मुख्य बिंदु (Key Indicators)
- असीमित स्वतंत्रता समाज के लिए हानिकारक: हाईकोर्ट ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामूहिक जन-कल्याण के बीच संतुलन आवश्यक है। अनियंत्रित स्वतंत्रता से समाज को बड़ा नुकसान पहुंच सकता है।
- आवश्यक धार्मिक प्रथा बनाम तरीका: कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के नज़ीरों (M. Ismail Faruqui Case) का हवाला देते हुए कहा कि संवैधानिक सुरक्षा केवल उन प्रथाओं को मिलती है जो धर्म का अभिन्न अंग (Essential & Integral Part) हैं, न कि उसके आयोजन के हर तरीके या स्थान को।
- श्रद्धालुओं की संख्या सीमित करने का विवाद: याचिकाकर्ता का कहना था कि 1958 से हर साल भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकादशी को पारंपरिक मार्ग से जुलूस निकालने का लाइसेंस मिलता था। पहले 200 लोगों की अनुमति थी, जिसे घटाकर 5 कर दिया गया।
- प्रशासनिक रिपोर्ट व हिंसा का संज्ञान: राज्य सरकार ने कोर्ट को अवगत कराया कि 5 लोगों की अनुमति के बावजूद 1,700 से 2,000 लोग एकत्र हो जाते थे। 2024 में भीड़ ने बीडीओ की सरकारी गाड़ी में आग लगा दी थी और पुलिस पर पथराव किया था।
- भविष्य की आशंकाएं समयपूर्व: कोर्ट ने भविष्य में भी केवल 5 लोगों की अनुमति मिलने की याचिकाकर्ता की आशंका को समयपूर्व माना और कहा कि जुलूस की अनुमति तत्कालीन कानून-व्यवस्था की स्थिति पर निर्भर करेगी।
पटना: पटना उच्च न्यायालय ने धार्मिक जुलूस निकालने के अधिकार और कानून-व्यवस्था के संतुलन पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि संविधान के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार पूर्ण (Absolute) नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक व्यवस्था और उचित प्रतिबंधों (Reasonable Restrictions) के अधीन है।
न्यायमूर्ति आलोक कुमार की एकल पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए रेखांकित किया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामूहिक लोक कल्याण, राष्ट्रीय सुरक्षा एवं सामाजिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाना राज्य का वैधानिक दायित्व है। अदालत ने सीवान जिले के हथौड़ा गांव में ‘अखाड़ा नंबर 1’ के महावीरी जुलूस पर प्रशासन द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों और मार्ग परिवर्तन को बरकरार रखते हुए याचिका खारिज कर दी।
उच्च न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियां
पीठ ने संविधान के अनुच्छेदों के दायरे को स्पष्ट करते हुए कहा: “उचित प्रतिबंधों (Reasonable Restrictions) का अर्थ व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सामूहिक लोक कल्याण, राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक व्यवस्था के साथ संतुलित करने के लिए राज्य द्वारा लगाई गई कानूनी सीमाओं से है। इसलिए, कोई भी संवैधानिक अधिकार पूर्ण नहीं है; अनियंत्रित स्वतंत्रता (Unchecked Freedom) व्यापक स्तर पर समाज को भारी नुकसान पहुंचा सकती है।”
धार्मिक प्रथाओं के आवश्यक तत्वों पर अदालत ने कहा: “यद्यपि धर्म को मानने, आचरण करने और धार्मिक जुलूस निकालने का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(b) और अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित है, लेकिन यह अधिकार निरपेक्ष नहीं है। संवैधानिक संरक्षण केवल उसी हिस्से को प्राप्त है जो धार्मिक आचरण का अनिवार्य और अभिन्न अंग (Essential and Integral Part) है, न कि उसे किसी भी रूप या तरीके से आयोजित करने के लिए।”
मामले की पृष्ठभूमि और विवाद
- याचिकाकर्ता की मांग: याचिकाकर्ता ने सीवान के हुसैनगंज थाना क्षेत्र के हथौड़ा गांव में भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकादशी को अखाड़ा नंबर 1 के महावीरी जुलूस को पारंपरिक मार्ग से निकालने और कम से कम 300 श्रद्धालुओं को शामिल होने की अनुमति देने का निर्देश देने की मांग की थी।
- प्रतिबंधों पर आपत्ति: याचिकाकर्ता का तर्क था कि यह अनुमति 1958 से लगातार मिल रही थी। पहले 200 लोगों की अनुमति थी, जिसे घटाकर क्रमशः 150, 100 और 2023 से मात्र 5 व्यक्तियों तक सीमित कर दिया गया तथा पारंपरिक मार्ग भी बदल दिया गया।
राज्य सरकार की दलीलें
राज्य सरकार की ओर से पेश वकील ने पाबंदियों को उचित ठहराते हुए गंभीर तथ्य सामने रखे:
- कानून-व्यवस्था का उल्लंघन: प्रशासन ने बताया कि शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए सीमित लाइसेंस दिए जाते हैं। 5 लोगों की अनुमति के बावजूद 2015 से 2022 के बीच 1,700 से 2,000 लोग एकत्र हुए, जिससे कई आपराधिक मामले दर्ज हुए।
- हिंसा और आगजनी की घटनाएं: राज्य ने अदालत को अवगत कराया कि वर्ष 2024 में जुलूस के दौरान भीड़ ने हुसैनगंज के प्रखंड विकास अधिकारी (BDO) के सरकारी वाहन में आग लगा दी थी और पुलिसकर्मियों पर पथराव किया था।
सुप्रीम कोर्ट की नज़ीरें और हाईकोर्ट के निष्कर्ष
- डॉ. एम. इस्माइल फारूकी बनाम भारत संघ: पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि प्रार्थना या पूजा करना एक धार्मिक प्रथा है, लेकिन हर स्थान पर ऐसा करना धर्म का अभिन्न अंग नहीं माना जा सकता, जब तक कि उस स्थान का विशेष धार्मिक महत्व न हो।
- चर्च ऑफ गॉड बनाम के.के.आर. मैजेस्टिक कॉलोनी वेलफेयर: अदालत ने दोहराया कि कोई भी धर्म लाउडस्पीकर बजाकर या आम जनता की शांति भंग करके प्रार्थना करने का निर्देश नहीं देता।
- सार्वजनिक शांति और पंथनिरपेक्षता: पीठ ने कहा कि भारत के संविधान के मूल ढांचे में धर्मनिरपेक्षता (Secularism) और ‘सर्वधर्म समभाव’ निहित है। व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता के साथ-साथ आवासीय क्षेत्रों में सार्वजनिक शांति (Public Tranquility) बनाए रखना सर्वोपरि है।
- भविष्य की आशंका समयपूर्व: अदालत ने याचिकाकर्ता की इस आशंका को अपरिपक्व माना कि भविष्य में भी केवल 5 लोगों की ही अनुमति दी जाएगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुमति उस समय की मौजूदा कानून-व्यवस्था की स्थिति पर निर्भर करती है और काल्पनिक परिस्थितियों पर आदेश जारी नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने याचिका को आधारहीन पाते हुए पूरी तरह खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
न्यायमूर्ति आलोक कुमार ने फैसला सुनाते हुए कहा: “भारत में धर्मनिरपेक्षता (Secularism) संविधान के बुनियादी ढांचे (Basic Structure) का हिस्सा है। राज्य सभी धर्मों के प्रति तटस्थ रहता है और ‘सर्वधर्म समभाव’ का पालन करता है। धार्मिक या नागरिक जुलूस निकालना एक मान्यता प्राप्त नागरिक और मौलिक अधिकार है, लेकिन यह लोक व्यवस्था (Public Order), नैतिकता और स्वास्थ्य की शर्तों के अधीन है। शांति व सौहार्द बनाए रखने के लिए राज्य द्वारा लगाए गए वाजिब कानूनी प्रतिबंध पूरी तरह संवैधानिक हैं।”
एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | विवरण जानकारी |
| संबंधित अदालत | पटना उच्च न्यायालय (Patna High Court) |
| पीठ (Bench) | न्यायमूर्ति आलोक कुमार (Justice Alok Kumar) |
| मामला/स्थान | अखाड़ा नंबर 1 द्वारा महावीरी जुलूस (हथौड़ा गांव, हुसैनगंज, सिवान) |
| संविधान के अनुच्छेद | अनुच्छेद 19(1)(b) (शांतिपूर्ण जमावड़ा) और अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतंत्रता) |
| अदालत का निर्णय | याचिका खारिज; लोक व्यवस्था के हित में जुलूस पर प्रशासनिक पाबंदियां जायज। |

