Monday, August 24, 2026
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Model Employer: मॉडल एम्प्लॉयर होने के नाते भारत सरकार सार्वजनिक रोजगार में समानता के अधिकार का उल्लंघन नहीं कर सकती; कलकत्ता हाईकोर्ट

मुख्य बिंदु (Key Indicators)

  • UPSC द्वारा उपयुक्त पाए गए डॉक्टर: 1994-97 के दौरान एडहॉक आधार पर नियुक्त 25 डॉक्टरों के नियमितीकरण का प्रस्ताव संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) को भेजा गया था। UPSC ने उनके ACRs और प्रदर्शन के आधार पर सभी 25 डॉक्टरों को ‘फिट’ (FIT) पाया था।
  • समान स्थिति (Similarly Situated): 25 में से 24 डॉक्टरों को उनकी शुरुआती नियुक्ति की तारीख से नियमित कर दिया गया था। याचिकाकर्ता डॉक्टर के मामले में भी तथ्य पूरी तरह समान थे, इसलिए उनके साथ अलग व्यवहार करना कानून का उल्लंघन है।
  • ‘In Personam’ का तर्क खारिज: केंद्र सरकार का तर्क था कि पिछले अदालती आदेश केवल विशिष्ट व्यक्तियों के लिए थे (In personam) और इन्हें मिसाल नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि सभी 25 डॉक्टरों का मामला आपस में जुड़ा हुआ था।
  • पूर्वलक्षी (Retrospective) नियमितीकरण: कोर्ट ने माना कि जब UPSC ने सभी की उपयुक्तता एक साथ तय की थी, तो याचिकाकर्ता को शुरुआती नियुक्ति की तारीख से ही नियमितीकरण और उसके परिणामी लाभ मिलने चाहिए।

कोलकाता: कलकत्ता हाईकोर्ट ने तदर्थ (Ad-hoc) कर्मचारियों के नियमितीकरण (Regularization) के मामले में व्यवस्था दी है कि समान स्थिति वाले सभी कर्मचारियों के साथ एक समान व्यवहार किया जाना चाहिए।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश (ACJ) तपाब्रत चक्रवर्ती और न्यायमूर्ति पार्थ सारथी चटर्जी की खंडपीठ ने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (CAT) के आदेश को बरकरार रखते हुए भारत सरकार द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज कर दिया।अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तथ्य और परिस्थितियां पूरी तरह समान हों, तो सरकार किसी कर्मचारी को यह कहकर नियमितीकरण से वंचित नहीं कर सकती कि पूर्व में दिया गया अदालती आदेश केवल विशिष्ट व्यक्ति पर लागू (In Personam) था।

मुख्य कानूनी बिंदु व सिद्धांत

  • मॉडल नियोक्ता का दायित्व: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भारत संघ (Union of India) एक ‘आदर्श नियोक्ता’ (Model Employer) है और वह सार्वजनिक रोजगार के मामलों में संविधान के तहत कानून के समक्ष समानता (Equality in Law) और समान अवसर के मूलभूत सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं कर सकता।
  • समान स्थिति में समान व्यवहार: यदि एक ही चयन प्रक्रिया और यूपीएससी (UPSC) की एक ही सिफारिश सूची से चयनित अन्य 24 तदर्थ डॉक्टरों को उनकी प्रारंभिक नियुक्ति तिथि से नियमितीकरण का लाभ दिया गया है, तो समान स्थिति वाले 25वें डॉक्टर को इससे अलग नहीं किया जा सकता।
  • ‘इन पर्सोनम’ (In Personam) के तर्क की अस्वीकृति: अदालत ने सरकार के इस तर्क को खारिज कर दिया कि ट्रिब्यूनल के पिछले आदेश केवल व्यक्तिगत प्रकृति के थे और उन्हें नजीर (Precedent) नहीं माना जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

  • तदर्थ नियुक्तियां (1994-1997): श्रम मंत्रालय के विभिन्न कार्यालयों में 1994 से 1997 के दौरान डॉक्टरों की तदर्थ आधार पर नियुक्ति की गई थी।
  • यूपीएससी की सिफारिश (2016): स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के प्रस्ताव पर संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) ने एसीआर (ACR), बायोडाटा और व्यक्तिगत साक्षात्कार के आधार पर 25 तदर्थ डॉक्टरों का मूल्यांकन किया और उन्हें सेंट्रल हेल्थ सर्विस (CHS) के तहत मेडिकल ऑफिसर ग्रेड के लिए ‘योग्य’ (FIT) पाया।
  • राष्ट्रपति की स्वीकृति: 4 फरवरी 2016 को राष्ट्रपति द्वारा यूपीएससी की सिफारिश स्वीकार किए जाने के बाद इन डॉक्टरों को 18 सितंबर 2014 से नियमित नियुक्ति दी गई।
  • प्रारंभिक तिथि से नियमितीकरण की मांग: सूची में शामिल डॉक्टरों ने अपनी मूल/प्रारंभिक नियुक्ति तिथि (1990 के दशक) से सेवा नियमित करने के लिए न्यायाधिकरण का रुख किया। ट्रिब्यूनल ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया, जिसे हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट (SLP खारिज करके) ने भी बरकरार रखा।

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विवाद और दोनों पक्षों के तर्क

  • केंद्र सरकार की दलीलें
    • सरकार ने तर्क दिया कि चूंकि मूल नियुक्तियां भर्ती नियमों के तहत नहीं बल्कि तदर्थ थीं, इसलिए नियमितीकरण केवल भविष्य की तारीख (Prospective) से प्रभावी हो सकता है, पिछली तिथि (Retrospective) से नहीं, क्योंकि इससे मौजूदा वरिष्ठता (Seniority) प्रभावित हो सकती है।
    • सरकार का कहना था कि अन्य डॉक्टरों के पक्ष में आए आदेश In Personam थे और उन्हें इस मामले में मिसाल के रूप में लागू करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
  • प्रतिवादी डॉक्टर का तर्क
    • प्रतिवादी ने बताया कि यूपीएससी ने सभी 25 डॉक्टरों की योग्यता का एक साथ मूल्यांकन किया था और शेष सभी 24 डॉक्टरों को प्रारंभिक नियुक्ति तिथि से सभी परिणामी लाभों (Consequential Benefits) के साथ नियमित किया जा चुका है।

उच्च न्यायालय के प्रमुख निष्कर्ष

कलकत्ता उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने रिकॉर्ड का विश्लेषण करने के बाद पाया:

  1. सभी 25 तदर्थ डॉक्टरों के मामले आपस में अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं।
  2. केंद्र सरकार ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकी जिससे यह साबित हो कि प्रतिवादी डॉक्टर की स्थिति शेष 24 डॉक्टरों से किसी भी तरह भिन्न थी।
  3. जब यूपीएससी ने एक ही सिफारिश के तहत सभी को उपयुक्त पाया और 24 डॉक्टरों को आरंभिक तिथि से नियमितीकरण का लाभ मिल चुका है, तो प्रतिवादी के मामले में भेदभावपूर्ण रुख अपनाना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।

अंतिम आदेश

उच्च न्यायालय ने केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण के आदेश को यथावत रखा, जिसके तहत केंद्र सरकार को प्रतिवादी डॉक्टर की नियुक्ति को उसकी प्रारंभिक नियुक्ति तिथि से नियमित करने और 3 महीने के भीतर सभी परिणामी लाभ प्रदान करने का निर्देश दिया गया था।

तदनुसार, भारत सरकार की रिट याचिका खारिज कर दी गई।

हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

खंडपीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा: भारत सरकार एक ‘मॉडल नियोक्ता’ (Model Employer) होने के नाते कानून के समक्ष समानता के मौलिक सिद्धांत और सार्वजनिक रोजगार के मामलों में समान व्यवहार का उल्लंघन नहीं कर सकती। जब 25 एडहॉक डॉक्टरों की उपयुक्तता का आकलन UPSC द्वारा एक साथ किया गया था और अन्य 24 डॉक्टरों को शुरुआती नियुक्ति तिथि से नियमित किया जा चुका है, तो समान स्थिति वाले इस डॉक्टर को उससे वंचित नहीं किया जा सकता।

एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)

विवरणविवरण जानकारी
केस शीर्षकभारत संघ एवं अन्य बनाम संबंधित डॉक्टर
संबंधित अदालतकलकत्ता उच्च न्यायालय (Calcutta High Court)
पीठ (Bench)ACJ तपोब्रत चक्रवर्ती और न्यायमूर्ति पार्थ सारथी चटर्जी
मूल सिद्धांतसार्वजनिक रोजगार में समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14 और 16)
अदालत का निर्णयकेंद्र सरकार की याचिका खारिज; एडहॉक डॉक्टर को शुरुआती नियुक्ति की तारीख से नियमितीकरण का आदेश बरकरार।
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