मुख्य बिंदु (Key Indicators)
- आपसी समझौता (MoU) छुपाया गया: माता-पिता के बीच वैवाहिक विवाद के निपटारे के लिए वित्तीय लेन-देन और बच्चों की कस्टडी पिता के पास रहने का एक एमओयू (MoU) हुआ था। तेलंगाना हाईकोर्ट ने भी इस समझौते को स्वीकार करते हुए पति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द की थी।
- तथ्यों का दुरुपयोग: याचिकाकर्ता मां ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि पति ने बच्चों को जबरन छीन लिया है और उनकी जानकारी गायब है। उसने अदालत से एमओयू और तेलंगाना हाईकोर्ट के पिछले आदेश की बात छुपा कर रखी।
- अदालत के समक्ष अंग्रेजी भाषा का नाटक: याचिकाकर्ता ने लीगल एड काउंसिल से कहा था कि वह अंग्रेजी नहीं समझती, लेकिन कोर्ट रूम में उसने एमओयू के दस्तावेजों को धाराप्रवाह अंग्रेजी में पढ़ा। जब छुपाने का कारण पूछा गया तो उसने कहा कि उसे यह महत्वपूर्ण नहीं लगा।
- जुर्माने की राशि बच्चों के नाम: कोर्ट ने मां की माफी को खारिज करते हुए उस पर ₹50,000 का जुर्माना लगाया। यह राशि दोनों बच्चों के नाम ₹25-25 हजार की फिक्स डिपॉजिट (FD) के रूप में जमा की जाएगी, जो उन्हें बालिग होने पर मिलेगी।
अमरावती: आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने नाबालिग बच्चों की कस्टडी से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि माता-पिता के बीच आपसी समझौते (Mutual Settlement) के तहत बच्चे पिता के पास हैं, तो बच्चों की कस्टडी की मांग वाली बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका विचारणीय (Maintainable) नहीं है।
न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहरी और न्यायमूर्ति पुरुषोत्तम कुमार चिंतालापुड़ी की खंडपीठ ने महत्वपूर्ण तथ्यों को अदालत से छिपाने और न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग करने के लिए मां की याचिका खारिज करते हुए उस पर ₹50,000 का जुर्माना लगाया।
पीठ की मुख्य टिप्पणियां
अदालत ने याचिका को दुर्भावनापूर्ण और प्रक्रिया का दुरुपयोग मानते हुए कहा: “जब याचिकाकर्ता और उसके पति के बीच आपसी सहमति से यह तय हो चुका था कि बच्चों की कस्टडी पूरी तरह से पिता के पास रहेगी, तो बच्चों को पिता के पास अवैध हिरासत (Illegal Custody) में नहीं कहा जा सकता। याचिकाकर्ता ने पूर्व के समझौते, समझौता ज्ञापन (MoU) और तेलंगाना उच्च न्यायालय के आदेश को छिपाकर यह याचिका दायर की। बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका विचारणीय नहीं है और याचिकाकर्ता ने महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाकर इस अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग किया है।”
मामले की पृष्ठभूमि और मां के आरोप
- मां का दावा: महिला ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर आरोप लगाया कि उसका पति दोनों नाबालिग बच्चों को जबरन छीनकर ले गया है और उनका कोई पता नहीं चल रहा है। उसने बच्चों को कोर्ट में पेश करने और प्राकृतिक अभिभावक होने के नाते कस्टडी सौंपने की मांग की थी।
- अदालत द्वारा परिजनों को तलब करना: महिला के इस दावे पर अदालत ने नोटिस जारी कर पति, सास और दोनों बच्चों को अदालत के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के लिए विवश किया।
अदालत के समक्ष उजागर हुए तथ्य
- समझौता ज्ञापन (MoU) की शर्त: राज्य सरकार ने अदालत को सूचित किया कि पति-पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद सुलझाने के लिए पहले ही एक समझौता हुआ था। समझौते के तहत पति ने वित्तीय निपटारे की शर्तें पूरी की थीं, जबकि बच्चों की देखभाल और कस्टडी पूरी तरह पिता को दी गई थी।
- तेलंगाना हाईकोर्ट का आदेश: इसी समझौते (MoU) के आधार पर तेलंगाना उच्च न्यायालय ने 18 सितंबर 2025 को पति के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द कर दिया था। महिला इस कार्यवाही में पक्षकार थी।
- अदालत को गुमराह करने का आचरण:
- महिला ने पहले दावा किया कि वह अंग्रेजी नहीं समझती, जिसके कारण उसे विधिक सेवा प्राधिकरण (Legal Aid) से वकील उपलब्ध कराया गया।
- हालांकि, अदालत में यह सामने आया कि वह अंग्रेजी अच्छी तरह जानती है और उसने भरी अदालत में धाराप्रवाह अंग्रेजी में समझौता पत्र पढ़ा।
- जब उससे पूछा गया कि उसने यह महत्वपूर्ण दस्तावेज याचिका में क्यों छिपाया, तो उसने गैर-जिम्मेदाराना जवाब दिया कि उसे यह प्रासंगिक नहीं लगा।
अंतिम आदेश व जुर्माने का निर्देश
उच्च न्यायालय ने महिला द्वारा मांगी गई माफी को अस्वीकार करते हुए याचिका खारिज कर दी और निम्नलिखित निर्देश दिए:
- याचिकाकर्ता (मां) पर तथ्यों को छिपाने के लिए ₹50,000 का हर्जाना/जुर्माना लगाया गया।
- अदालत ने निर्देश दिया कि इस राशि को दोनों बच्चों के नाम पर सावधि जमा (Fixed Deposit – FD) के रूप में ₹25,000-₹25,000 जमा कराया जाए, जो उनके वयस्क (Majority) होने पर उन्हें देय होगा।
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहरी और न्यायमूर्ति पुरुषोत्तम कुमार चिंतालापुडी की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा: जब याचिकाकर्ता और पांचवें प्रतिवादी (पति) के बीच यह आपसी सहमति बन चुकी थी कि बच्चों की कस्टडी पूरी तरह पिता के पास रहेगी, तो बच्चों को पिता की अवैध हिरासत में नहीं माना जा सकता। याचिकाकर्ता ने महत्वपूर्ण तथ्यों को छुपाकर इस अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग किया है। अदालत की मशीनरी का गलत इस्तेमाल करने के कारण यह याचिका चलने योग्य नहीं है।
एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | विवरण जानकारी |
| संबंधित अदालत | आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय (Andhra Pradesh High Court) |
| पीठ (Bench) | न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहरी और न्यायमूर्ति पुरुषोत्तम कुमार चिंतालापुडी |
| याचिका का प्रकार | बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus Petition under Article 226) |
| मुख्य विवाद | कस्टडी समझौते के बावजूद मां द्वारा पिता पर अवैध हिरासत का आरोप |
| अदालत का निर्णय | याचिका खारिज; मां पर ₹50,000 जुर्माना, जो बच्चों के नाम FD होगा। |

