मुख्य बिंदु (Key Indicators)
- 6 सप्ताह का समय: सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों को आपसी विचार-विमर्श और किसी भी संभावित गतिरोध या अड़चन को समय रहते सुलझाने के लिए 6 सप्ताह का समय प्रदान किया है।
- “नेतृत्व और प्रतिष्ठा का सवाल”: पीठ ने DHCBA के वरिष्ठ नेतृत्व को संबोधित करते हुए कहा कि यह मामला उनके नेतृत्व, राज्य-कौशल और “प्रतिष्ठा का सवाल” (Question of Prestige) है।
- दिसंबर 2024 का अंतरिम आदेश: याचिकाकर्ता वकील फोजिया रहमान की याचिका पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने 19 दिसंबर 2024 को एक प्रयोग के तौर पर दिल्ली की सभी बार एसोसिएशनों में कोषाध्यक्ष (Treasurer) का पद और DHCBA में वरिष्ठ कार्यकारी सदस्य का एक पद महिला वकीलों के लिए आरक्षित किया था। साथ ही जिला अदालतों की कार्यकारी समितियों में 30% पद महिलाओं के लिए आरक्षित किए थे।
- संवैधानिक सिद्धांत: कोर्ट ने दोहराया कि जिस तरह पंचायतों और स्थानीय निकायों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व संवैधानिक रूप से अनिवार्य है, वही सिद्धांत कानूनी बिरादरी (Legal Fraternity) पर भी लागू होना चाहिए।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन (DHCBA) और राष्ट्रीय राजधानी की सभी जिला अदालत बार एसोसिएशनों को 2027 के बार चुनावों से अपनी शासी निकायों (Governing Bodies) में महिला वकीलों के प्रतिनिधित्व के लिए एक “संरचित” (Structured) और “संस्थागत” (Institutionalised) तंत्र तैयार करने का निर्देश दिया है [फ़ोज़िया रहमान बनाम बार काउंसिल ऑफ़ दिल्ली व अन्य]।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने ‘कोऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ ऑल डिस्ट्रिक्ट कोर्ट बार एसोसिएशंस ऑफ दिल्ली’ को निर्देश दिया कि वह डीएचसीबीए और अन्य बार निकायों के साथ मिलकर छह सप्ताह के भीतर विचार-विमर्श कर एक ऐसा प्रस्ताव तैयार करे जो सभी को स्वीकार्य (All-acceptable solution) हो।
शीर्ष अदालत की प्रमुख टिप्पणियां और निर्देश
- सर्वमान्य और स्थायी समाधान की उम्मीद: पीठ ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि बार निकायों को आपसी विचार-विमर्श से एक ऐसा संस्थागत ढांचा बनाना चाहिए ताकि अदालत को बार-बार निर्देश या आदेश जारी न करने पड़ें।
- नेतृत्व और प्रतिष्ठा का विषय: अदालत ने डीएचसीबीए से कहा कि यह मामला उनके नेतृत्व (Leadership), दूरदर्शिता (Statesmanship) और “प्रतिष्ठा का सवाल” है।
- छह सप्ताह का समय: विचार-विमर्श के दौरान आने वाली किसी भी अड़चन या बाधा को समय रहते सुलझाने के लिए अदालत ने सभी संबंधित निकायों को छह सप्ताह की मोहलत दी है।
Delhi Bar: मामले की पृष्ठभूमि और पूर्व के अंतरिम आदेश
यह मामला अधिवक्ता फ़ोज़िया रहमान द्वारा बार एसोसिएशनों में महिला वकीलों के लिए आरक्षण की मांग वाली याचिका से संबंधित है:
- 19 दिसंबर 2024 के निर्देश: शीर्ष अदालत ने प्रायोगिक आधार पर (Experimental Basis) दिल्ली की सभी बार एसोसिएशनों में कोषाध्यक्ष (Treasurer) का पद महिलाओं के लिए आरक्षित किया था।
- कार्यकारिणी में 30% आरक्षण: डीएचसीबीए में एक वरिष्ठ सदस्य कार्यकारिणी पद तथा दिल्ली की सभी जिला अदालत बार एसोसिएशनों में कार्यकारी समिति (Executive Committee) के 30 प्रतिशत पद महिला वकीलों के लिए आरक्षित किए गए थे।
- संवैधानिक सिद्धांत: अदालत ने स्थानीय स्वशासन और पंचायतों की तर्ज पर शासन में महिलाओं के उचित प्रतिनिधित्व के संवैधानिक जनादेश को दोहराते हुए कहा था कि यही सिद्धांत कानूनी पेशे और बार निकायों पर भी समान रूप से लागू होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने आशा व्यक्त करते हुए अपने आदेश में कहा: “हमें यह संदेह करने का कोई कारण नहीं है कि समन्वय समिति एक सर्व-स्वीकार्य समाधान के साथ सामने आएगी, जो एक संरचित और संस्थागत प्रतिनिधित्व तंत्र होगा, ताकि इस अदालत को बार-बार ऐसे आदेश पारित करने की आवश्यकता न पड़े।”
याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गीता लूथरा पेश हुईं, जबकि दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सचिन पुरी और अधिवक्ता कुणाल मल्होत्रा व विधि गुप्ता ने पक्ष रखा। कानूनी और अदालती रिपोर्टिंग से जुड़े विस्तृत अपडेट के लिए Bar and Bench कवरेज और Indian Kanoon पर संबंधित आदेश देखे जा सकते हैं।
एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | विवरण जानकारी |
| केस शीर्षक | फोजिया रहमान बनाम बार काउंसिल ऑफ दिल्ली व अन्य (Fozia Rahman v. Bar Council of Delhi & Anr.) |
| संबंधित अदालत | भारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ (Bench) | CJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना |
| मुख्य मुद्दा | दिल्ली के बार एसोसिएशनों की गवर्निंग बॉडीज में महिला वकीलों का प्रतिनिधित्व/आरक्षण |
| समय सीमा | सर्वसम्मत समाधान निकालने के लिए 6 सप्ताह का समय दिया गया |

