मुख्य बिंदु (Key Indicators)
- काम की प्रकृति और व्यावहारिकता: एसोसिएशन ने तर्क दिया कि पब्लिक प्रॉसिक्यूटर्स कोर्ट के अधिकारी हैं। अपने कर्तव्यों के पालन के लिए उन्हें रोजाना अलग-अलग अदालतों, पुलिस स्टेशनों और अन्य स्थानों का दौरा करना पड़ता है। ऐसे में बायोमीट्रिक सिस्टम व्यावहारिक नहीं है।
- अदालती रिकॉर्ड ही उपस्थिति का प्रमाण: याचिकाकर्ताओं का कहना था कि सरकारी वकीलों की मौजूदगी पहले से ही अदालती कार्यवाही और केस रिकॉर्ड्स में दर्ज होती है।
- वैकल्पिक कोर्ट-केंद्रित व्यवस्था की मांग: एसोसिएशन ने बायोमीट्रिक प्रणाली के स्थान पर वकीलों के काम के स्वरूप को ध्यान में रखते हुए कोर्ट-केंद्रित उपस्थिति तंत्र (Court-centric Attendance Mechanism) बनाने की वैकल्पिक मांग की।
- व्यक्तिगत सुनवाई का आदेश: हाईकोर्ट ने याचिका को दिल्ली सरकार के समक्ष एक ‘अभ्यावेदन’ में तब्दील कर दिया और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे एसोसिएशन के प्रतिनिधियों को व्यक्तिगत सुनवाई (Personal Hearing) का मौका देकर 4 हफ्ते के भीतर फैसला सुनाएं।
नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार को सरकारी वकीलों (Public Prosecutors) के लिए अनिवार्य की गई आधार-सक्षम बायोमेट्रिक हाजिरी प्रणाली (AEBAS) को चुनौती देने वाली याचिका पर चार सप्ताह के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया है [दिल्ली प्रॉसिक्यूटर्स वेलफेयर एसोसिएशन बनाम दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र सरकार व अन्य]।
न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की एकल पीठ ने ‘दिल्ली प्रॉसिक्यूटर्स वेलफेयर एसोसिएशन’ द्वारा दायर याचिका का निस्तारण करते हुए इसे सरकार के समक्ष एक प्रत्यावेदन (Representation) के रूप में मानने और व्यक्तिगत सुनवाई के बाद समयबद्ध निर्णय लेने का आदेश दिया।
उच्च न्यायालय के प्रमुख निर्देश
पीठ ने मामले का निपटारा करते हुए निर्देश दिया: “अदालत यह उचित समझती है कि इस याचिका को याचिकाकर्ता की ओर से एक प्रत्यावेदन माना जाए। प्रतिवादियों (दिल्ली सरकार) को निर्देश दिया जाता है कि वे याचिकाकर्ता को व्यक्तिगत सुनवाई (Personal Hearing) का अवसर देने के बाद, आज से चार सप्ताह की अवधि के भीतर इस पर निर्णय लें और इसकी सूचना याचिकाकर्ता को दें।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि सरकार के निर्णय के बाद एसोसिएशन की शिकायत बनी रहती है, तो उसे दोबारा अदालत का रुख करने की स्वतंत्रता (Liberty) होगी।
प्रॉसिक्यूटर्स वेलफेयर एसोसिएशन की आपत्तियां और दलीलें
एसोसिएशन ने सरकारी सर्कुलरों को रद्द करने की मांग करते हुए निम्नलिखित मुख्य बिंदु रखे:
- कार्यप्रणाली की अव्यावहारिकता: लोक अभियोजक अदालत के अधिकारी (Officers of the Court) हैं। अपने पेशेवर कर्तव्यों के निर्वहन के लिए उन्हें लगातार विभिन्न अदालतों, न्यायाधिकरणों और पुलिस स्टेशनों का दौरा करना पड़ता है। ऐसे में किसी एक निश्चित स्थान पर बायोमेट्रिक पंचिंग करना पूरी तरह अव्यावहारिक है।
- अदालती आदेशों में उपस्थिति का प्रमाण: वकीलों का तर्क था कि लोक अभियोजकों की वास्तविक उपस्थिति और कार्य अदालती कार्यवाही और दैनिक आदेश पत्रक (Court Orders/Proceedings) में स्वतः आधिकारिक रूप से दर्ज होती है।
- पूर्व अभ्यावेदन की अनदेखी: एसोसिएशन ने दलील दी कि इस व्यवस्था को लागू करने से पहले सरकार ने उनके द्वारा दर्ज कराई गई पिछली आपत्तियों और अभ्यावेदनों पर कोई विचार नहीं किया।
- कोर्ट-केंद्रित उपस्थिति प्रणाली की मांग: याचिका में वैकल्पिक मांग की गई कि सरकारी वकीलों के काम की गतिशील प्रकृति को ध्यान में रखते हुए बायोमेट्रिक के स्थान पर एक व्यावहारिक, कोर्ट-केंद्रित हाजिरी तंत्र विकसित किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट का निर्णय
मामले को निस्तारित करते हुए न्यायमूर्ति स्वर्णा कांत शर्मा ने कहा:यह अदालत उचित समझती है कि इस याचिका को याचिकाकर्ता की ओर से एक अभ्यावेदन (Representation) माना जाए। प्रतिवादियों (दिल्ली सरकार) को निर्देश दिया जाता है कि वे याचिकाकर्ता को व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर देने के बाद, आज से 4 सप्ताह की अवधि के भीतर इस पर निर्णय लें और इसकी सूचना याचिकाकर्ता को दें। अदालत ने एसोसिएशन को यह छूट (Liberty) भी दी कि यदि सरकार के निर्णय के बाद भी उनकी शिकायत बनी रहती है, तो वे पुन: हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
अंतिम स्थिति
दिल्ली हाईकोर्ट ने सीधे नीतिगत हस्तक्षेप करने के बजाय मामले को प्रशासनिक स्तर पर सुलझाने के लिए दिल्ली सरकार के संबंधित अधिकारियों को भेजा है, जिन्हें याचिकाकर्ताओं का पक्ष सुनकर 4 सप्ताह में तर्कसंगत आदेश पारित करना होगा।
Public Prosecutors: एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | विवरण जानकारी |
| केस शीर्षक | दिल्ली प्रॉसिक्यूटर्स वेलफेयर एसोसिएशन बनाम दिल्ली राज्य (GNCTD) व अन्य |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति स्वर्णा कांत शर्मा (Justice Swarana Kanta Sharma) |
| मुख्य विवाद | आधार-आधारित बायोमीट्रिक अटेंडेंस सिस्टम (AEBAS) की अनिवार्यता |
| अदालत का निर्णय | याचिका को ‘अभ्यावेदन’ (Representation) मानकर सरकार को 4 हफ्ते में निर्णय लेने का निर्देश। |

