मुख्य बिंदु (Key Indicators)
- धोखाधड़ी का इरादा (Dishonest Intention) अनुपस्थित: कोर्ट ने दोहराया कि आईपीसी की धारा 420 (अब बीएनएस धारा 318) के तहत धोखाधड़ी का अपराध साबित करने के लिए शुरुआत से ही कपटपूर्ण या बेईमानी का इरादा होना अनिवार्य है। अनुबंध के उल्लंघन या बाद में उत्पन्न कठिनाइयों के कारण आपराधिक मामला नहीं बनता।
- बाढ़ के लिए मकान मालिक जिम्मेदार नहीं: 2013 की बाढ़ में स्कूल भवन में पानी भरने और नुकसान होने का आरोप था। कोर्ट ने कहा कि ट्रस्टियों या मकान मालिक का इमारत की गुणवत्ता से कोई लेना-देना नहीं था और न ही वे प्राकृतिक आपदा के लिए जिम्मेदार थे।
- निजी विवाद और देरी से एफआईआर: मकान मालिक ने जब बकाया किराए की वसूली के लिए दीवानी मुकदमा (Civil Suit) दायर किया, उसके बाद शिकायतकर्ता महिला ने 2021 में यह एफआईआर दर्ज कराई थी। 2017 की छेड़छाड़ की कथित घटना पर 4 साल बाद शिकायत दर्ज कराने पर भी कोर्ट ने सवाल उठाए।
- व्यक्तिगत रंजिश का हथियार: हाईकोर्ट ने माना कि सिविल केस में समझौता कराने का दबाव बनाने और निजी रंजिश निकालने के उद्देश्य से यह आपराधिक केस दर्ज कराया गया था।
श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि अचानक आई बाढ़ (Flash Floods) एक दैवीय कृत्य (Act of God) है और इसके कारण किराए के भवन को पहुंचे नुकसान के लिए मकान मालिक या पूर्व प्रबंधकों पर धोखाधड़ी (Cheating) का आपराधिक मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति संजय धर की एकल पीठ ने याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर दो याचिकाओं को स्वीकार करते हुए आपराधिक कार्यवाही को दीवानी विवाद (Civil Dispute) में दबाव बनाने का दुर्भावनापूर्ण प्रयास करार दिया। अदालत ने स्कूल के ट्रस्टियों और मकान मालिक के खिलाफ दर्ज धोखाधड़ी और शीलभंग के मामले को पूरी तरह रद्द कर दिया [गुलाम रसूल राथर व अन्य बनाम जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश]।
उच्च न्यायालय की मुख्य टिप्पणियां
पीठ ने प्राकृतिक आपदा और आपराधिक दायित्व पर टिप्पणी करते हुए कहा: “केवल इसलिए कि अचानक आई बाढ़ का पानी स्कूल की इमारत में घुस गया और भवन को नुकसान पहुंचा, याचिकाकर्ताओं (ट्रस्टियों व मकान मालिक) के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला नहीं बनता। ट्रस्टी केवल स्कूल के प्रबंधक थे और उन्होंने सद्भावना (Goodwill) के साथ प्रबंधन शिकायतकर्ता को सौंपा था। उनका भवन की गुणवत्ता से कोई लेना-देना नहीं था और न ही वे अचानक आई बाढ़ के लिए जिम्मेदार थे, जो कि एक दैवीय कृत्य (Act of God) था।”
धोखाधड़ी के कानूनी तत्वों की व्याख्या करते हुए अदालत ने कहा: “आईपीसी की धारा 420 (अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 318) के तहत धोखाधड़ी का अपराध स्थापित करने के लिए शुरुआत से ही कपटपूर्ण या बेईमान इरादा (Fraudulent or Dishonest Intention) साबित होना चाहिए। अनुबंध का केवल उल्लंघन होना या बाद में अप्रत्याशित कठिनाइयां उत्पन्न होना स्वतः आपराधिक मुकदमे का आधार नहीं बन सकता।”
मामले की पृष्ठभूमि और शिकायतकर्ता के आरोप
- प्रबंधन का हस्तांतरण (2012): स्कूल का प्रबंधन वर्ष 2012 में शिकायतकर्ता महिला को सौंपा गया था।
- 2013 की बाढ़ और नुकसान: नवंबर 2013 में अचानक आई बाढ़ का पानी स्कूल परिसर में घुस गया (लगभग 12 इंच पानी), जिससे इमारत को नुकसान हुआ।
- धोखाधड़ी का आरोप (2021 में FIR): घटना के कई साल बाद 2021 में शिकायतकर्ता ने प्राथमिकी दर्ज कराई कि स्कूल सौंपते समय इमारत की संरचनात्मक कमियों और जलभराव की समस्याओं को जानबूझकर छिपाया गया था। साथ ही पूर्व मंत्री के बेटे के अनियमित दाखिले को लेकर भी धोखाधड़ी का आरोप लगाया।
- मकान मालिक पर 2017 की छेड़छाड़ का आरोप: महिला ने यह भी आरोप लगाया कि 2017 में मकान मालिक ने स्कूल परिसर में आकर उसके साथ बदसलूकी और शीलभंग करने का प्रयास किया था।
हाईकोर्ट द्वारा मामला रद्द किए जाने के मुख्य आधार
उच्च न्यायालय ने रिकॉर्ड और साक्ष्यों का विश्लेषण करने के बाद पाया कि आपराधिक मामला पूरी तरह निराधार और बदले की भावना से प्रेरित था:
- अदालती रिकॉर्ड और मरम्मत का मुद्दा: रिकॉर्ड से पता चला कि मकान मालिक ने मरम्मत की अनुमति मांगी थी और बडगाम के मुख्य शिक्षा अधिकारी ने छात्रों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करने को कहा था। मरम्मत इसलिए नहीं हो सकी क्योंकि शिकायतकर्ता ने इमारत खाली नहीं की थी।
- किराए के दीवानी मुकदमे में दबाव की रणनीति: अदालत ने नोट किया कि मकान मालिक ने बकाया किराए की वसूली के लिए दीवानी मुकदमा (Civil Suit) दायर किया हुआ है। उस दीवानी विवाद में समझौता कराने और दबाव बनाने के लिए यह आपराधिक प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी।
- छेड़छाड़ के आरोप में 4 साल की देरी: अदालत ने 2017 की कथित घटना की शिकायत 2021 में दर्ज कराने पर सवाल उठाया और इसे निजी रंजिश के तहत मकान मालिक को परेशान करने का दुर्भावनापूर्ण प्रयास माना।
हाईकोर्ट की टिप्पणी
न्यायमूर्ति संजय धर ने फैसला सुनाते हुए कहा: “केवल इसलिए कि आकस्मिक बाढ़ का पानी स्कूल की इमारत में घुस गया और इससे नुकसान हुआ, याचिकाकर्ताओं के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला नहीं बनता। याचिकाकर्ता केवल स्कूल के प्रबंधक थे। उनका इमारत की मजबूती से कोई लेना-देना नहीं था और न ही वे आकस्मिक बाढ़ के लिए जिम्मेदार थे, जो कि एक प्रकृति का कृत्य (Act of God) था।”
अंतिम फैसला
जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि इस मामले में धोखाधड़ी या किसी अन्य संज्ञेय अपराध का कोई ठोस तत्व मौजूद नहीं है। तदनुसार, पीठ ने स्कूल के ट्रस्टियों और मकान मालिक के खिलाफ दर्ज पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द (Quash) कर दिया।
एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | विवरण जानकारी |
| केस शीर्षक | गुलाम रसूल राथर व अन्य बनाम यूटी जम्मू और कश्मीर (Ghulam Rasool Rather & Ors. v. UT of J&K) |
| संबंधित अदालत | जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय (J&K High Court) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति संजय धर (Justice Sanjay Dhar) |
| संबंधित धाराएं | आईपीसी की धारा 420 (धोखाधड़ी) / बीएनएस, 2023 की धारा 318 |
| अदालत का निर्णय | आपराधिक मामला और एफआईआर पूरी तरह खारिज। |

