मुख्य बिंदु (Key Indicators)
- सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख: पीठ ने साफ किया कि अगर कोई वकील बार एसोसिएशन का अध्यक्ष या कार्यकारिणी सदस्य है, तो भी उसे सार्वजनिक सड़कों, फुटपाथों या अदालती परिसर की खुली जगहों पर अवैध निर्माण/कब्जा करने का अधिकार नहीं मिल जाता।
- न्यायमूर्ति विक्रम नाथ का व्यक्तिगत अनुभव: इलाहाबाद हाईकोर्ट में न्यायाधीश रह चुके न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने कहा, “मैंने खुद दो साल वहां रहते हुए देखा है कि कैसे वकीलों ने मुख्य सड़कों और खुली जगहों पर अतिक्रमण कर रखा है, जिससे ट्रैफिक पूरी तरह बाधित होता है। यह डिमोलिशन होकर रहेगा।”
- मध्यस्थता (Mediation) की मांग खारिज: जब वकीलों की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता आदिश अग्रवाल ने इस विवाद को मध्यस्थता के जरिए सुलझाने और वैकल्पिक जमीन देने की गुहार लगाई, तो जस्टिस नाथ ने इसे सिरे से खारिज करते हुए कहा— “वकीलों के साथ मध्यस्थता! बिल्कुल नहीं। याचिका खारिज की जाती है।”
- कोर्ट परिसर की सुरक्षा पर सवाल: न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने नाराजगी जताते हुए पूछा कि अगर वकील ही अदालत के परिसरों पर इस तरह कब्जा करेंगे तो अदालत की जमीनों की सुरक्षा कौन करेगा?
- हाईकोर्ट का मूल आदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लखनऊ नगर निगम (LMC), पुलिस आयुक्त और जिला मजिस्ट्रेट को रविवार के दिन (ताकि न्यायिक कार्य बाधित न हो) सुरक्षा व्यवस्था के बीच इन अवैध चैंबर्स को ध्वस्त करने का निर्देश दिया था। इससे पहले मई महीने में कैसरबाग इलाके में अवैध दुकानें हटाने पहुंची पुलिस के साथ वकीलों की झड़प भी हुई थी।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने लखनऊ के जिला एवं सत्र न्यायालय परिसर के आसपास सार्वजनिक रास्तों और उपयोगिता भूमि पर बने लगभग 72 अवैध वकीलों के चैंबरों को ध्वस्त (Demolish) करने के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने से साफ इनकार कर दिया है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने ‘सेंट्रल बार एसोसिएशन, लखनऊ’ द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) को खारिज कर दिया। शीर्ष अदालत ने इस विवाद को मध्यस्थता (Mediation) के लिए भेजने की मांग खारिज करते हुए अवैध निर्माणों पर काबिज वकीलों को शांतिपूर्वक जगह खाली करने की सख्त सलाह दी।
शीर्ष अदालत की सख्त टिप्पणियां: “बार एसोसिएशन का पद अतिक्रमण का लाइसेंस नहीं”
सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ताओं ने बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों का हवाला दिया, तो न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने कड़े शब्दों में कहा: “आप मुख्य सड़क पर कब्जा करते हैं, अदालत परिसर के भीतर खुली जगह पर कब्जा करके अनाधिकृत निर्माण खड़ा करते हैं और फिर कहते हैं कि मैं एसोसिएशन का अध्यक्ष चुना गया हूं, मैं गवर्निंग बॉडी का सदस्य हूं इसलिए मुझे बने रहने का अधिकार है? बिल्कुल नहीं। सभी अवैध निर्माणों का ध्वस्तीकरण होकर रहेगा (All demolitions have to take place)।”
इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपने दो साल के न्यायिक अनुभव को साझा करते हुए न्यायमूर्ति नाथ ने कहा: “मैंने खुद वहां सीनियर जज के रूप में दो साल रहते हुए यह सब देखा है। मैं जानता हूं कि वहां किस तरह के निर्माण किए गए हैं, कैसे सड़कें रोकी गई हैं और यातायात पूरी तरह बाधित हो जाता है। बुलडोज़र तो चलेगा ही।”
अदालत परिसर की सुरक्षा पर न्यायमूर्ति संदीप मेहता ने सवाल उठाया: “यदि वकील ही इस तरह अदालती परिसर पर कब्जा करने लगेंगे, तो अदालत की सीमाओं और मर्यादा की रक्षा कौन करेगा? इसकी जिम्मेदारी किसकी है? वकीलों को कोई झिझक ही नहीं है।”
उन्होंने राजस्थान की एक जिला अदालत का उदाहरण देते हुए याद किया कि कैसे एक वकील ने जिला जज के लिए तय पार्किंग स्थल को ही अपने निजी चैंबर में बदल लिया था।
मध्यस्थता और वैकल्पिक जगह की मांग खारिज
- वैकल्पिक जगह का सुझाव: वरिष्ठ अधिवक्ता आदिश अग्रवाल ने प्रभावित वकीलों के लिए वैकल्पिक जमीन आवंटित करने का सुझाव दिया। इस पर पीठ ने टिप्पणी की कि वकील सार्वजनिक रास्तों पर कब्जा करने के बजाय जमीन खरीद सकते हैं या राज्य सरकार से सोसाइटी बनाने का अनुरोध कर सकते हैं।
- मध्यस्थता से इनकार: जब वकीलों ने मामले को मध्यस्थता में भेजने का अनुरोध किया, तो न्यायमूर्ति नाथ ने इसे सिरे से खारिज करते हुए कहा: “वकीलों के साथ मध्यस्थता! बिल्कुल नहीं। याचिका खारिज की जाती है।”
Illegal Chambers: मामले की पृष्ठभूमि और विवाद
- कैसरबाग क्षेत्र में संघर्ष (मई): यह विवाद तब सुर्खियों में आया था जब मई के महीने में कैसरबाग क्षेत्र में अनाधिकृत चैंबरों को हटाने की कोशिश के दौरान वकीलों और उत्तर प्रदेश पुलिस के बीच झड़प हो गई थी।
- नगर निगम की कार्रवाई: लखनऊ नगर निगम ने हाईकोर्ट को बताया था कि 100 से अधिक अवैध चैंबर पहले ही गिराए जा चुके हैं। हालांकि, जिन 72 संरचनाओं को नोटिस दिया गया था, उनमें से केवल 14 को हटाया जा सका था और कुछ पर दोबारा कब्जा कर लिया गया था।
- हाईकोर्ट के निर्देश: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने लखनऊ नगर निगम, पुलिस कमिश्नर और जिलाधिकारी को समन्वय बनाकर शेष 72 अतिक्रमणों को हटाने का निर्देश दिया था। हाईकोर्ट ने न्यायिक कार्य में बाधा न आए इसलिए रविवार के दिन ध्वस्तीकरण करने और बाधा डालने वालों पर कार्रवाई की चेतावनी दी थी।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने सुनवाई के दौरान सख्त लहजे में कहा: “आप मुख्य सड़क पर कब्जा कर लेते हैं, अदालत परिसर के भीतर खुली जगह पर अवैध निर्माण करते हैं और फिर कहते हैं कि मैं बार एसोसिएशन का अध्यक्ष या सदस्य चुना गया हूं, इसलिए मुझे कब्जा बनाए रखने का अधिकार है? नहीं, ऐसे सभी अवैध निर्माणों का डिमोलिशन होना ही चाहिए।” कोर्ट ने वकीलों को सलाह दी कि सार्वजनिक जमीनों पर कब्जा करने के बजाय वे जमीन खरीदने या अपनी सोसाइटी बनाने के लिए राज्य सरकार से औपचारिक अनुरोध करें।
यह रहा सुप्रीम अदालत का अहम निर्देश
सुप्रीम कोर्ट द्वारा हस्तक्षेप से इनकार और याचिका खारिज किए जाने के बाद, लखनऊ जिला न्यायालय के आसपास सार्वजनिक मार्गों पर बने शेष अवैध चैंबरों के खिलाफ नगर निगम और प्रशासन की ध्वस्तीकरण की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।
एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | विवरण जानकारी |
| केस शीर्षक | सेंट्रल बार एसोसिएशन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य (Central Bar Association v. State of UP & Ors.) |
| संबंधित अदालत | भारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ (Bench) | न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता |
| संबंधित स्थान | कैसरबाग, लखनऊ जिला एवं सत्र न्यायालय के पास |
| अदालत का निर्णय | याचिका खारिज; इलाहाबाद हाईकोर्ट के डिमोलिशन आदेश में हस्तक्षेप से इनकार। |

