मुख्य बिंदु (Key Indicators)
- पीड़ित महिला को उपचारविहीन नहीं छोड़ा जा सकता: कोर्ट ने कहा कि यदि ICC द्वारा जांच किए बिना शिकायत खारिज करने के फैसले को ‘सिफारिश’ न माना जाए, तो पीड़ित महिला के पास कोई कानूनी उपचार (Remedy) ही नहीं बचेगा, जो कि POSH अधिनियम के मूल उद्देश्य के विपरीत होगा।
- धारा 11 और 13 का उदार निर्वचन: यदि ICC धारा 11 के तहत जांच प्रक्रिया का पालन किए बिना कोई फैसला सुनाती है, तो केवल जांच न करने की त्रुटि के आधार पर उस फैसले को ‘सिफारिश’ के दायरे से बाहर नहीं रखा जा सकता।
- कर्मचारी/नियोक्ता का रुख: ICC के ऐसे फैसले पर नियोक्ता (Employer) आगे कोई कार्रवाई न करने का निर्णय लेता है। इस कारण यह फैसला धारा 13(2) के तहत प्रभावी रूप से ‘सिफारिश’ का रूप ले लेता है।
- इंडस्ट्रियल कोर्ट को निर्देश: हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपील में औद्योगिक अदालत (Industrial Court) यह तय करेगी कि क्या ICC का यह निष्कर्ष सही था कि शिकायत में यौन उत्पीड़न का कोई पहलू शामिल नहीं था।
मुंबई: बॉम्बे हाईकोर्ट ने कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 (POSH Act) के तहत एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है।
न्यायमूर्ति संदीप मार्ने की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि आईसीसी के ऐसे निर्णय को ‘सिफारिश’ नहीं माना गया, तो पीड़ित महिला कानूनी उपाय से पूरी तरह वंचित (Remediless) हो जाएगी। अदालत ने फैसला सुनाया है कि यदि आंतरिक शिकायत समिति (ICC) बिना कोई औपचारिक जांच (Inquiry) किए शुरुआत में ही (At the threshold) किसी शिकायत को यह कहते हुए खारिज कर देती है कि उसमें कोई ‘यौन उत्पीड़न का तत्व’ (Sexual Element) शामिल नहीं है, तो भी ऐसी अस्वीकृति अधिनियम की धारा 13 के तहत एक ‘सिफारिश’ (Recommendation) मानी जाएगी और इसके खिलाफ औद्योगिक न्यायालय (Industrial Court) में अपील दायर की जा सकती है [मेपल इंफ्रा बनाम संबंधित पक्ष]।
उच्च न्यायालय की मुख्य टिप्पणियां
पीठ ने पोश अधिनियम की व्याख्या करते हुए कहा: यदि आंतरिक समिति धारा 11 के तहत निर्धारित तरीके से जांच नहीं करती है, तो यह उसके निर्णय को दूषित कर सकता है। हालांकि, केवल जांच न करने मात्र से समिति का निर्णय धारा 13 के तहत ‘सिफारिश’ के दायरे से बाहर नहीं हो जाएगा। भले ही आईसीसी कोई औपचारिक जांच न करे लेकिन शिकायत पर कोई निर्णय लेती है, तो ऐसा निर्णय पोश अधिनियम की धारा 13(2) या 13(3) के अर्थ में एक ‘सिफारिश’ ही होगा।
अधिनियम के कल्याणकारी उद्देश्य पर बल देते हुए अदालत ने कहा: पोश अधिनियम के प्रावधानों की उदार व्याख्या (Liberal Interpretation) की जानी चाहिए और किसी भी संशय की स्थिति में इसका अर्थ उन व्यक्तियों के पक्ष में निकाला जाना चाहिए जिनके लाभ के लिए यह कानून बनाया गया है। यदि धारा 13 और धारा 18 की सख्त व्याख्या की गई, तो आईसीसी द्वारा जांच न करने की विफलता के कारण पीड़ित महिला उपचारहीन हो जाएगी। ऐसी स्थिति से बचने के लिए आईसीसी के प्रारंभिक निष्कर्ष को भी ‘सिफारिश’ माना जाना चाहिए ताकि उस पर अपील हो सके।
मामले की पृष्ठभूमि और विवाद
- मामला: यह विवाद एक इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट ‘मेपल इंफ्रा’ (Maple Infra) के कर्मचारियों और एक महिला कर्मचारी के बीच था।
- आईसीसी का फैसला (अक्टूबर 2025): एक वरिष्ठ सहकर्मी के खिलाफ महिला कर्मचारी की यौन उत्पीड़न की शिकायत पर आईसीसी ने बिना धारा 11 की विस्तृत जांच किए ईमेल के जरिए यह निर्णय दिया कि शिकायत में कोई ‘यौन तत्व’ नहीं है और इसे खारिज कर दिया।
- औद्योगिक न्यायालय का रुख (मई 2026): पीड़ित महिला ने पोश अधिनियम की धारा 18 के तहत इस फैसले को औद्योगिक न्यायालय में चुनौती दी। औद्योगिक न्यायालय ने अपील को विचारणीय (Maintainable) माना और आईसीसी को नए सिरे से विचार करने का आदेश दिया।
- हाईकोर्ट में चुनौती: कंपनी के सह-कर्मचारियों ने औद्योगिक अदालत के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए तर्क दिया कि चूंकि धारा 11 के तहत कोई औपचारिक जांच नहीं हुई थी, इसलिए आईसीसी का फैसला धारा 13 के तहत औपचारिक ‘सिफारिश’ नहीं है और इसके खिलाफ धारा 18 में अपील दाखिल नहीं हो सकती।
अदालत का कानूनी तर्क व सादृश्य (Analogy)
न्यायमूर्ति संदीप मार्ने ने एक उदाहरण देते हुए समझाया:
- यदि आईसीसी बिना जांच के किसी कर्मचारी की सेवा समाप्त करने की सिफारिश कर दे, तो जांच न होने की खामी के बावजूद वह निर्णय कर्मचारी के लिए धारा 13(3) के तहत ‘सिफारिश’ माना जाएगा जिसके खिलाफ वह अपील कर सकता है।
- उसी प्रकार, यदि आईसीसी बिना जांच किए शिकायत को सीधे खारिज कर देती है, तो नियोक्ता उस पर आगे कोई कार्रवाई नहीं करता। अतः यह धारा 13(2) के तहत एक सिफारिश बन जाती है, जिसे चुनौती देने का अधिकार शिकायतकर्ता महिला के पास है।
- विधायिका का उद्देश्य उन समितियों को सुरक्षा देना नहीं है जो धारा 11(1) के जांच के वैधानिक आदेश का उल्लंघन करती हैं।
अंतिम आदेश
बॉम्बे हाईकोर्ट ने व्यवस्था दी कि:
- आईसीसी का अक्टूबर 2025 का निर्णय धारा 13 के तहत एक ‘सिफारिश’ है और पोश अधिनियम की धारा 18 के तहत औद्योगिक अदालत में विचारणीय (Appeallable) है।
- औद्योगिक अदालत अपील की विचारणीयता तय करते समय मामले के गुण-दोष (Merits) पर सीधे टिप्पणी करने से बच सकती थी।
- तदनुसार, उच्च न्यायालय ने औद्योगिक न्यायालय को निर्देश दिया कि वह पीड़ित महिला की अपील पर नए सिरे से मेरिट के आधार पर विचार करे और यह तय करे कि क्या आईसीसी का यह निष्कर्ष सही था कि शिकायत में यौन उत्पीड़न का कोई तत्व नहीं था।
हाईकोर्ट का वैधानिक विश्लेषण
न्यायमूर्ति संदीप मारणे ने 64 पन्नों के विस्तृत फैसले में कहा: POSH अधिनियम के प्रावधानों की व्याख्या न केवल उदारतापूर्वक की जानी चाहिए, बल्कि किसी भी भ्रम की स्थिति में इसका झुकाव उस वर्ग (महिलाओं) के पक्ष में होना चाहिए जिसके लाभ के लिए यह कानून बनाया गया है। यदि धाराओं की सख्त व्याख्या की जाएगी, तो ICC द्वारा जांच न करने की विफलता के कारण पीड़ित महिला पूरी तरह से उपचारविहीन (Remediless) हो जाएगी। इसलिए ऐसे प्रत्येक फैसले को ‘सिफारिश’ माना जाना चाहिए ताकि पीड़ित अपील कर सके।
मामले की पृष्ठभूमि: यह फैसला ‘मेपल इंफ्रा’ (Maple Infra) कंपनी के कर्मचारियों द्वारा दायर याचिका पर आया, जिन्होंने औद्योगिक अदालत के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें एक महिला कर्मचारी की याचिका को स्वीकार करते हुए ICC के अक्टूबर 2025 के फैसले को अपीलीय माना गया था। हाईकोर्ट ने औद्योगिक अदालत के उस फैसले को सही ठहराते हुए मामले को नए सिरे से मेरिट के आधार पर तय करने का निर्देश दिया।
एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | विवरण जानकारी |
| संबंधित अदालत | बॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court) |
| पीठ (Bench) | न्यायमूर्ति संदीप मारणे (Justice Sandeep Marne) |
| संबंधित कानून | POSH अधिनियम, 2013 की धारा 11, 13 और 18 |
| मूल प्रश्न | क्या बिना जांच के ICC द्वारा ‘यौन तत्व न होने’ पर शिकायत खारिज करने का आदेश अपीलीय है? |
| अदालत का निर्णय | हां, यह आदेश धारा 13 के तहत ‘सिफारिश’ माना जाएगा और इसके खिलाफ अपील स्वीकार्य है। |

