मुख्य बिंदु (Key Indicators)
- 44 साल की लंबी मुकदमेबाजी: वर्ष 1981 में अपराध हुआ, 1991 में आरोप (Charges) तय हुए, 2002 में निचली अदालत ने सजा सुनाई और 2024 में झारखंड हाईकोर्ट ने अपील खारिज की।
- आरोपियों की मृत्यु: मामले के कुल 6 मूल अभियुक्तों में से 2 की मृत्यु ट्रायल के दौरान और 3 की मृत्यु अपील लंबित रहने के दौरान हो गई। साइमन सोरेन (70 वर्ष) इस मामले में एकमात्र जीवित बचे अभियुक्त हैं।
- अदालतों के चक्कर: रजिस्ट्रार की रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि 1991 से लेकर अगले 11 वर्षों के भीतर मामला 5 बार एक ट्रायल कोर्ट से दूसरी अदालत में स्थानांतरित (Transfer) किया गया।
- भारत सरकार पक्षकार बनाई गई: देश भर की उच्च अदालतों में आपराधिक अपीलों के वर्षों पुराने अंबार से निपटने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को भारत सरकार (Union of India) को मामले में पक्षकार बनाने की अनुमति दी है।
नई दिल्ली: सर्वोच्च न्यायालय ने झारखंड उच्च न्यायालय में आपराधिक अपीलों (Criminal Appeals) के लंबित रहने की स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इसे “न्यायिक व्यवस्था की विफलता” करार दिया है। यह टिप्पणी 1981 के एक दोहरे हत्याकांड (Double Murder Case) के मामले में आई, जिसका फैसला ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट से होकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचने में लगभग 44 से 45 वर्ष लग गए।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने मामले के एकमात्र जीवित बचे 70 वर्षीय बुजुर्ग दोषी साइमन सोरेन की सजा को निलंबित करते हुए उन्हें तुरंत रिहा करने का आदेश दिया है।
Shocking Pendency:मामले की पृष्ठभूमि और 44 वर्षों का घटनाक्रम
- 1981: दोहरे हत्याकांड की घटना घटी।
- 1991: घटना के 10 साल बाद आरोप तय (Charges Framed) किए गए।
- 1991–2002: 11 वर्षों के दौरान केस को 5 बार अलग-अलग ट्रायल कोर्ट में ट्रांसफर किया गया। ट्रायल पूरा होने में कुल 22 वर्ष लगे और 2002 में सजा सुनाई गई।
- 2002–2024: हाईकोर्ट में दोषसिद्धि के खिलाफ अपील पर सुनवाई में फिर से 22 वर्ष लग गए और 2024 में फैसला आया।
- अभियुक्तों की स्थिति: मूल रूप से आरोपी बनाए गए 6 लोगों में से 2 की मौत आरोप तय होने से पहले हो गई, और 3 अन्य दोषियों की मौत हाईकोर्ट में अपील लंबित रहने के दौरान हो गई। अब केवल साइमन सोरेन जीवित बचे हैं।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य प्रेक्षण और कड़े निर्देश
- ‘अपराध गंभीर है, लेकिन 45 साल की प्रताड़ना को अनदेखा नहीं कर सकते’
- पीठ ने टिप्पणी की: “दोहरे हत्याकांड का जघन्य अपराध होने के बावजूद, हम पिछले 45 वर्षों में आरोपी द्वारा सही गई पीड़ा से अपनी आंखें नहीं मूंद सकते। आरोपी की उम्र, बीमारियों और हिरासत के दौरान अस्पताल में भर्ती होने की स्थिति को देखते हुए, हम सजा निलंबित कर तुरंत रिहाई का निर्देश देते हैं।”
- आरोपियों की मृत्यु और मुकदमे का हश्र
- मामले में नामांकित 6 मूल आरोपियों में से 2 की मौत आरोप तय होने से पहले ही हो गई थी।
- सजायाफ्ता 4 आरोपियों में से 3 की मौत हाईकोर्ट में अपील लंबित रहने के दौरान हो गई।
- वर्तमान में केवल साइमन सोरेन (70 वर्ष) ही जीवित बचे हैं, जो लगभग 2 साल 4 महीने की हिरासत काट चुके हैं।
- केंद्र सरकार (Union of India) को पक्षकार बनाया गया
- आपराधिक अपीलों की भारी पेंडेंसी के व्यापक राष्ट्रीय मुद्दे को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश दिए:
- भारत सरकार को पक्षकार बनाना: याचिकाकर्ता को इस मामले में भारत संघ (Union of India) को एक पक्षकार के रूप में शामिल (Implead) करने की अनुमति दी गई।
- अटॉर्नी जनरल/सॉलिसिटर जनरल को नोटिस: हाईकोर्ट के महापंजीयक द्वारा दायर अनुपालन हलफनामे की प्रति अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल के कार्यालय को सौंपने का निर्देश दिया गया।
- मूल रिकॉर्ड तलब: ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट से मूल केस रिकॉर्ड को भौतिक (Physical) और डिजिटल दोनों रूपों में 4 सप्ताह के भीतर मंगाया गया है ताकि संबंधित वकीलों को सॉफ्ट कॉपी उपलब्ध कराई जा सके।
- हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल द्वारा सौंपे गए हलफनामे में अपीलों के ‘चौंकाने वाले बकाए’ का खुलासा हुआ।
- सुप्रीम कोर्ट ने इस राष्ट्रीय समस्या से निपटने के लिए याचिकाकर्ता को भारत सरकार को पक्षकार बनाने की अनुमति दी और अटॉर्नी जनरल/सॉलिसिटर जनरल के कार्यालय को रिपोर्ट की कॉपी भेजने के निर्देश दिए।
- डिजिटल और भौतिक रिकॉर्ड तलब
- पीठ ने ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट से पूरे मामले के भौतिक (Physical) और डिजिटल रिकॉर्ड 4 सप्ताह के भीतर मंगाए हैं, ताकि 18 सितंबर 2026 को होने वाली अगली सुनवाई में प्रक्रियात्मक देरी के कारणों की विस्तृत समीक्षा की जा सके।
Shocking Pendency: सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां
न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा:
- न्यायिक विफलता का प्रतीक: अदालत ने रेखांकित किया कि ट्रायल में 22 साल और हाईकोर्ट में अपील के निपटारे में 22 साल लगना न्यायिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
- रजिस्ट्रार की रिपोर्ट पर सवाल: झारखंड हाईकोर्ट के महापंजीयक द्वारा दाखिल रिपोर्ट का अवलोकन करते हुए पीठ ने कहा कि यह रिपोर्ट आपराधिक अपीलों के निपटारे में “चौंकाने वाली पेंडेंसी” को उजागर करती है।
- रिपोर्ट में ट्रायल में देरी का कारण आरोपियों का 6 साल तक फरार रहना बताया गया था, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि 1991 में आरोप तय होने के बाद ट्रायल पूरा होने में लगे 12 वर्षों का कोई स्पष्टीकरण क्यों नहीं दिया गया।
- जिला एवं सत्र न्यायाधीश की रिपोर्ट से यह भी सामने आया कि 1991 के बाद से 11 वर्षों में यह मामला 5 बार एक ट्रायल कोर्ट से दूसरी अदालत में स्थानांतरित किया गया था।
वृद्ध दोषी की रिहाई का आदेश
पीठ ने कहा कि यद्यपि दोहरा हत्याकांड एक जघन्य अपराध है, लेकिन पिछले 45 वर्षों से अभियुक्त द्वारा झेली गई कानूनी प्रताड़ना और अनिश्चितता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता: दोहरे हत्याकांड के भयानक अपराध के बावजूद, हम पिछले 45 वर्षों में अभियुक्त द्वारा झेली गई मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना से आंखें नहीं मूंद सकते। विशेष रूप से उनकी गंभीर चिकित्सा स्थिति और राज्य के इस हलफनामे को देखते हुए कि वे हिरासत में रहते हुए अस्पताल में भर्ती हैं, हम सजा को निलंबित करते हैं और निर्देश देते हैं कि याचिकाकर्ता को तत्काल व्यक्तिगत मुचलके पर रिहा किया जाए।
मामले के मुख्य तथ्य और कानून का दृष्टिकोण
पीठ ने स्पष्ट किया कि यद्यपि दोहरा हत्याकांड एक गंभीर अपराध है, लेकिन बीते 45 वर्षों में अभियुक्त द्वारा झेली गई प्रताड़ना, उसकी लगभग 70 वर्ष की आयु, स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और हिरासत के दौरान अस्पताल में भर्ती रहने की स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सोरेन पहले ही 2 साल, 4 महीने और 12 दिनों की जेल काट चुके हैं।
Shocking Pendency: केस अवलोकन (Case Snapshot)
| पहलू | विवरण |
| अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला एवं न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन |
| केस का नाम | साइमन सोरेन बनाम झारखंड राज्य |
| मुख्य मुद्दा | ट्रायल में 22 साल और हाईकोर्ट अपील में 22 साल (कुल 44 वर्ष) की असाधारण देरी |
| अदालत का अंतरिम आदेश | बुजुर्ग दोषी की तत्काल रिहाई; केंद्र सरकार पक्षकार नामित; अगली सुनवाई 18 सितंबर 2026 को। |

