मुख्य बिंदु (Key Indicators)
- मरणासन्न बयान पर संदेह: मृतका के भाई (PW-1) ने जिरह में स्वीकार किया कि मजिस्ट्रेट द्वारा बयान दर्ज करते समय उसके परिवार के सदस्य (बेटा, उसकी पत्नी और बुआ) वहां मौजूद थे। कोर्ट ने कहा कि परिवार की मौजूदगी में दर्ज बयान का कोई कानूनी महत्व नहीं रह जाता।
- पत्नी को बचाने में जला था पति: बचाव पक्ष के डॉक्टरों की गवाही से साबित हुआ कि पति खुद भी गंभीर रूप से जला हुआ था, जो इस बात का पर्याप्त प्रमाण था कि उसने अपनी पत्नी को बचाने का प्रयास किया था।
- गोद लेने को लेकर पारिवारिक विवाद: दंपति की शादी को 18 साल हो चुके थे और कोई संतान नहीं थी। विवाद इस बात पर था कि पति के भाई के बच्चे को गोद लिया जाए या पत्नी के मायके के बच्चे को। कोर्ट ने माना कि शादी के 18 साल बाद दहेज आदि की कोई मांग नहीं थी।
- अस्पताल ले जाने का तथ्य: मृतका को अस्पताल उसकी सास और पति द्वारा ही ले जाया गया था, जिससे आरोपी की दुर्भावना पर संदेह पैदा हुआ।
प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पत्नी को मिट्टी का तेल डालकर जिंदा जलाने के आरोप में उम्रकैद की सजा काट रहे पति को दोषमुक्त (Acquit) कर दिया है।
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने मुरादाबाद की फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वारा आईपीसी की धारा 304 (गैर-इरादतन हत्या) के तहत सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को रद्द करते हुए अपीलकर्ता पति को “ससम्मान बरी” (Honourably Acquitted) कर दिया। न्यायालय ने पाया कि जिस मृत्युकालिक बयान (Dying Declaration) के आधार पर पति को दोषी ठहराया गया था, वह मजिस्ट्रेट द्वारा मायके पक्ष और परिवार के अन्य सदस्यों की मौजूदगी में दर्ज किया गया था, इसलिए उस पर सुरक्षित रूप से भरोसा नहीं किया जा सकता [जगन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य]।
मृत्युकालिक बयान को खारिज करने के मुख्य कारण
- परिजनों की प्रत्यक्ष उपस्थिति: मृतका के भाई (PW-1) ने जिरह (Cross-examination) के दौरान स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि जब मजिस्ट्रेट बयान दर्ज कर रहे थे, तब मृतका का भाई, उसकी पत्नी और बुआ सहित पूरा परिवार वहां मौजूद था।पीठ ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा:“इस तथ्य को देखते हुए कि मृत्युकालिक बयान परिवार के सभी सदस्यों की मौजूदगी में दर्ज कराया गया था, इसे कोई महत्व नहीं दिया जा सकता (No importance could be attached to it)।”
- ट्यूटरिंग (सिखाने-पढ़ाने) की संभावना: कानून का स्थापित सिद्धांत है कि मृत्युकालिक बयान बिना किसी बाहरी प्रभाव या दबाव के स्वेच्छा से दर्ज होना चाहिए। परिजनों की मौजूदगी में दिए गए बयान में ट्यूटरिंग की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
पति के निर्दोष होने के पक्ष में प्रमुख साक्ष्य
- पत्नी को बचाने में पति का झुलसना: रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों से साबित हुआ कि आग बुझाने और पत्नी को बचाने के प्रयास में पति (अपीलकर्ता) खुद भी गंभीर रूप से झुलस गया था। बचाव पक्ष के डॉक्टर ने भी पुष्टि की कि पति के शरीर पर आए जलने के निशान किसी जलते हुए व्यक्ति को बचाने के दौरान आने वाली चोटों से मेल खाते हैं।
- सास द्वारा अस्पताल ले जाना: एक अन्य गवाह (डॉक्टर) ने गवाही दी कि घटना के बाद झुलसी महिला को अस्पताल पहुंचाने वाली अपीलकर्ता की मां ही थी।
- दहेज प्रताड़ना का कोई मामला नहीं: अदालत ने नोट किया कि दोनों के विवाह को 18 वर्ष बीत चुके थे, इसलिए दहेज की किसी भी मांग या प्रताड़ना का कोई कानूनी अनुमान नहीं लगाया जा सकता।
विवाद का वास्तविक कारण: बच्चा गोद लेने का पारिवारिक झगड़ा
अदालत ने पाया कि शादी के 18 साल बाद भी दंपत्ति की कोई संतान नहीं थी:
- मृतका का मायका पक्ष चाहता था कि उसके परिवार से किसी बच्चे को गोद (Adopt) लिया जाए।
- अपीलकर्ता पति का परिवार चाहता था कि उसके भाई के बच्चे को गोद लिया जाए।
पीठ ने अवलोकन किया: यह घटना परिवार में इस बात को लेकर उपजे तनाव के कारण हुई थी कि किस पक्ष का बच्चा गोद लिया जाए… परिस्थितियों और पति के झुलसने के साक्ष्यों को देखते हुए यह निश्चितता के साथ नहीं कहा जा सकता कि मृतका पर आरोपी द्वारा मिट्टी का तेल डालकर आग लगाई गई थी। निश्चित रूप से इस घटना के लिए पति को सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
अंतिम निर्णय
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि मृतका ने खुद को आग लगाई थी या यह आरोपी का कृत्य था। संदेह का लाभ और मृत्युकालिक बयान के अविश्वसनीय होने के आधार पर अपील मंजूर की गई तथा ट्रायल कोर्ट के 2018 के दोषसिद्धि के आदेश को पूरी तरह निरस्त कर दिया गया।
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने साक्ष्यों का विश्लेषण करते हुए कहा: इस तथ्य को देखते हुए कि मरणासन्न बयान सभी पारिवारिक सदस्यों की उपस्थिति में दर्ज कराया गया था, इसे कोई महत्व नहीं दिया जा सकता। इसके अलावा, इस बात के पर्याप्त साक्ष्य हैं कि पति ने अपनी पत्नी को बचाने की कोशिश की थी और इस प्रक्रिया में वह स्वयं भी जल गया था। इन परिस्थितियों में यह निश्चितता के साथ नहीं कहा जा सकता कि आरोपी ने मिट्टी का तेल डालकर आग लगाई थी। इसलिए पति को इस घटना के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष संदेह से परे अपराध साबित करने में विफल रहा, जिसके आधार पर पति को सभी आरोपों से सम्मानपूर्वक बरी कर दिया गया।
एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | विवरण जानकारी |
| केस/अपील शीर्षक | जगन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (Jagan v. State of U.P.) |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| पीठ (Bench) | न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा और न्यायमूर्ति अचल सचदेव |
| घटना की तिथि | 23 दिसंबर 2015 (मुरादाबाद) |
| अदालत का निर्णय | 2018 का निचली अदालत का सजा का आदेश रद्द; पति सम्मानपूर्वक बरी (Honourably Acquitted)। |

