शादी का झांसा देकर दुष्कर्म करने और डराने-धमकाने के आरोप लगाए गए थे। पुलिस जांच के दौरान पीड़िता के शुरुआती बयानों (धारा 161 और 164 CrPC) में मुख्य आरोपी के पिता (वेगराज) और भाई (दौलत) की कोई विशिष्ट भूमिका या जातिसूचक शब्द बोलने का जिक्र नहीं था, जिसके बाद पुलिस ने चार्जशीट से उनका नाम हटा दिया था।
हालांकि, ट्रायल के दौरान पीड़िता (PW-1) ने अदालत में बयान देते हुए कहा कि इन दोनों ने भी उसे गाली दी थी और “चमार” शब्द का इस्तेमाल किया था। इस बयान के आधार पर स्पेशल जज, बरेली ने 21 मार्च 2025 को दोनों को बतौर आरोपी मुकदमे का सामना करने के लिए समन जारी कर दिया था, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
हाईकोर्ट का वैधानिक विश्लेषण न्यायधीश संतोष राय ने सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णयों (Swaran Singh v. State एवं Hitesh Verma v. State of Uttarakhand) पर भरोसा जताते हुए कहा: केवल ‘चमार’ शब्द के प्रयोग से यह स्वतः सिद्ध नहीं हो जाता कि अपीलकर्ताओं ने पीड़ित को उसके अनुसूचित जाति समुदाय से होने के कारण अपमानित या प्रताड़ित करने के इरादे या ज्ञान से उस शब्द का उपयोग किया था। साधारण विवाद या गाली-गलौज SC/ST एक्ट के तहत अपराध के घटकों को पूरा नहीं करती।
कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने बिना किसी मजबूत और विश्वसनीय साक्ष्य के बेहद लापरवाही भरे (Casual and Cavalier) तरीके से धारा 319 CrPC के तहत समन जारी किया था, जो कि कानूनन गलत था। अतः हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के समन आदेश को निरस्त कर दिया।
उच्च न्यायालय के निष्कर्ष एवं कानूनी व्याख्या
अपीलकर्ताओं की दलीलों को स्वीकार करते हुए न्यायमूर्ति संतोष राय ने कहा:
- पूर्व बयानों में विशिष्ट भूमिका का अभाव: अदालत ने पाया कि पीड़िता ने धारा 161 और धारा 164 CrPC के तहत दर्ज अपने प्रारंभिक बयानों में इन दोनों अपीलकर्ताओं को जातिसूचक टिप्पणी, गाली-गलौज या धमकी देने की कोई विशिष्ट भूमिका नहीं सौंपी थी। दुष्कर्म और शादी के वादे के मुख्य आरोप केवल हिम्मत सिंह के खिलाफ थे।
- सुप्रीम कोर्ट की नजीरों का हवाला: उच्च न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के स्वर्ण सिंह बनाम राज्य और हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य के ऐतिहासिक फैसलों पर भरोसा जताया। अदालत ने माना कि यद्यपि यह शब्द जातिसूचक गाली के रूप में प्रयोग किए जाने पर अपराध की श्रेणी में आ सकता है, लेकिन इसके लिए यह साबित करना अनिवार्य है कि आरोपी का इरादा केवल जाति के आधार पर अपमानित करना था।
- न्यायमूर्ति संतोष राय की टिप्पणी:“केवल ‘चमार’ शब्द का इस्तेमाल अपने आप में यह स्थापित नहीं करता कि अपीलकर्ताओं ने उक्त शब्द का प्रयोग पीड़िता को उसके एससी/एसटी समुदाय से होने के आधार पर अपमानित या प्रताड़ित करने के इरादे या ज्ञान के साथ किया था।””
- धारा 319 CrPC की सीमाएं: सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के हरदीप सिंह बनाम पंजाब राज्य फैसले का संदर्भ देते हुए पीठ ने कहा कि धारा 319 CrPC के तहत समन जारी करने के लिए आरोप तय (Charge Framing) करने के स्तर से भी अधिक मजबूत और विश्वसनीय साक्ष्य की आवश्यकता होती है। अदालत ने कहा:“अपीलकर्ताओं की संलिप्तता को अकाट्य रूप से साबित करने वाली किसी विश्वसनीय और ठोस सामग्री के अभाव में, ट्रायल कोर्ट ने धारा 319 CrPC के तहत लापरवाही और हल्के ढंग से समन जारी करके कानूनी भूल की है।””
हाईकोर्ट की मुख्य टिप्पणियां और कानूनी आधार
- अपमान की मंशा अनिवार्य (Mens Rea Required)
- हाईकोर्ट ने कहा: “केवल ‘चमार’ शब्द का प्रयोग अपने आप में यह स्थापित नहीं करता कि अपीलाकर्ताओं ने इस शब्द का उपयोग SC/ST समुदाय से होने के आधार पर पीड़ित को अपमानित या नीचा दिखाने के इरादे या ज्ञान के साथ किया था।”
- कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के स्वर्ण सिंह बनाम राज्य और हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य के ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि केवल आपसी झगड़े या गाली-गलौज में जातिगत शब्द का प्रयोग होना SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त नहीं है; इसके लिए ‘जातिगत अपमान’ का इरादा होना आवश्यक है।
- धारा 319 CrPC / 358 BNSS के तहत समन भेजने का पैमाना
- पुलिस ने जांच के दौरान मुख्य आरोपी हिम्मत सिंह के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी और उसके पिता व भाई को क्लीन चिट (Exonerated) दे दी थी। लेकिन पीड़िता के अदालती बयान के आधार पर ट्रायल कोर्ट ने दोनों को समन जारी कर दिया था।
- सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के हरदीप सिंह बनाम पंजाब राज्य फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 319 CrPC (अतिरिक्त आरोपी को समन करना) एक असाधारण शक्ति है, जिसका इस्तेमाल बहुत सावधानी से और “मजबूत व ठोस सबूतों” (Sterling Material) के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
- जांच रिपोर्ट और बयान में भिन्नता
- कोर्ट ने पाया कि पुलिस को दिए गए शुरुआती बयानों (Section 161 और 164 CrPC) में पीड़िता ने इन दोनों अपीलाकर्ताओं को जातिसूचक शब्द कहने या धमकाने की कोई विशिष्ट भूमिका (Specific Role) नहीं सौंपी थी।
यह रहा अदालत का निर्णय
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट द्वारा 21 मार्च 2025 को पारित समन आदेश को पूरी तरह खारिज करते हुए वेगराज सिंह और दौलत के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।
केस अवलोकन (Case Snapshot)
| पहलू | विवरण |
| अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| जज | न्यायमूर्ति संतोष राय (Justice Santosh Rai) |
| मूल मामला | थाना इज्जतनगर, बरेली (FIR under Sec 376(2)(n) IPC & SC/ST Act) |
| अपीलकर्ता | वेगराज सिंह एवं अन्य (मुख्य आरोपी के पिता और भाई) |
| कोर्ट का आदेश | ट्रायल कोर्ट का समन आदेश (dated 21 March 2025) रद्द किया गया। |

