मुख्य बिंदु (Key Indicators)
- माता-पिता की देखभाल की जिम्मेदारी: हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि माता-पिता की देखभाल करने का कर्तव्य उनके अपने बेटे या बेटी का है, न कि बहू या दामाद का। पति अपनी पत्नी को अपने माता-पिता की सेवा के लिए मजबूर नहीं कर सकता।
- शादी नियंत्रण का लाइसेंस नहीं: कोर्ट ने कहा कि विवाह किसी साथी की स्वतंत्रता और इच्छा पर हावी होने या उसे गुलाम बनाने का अधिकार नहीं देता। पत्नी को अपने करियर, वित्त और व्यक्तिगत जीवन से जुड़े फैसले लेने का पूर्ण मौलिक अधिकार है।
- मायके जाने के लिए अनुमति की आवश्यकता नहीं: पति की इस शिकायत पर कि पत्नी उसकी और उसके माता-पिता की अनुमति के बिना बार-बार मायके जाती थी, कोर्ट ने कहा कि यह सोच पति की अपनी पत्नी पर हुक्म चलाने और उसे नियंत्रित करने की मानसिकता को दर्शाती है।
- फैमिली कोर्ट का आदेश कायम: पति (जो कुली का काम करता है) ने ₹9,000 भरण-पोषण को चुनौती दी थी। कोर्ट ने माना कि पत्नी का ससुराल छोड़ना पूरी तरह वाजिब था और भरण-पोषण की राशि में किसी बदलाव की आवश्यकता नहीं है।
बेंगलुरु: कर्नाटक हाईकोर्ट ने वैवाहिक संबंधों और महिला स्वायत्तता पर एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि पति अपनी पत्नी को घर का काम करने या अपने माता-पिता की देखभाल करने का हुक्म (Command) नहीं दे सकता।
न्यायमूर्ति चिलाकुर सुमलता की एकल पीठ ने पारिवारिक अदालत (Family Court) द्वारा अलग रह रही पत्नी और बेटी को दिए गए ₹9,000 प्रति माह के भरण-पोषण (Maintenance) आदेश को बरकरार रखते हुए पति की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी। अदालत ने यह सवाल भी उठाया कि भारतीय महिलाओं को अपने मायके जाने के लिए ससुराल वालों से इजाजत लेने की जरूरत क्यों समझी जाती है।
उच्च न्यायालय की मुख्य टिप्पणियां
पीठ ने वैवाहिक स्वतंत्रता और माता-पिता की देखभाल के दायित्व पर जोर देते हुए कहा: “इस अदालत की समझ से परे है कि एक भारतीय महिला को जब भी वह चाहे अपने माता-पिता के घर जाने की बुनियादी इच्छा पूरी करने के लिए ससुराल के सभी सदस्यों से अनुमति लेने की आवश्यकता क्यों होती है। पति सहित कोई भी व्यक्ति किसी महिला या पत्नी को घरेलू काम करने और अपने माता-पिता की देखभाल करने का हुक्म नहीं दे सकता।”
माता-पिता की सेवा के वैधानिक दायित्व पर अदालत ने कहा: “माता-पिता की देखभाल करने का प्राथमिक कर्तव्य उनके अपने बेटे या बेटी का है, न कि दामाद या बहू का।”
महिला की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अदालत की टिप्पणी: “महिला को अपने करियर, वित्त आदि से संबंधित निर्णय लेने का मौलिक और पूर्ण अधिकार है। पति अपनी पत्नी को अपनी इच्छाओं और अपेक्षाओं के अनुसार जीने के लिए मजबूर नहीं कर सकता। विवाह किसी दूसरे व्यक्ति के व्यक्तित्व, स्वतंत्रता और इच्छा पर नियंत्रण, प्रभुत्व या हुकूमत चलाने का लाइसेंस नहीं है।”
Husband Can’t Command Wife: मामले की पृष्ठभूमि और विवाद
- पारिवारिक अदालत का आदेश: कुली का काम करने वाले पति को फैमिली कोर्ट ने पत्नी और नाबालिग बेटी के लिए ₹9,000 प्रति माह गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया था (पत्नी ने ₹30,000 की मांग की थी)।
- पति की दलीलें: पति ने हाईकोर्ट में आदेश को चुनौती देते हुए तर्क दिया कि:
- पत्नी घर का काम नहीं करती थी और उसके बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल नहीं करती थी।
- वह बिना उसकी और उसके माता-पिता की अनुमति लिए कई बार अपने मायके चली गई।
- पत्नी के आरोप: पत्नी ने अदालत को बताया कि पति जुए और शराब की लत का शिकार था। उसके साथ मारपीट व गाली-गलौज की गई, जिसके कारण वह ससुराल छोड़ने पर मजबूर हुई।
अदालत के निष्कर्ष: ‘नियोक्ता और कर्मचारी’ जैसी मानसिकता की निंदा
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने पति की दलीलों पर गंभीर आपत्ति जताते हुए कहा:
- मालिक और नौकर जैसा व्यवहार: पति की दलीलों से ऐसा प्रतीत होता है जैसे वह कोई ‘मालिक’ (Employer) हो और पत्नी उसकी ‘कर्मचारी’ (Employee)।
- ससुराल छोड़ने का वैध कारण: बिना अनुमति मायके जाने की बात पति की प्रभुत्ववादी और नियंत्रणकारी मानसिकता को दर्शाती है। पत्नी का ससुराल छोड़ना पूरी तरह न्यायसंगत था।
- आज्ञाकारिता निष्ठा का पैमाना नहीं: अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी परिवार के प्रति पत्नी के समर्पण का आकलन उसकी आज्ञाकारिता या दब्ूपन (Submissiveness) से नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
न्यायमूर्ति चिंतापंतला सुमलता ने फैसला सुनाते हुए कहा: “इस अदालत को यह समझ नहीं आता कि एक भारतीय महिला को अपने माता-पिता के घर जाने की अपनी बुनियादी इच्छा पूरी करने के लिए ससुराल के सभी लोगों से अनुमति लेने की आवश्यकता क्यों होनी चाहिए। पति सहित कोई भी व्यक्ति अपनी पत्नी को घरेलू काम करने या अपने माता-पिता की देखभाल करने का आदेश नहीं दे सकता। विवाह किसी दूसरे पक्ष की स्वायत्तता, स्वतंत्रता और इच्छा को नियंत्रित या शासित करने का लाइसेंस नहीं है।”
अंतिम आदेश
उच्च न्यायालय ने फैमिली कोर्ट द्वारा निर्धारित ₹9,000 प्रति माह के भरण-पोषण में किसी भी तरह का बदलाव करने से इनकार कर दिया और पति की याचिका खारिज कर दी।
एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | विवरण जानकारी |
| संबंधित अदालत | कर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court) |
| पीठ (Bench) | न्यायमूर्ति चिंतापंतला सुमलता (Justice Chillakur Sumalatha) |
| मुख्य विषय | पत्नी की स्वायत्तता (Autonomy), मायके जाने की स्वतंत्रता और भरण-पोषण |
| अदालत का निर्णय | पति की पुनरीक्षण याचिका खारिज; फैमिली कोर्ट द्वारा तय भरण-पोषण का आदेश बरकरार। |

