मुख्य बिंदु (Key Indicators)
- सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार: पीठ ने वकील के आचरण पर टिप्पणी करते हुए कहा, “वह लोक अभियोजक (Public Prosecutor) बनने के लायक ही नहीं हैं। आपने इतना महत्वपूर्ण दस्तावेज़ छिपाया, जो आपकी केस डायरी में मौजूद था। आप किसी नोटिस के हकदार ही नहीं हैं।”
- छिपाया गया महत्वपूर्ण साक्ष्य: पीड़िता को घटना के दिन ही सरकारी अस्पताल ले जाया गया था, जहां डॉक्टर ने एक्सीडेंट रजिस्टर में होंठ, गर्दन और गुप्तांगों पर चोटों का दर्ज किया था। लेकिन प्रॉसिक्यूटर ने न तो इस रजिस्टर को साक्ष्य के तौर पर पेश किया और न ही डॉक्टर से पूछताछ की।
- निदेशक (अभियोजन) की सिफारिश पर कार्रवाई न होना: निदेशक (अभियोजन) ने 7 जुलाई 2025 को ही इस वकील को पद से हटाने की सिफारिश की थी। मद्रास हाईकोर्ट ने इस बात पर कड़ी नाराजगी जताई थी कि तमिलनाडु सरकार ने इस सिफारिश पर कोई कार्रवाई नहीं की और वकील को पद पर बने रहने दिया।
- सरकारी वकीलों की नियुक्ति पर हाईकोर्ट के सवाल: मद्रास हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि राज्य सरकारें वकीलों की योग्यता और पेशेवर क्षमता के बजाय राजनीतिक वफादारी और नजदीकी के आधार पर सरकारी वकील नियुक्त कर रही हैं, जो न्याय व्यवस्था के लिए बेहद चिंताजनक है।
- थेनी जिलाधिकारी को निर्देश: हाईकोर्ट ने थेनी (Theni) जिले के कलेक्टर और गृह सचिव को 4 सप्ताह के भीतर संबंधित वकील को हटाने की सिफारिश पर फैसला लेने का निर्देश दिया था, जिसके खिलाफ वकील ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने दुष्कर्म के एक गंभीर मामले में पीड़िता की चोटों से जुड़े महत्वपूर्ण चिकित्सकीय साक्ष्य (Accident Register) को ट्रायल कोर्ट के समक्ष पेश न करने वाले सरकारी वकील (Public Prosecutor) के खिलाफ मद्रास उच्च न्यायालय की तीखी टिप्पणियों पर तमिलनाडु सरकार से जवाब तलब किया है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट की टिप्पणियों के खिलाफ लोक अभियोजक द्वारा दायर याचिका पर नोटिस जारी किया, लेकिन साथ ही वकील के आचरण पर कड़ी फटकार लगाई।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त मौखिक टिप्पणी
सुनवाई के दौरान पीठ ने केस डायरी में मौजूद होने के बावजूद अहम दस्तावेज छिपाने पर लोक अभियोजक की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए कहा: “वह लोक अभियोजक (Public Prosecutor) बनने के लायक ही नहीं हैं। आपने इतना महत्वपूर्ण दस्तावेज दबा लिया, जबकि वह आपकी केस डायरी में उपलब्ध था। तकनीकी रूप से आप यह कह सकते हैं कि आपको कोई पूर्व नोटिस नहीं दिया गया, लेकिन सच तो यह है कि आप किसी नोटिस के भी हकदार नहीं हैं। आप इस पद पर बने रहने के योग्य नहीं हैं।”
मद्रास हाईकोर्ट का रुख और छिपाया गया सबूत
मद्रास उच्च न्यायालय ने अनुसूचित जाति (SC) की एक महिला के साथ दुष्कर्म के प्रयास के दोषी की सजा निलंबन याचिका पर सुनवाई के दौरान सरकारी वकील की भारी चूक पकड़ी थी:
- पीड़िता की गंभीर चोटों का रिकॉर्ड: घटना के दिन ही पीड़िता की सरकारी अस्पताल में जांच की गई थी। डॉक्टर ने ‘एक्सीडेंट रजिस्टर’ में होंठ पर खरोंच, गर्दन पर नाखूनों के निशान, वजाइनल ब्लीडिंग और तालू पर चोट सहित चार गंभीर चोटें दर्ज की थीं।
- ट्रायल में साक्ष्य से गायब: लोक अभियोजक ने इस महत्वपूर्ण एक्सीडेंट रजिस्टर को कभी भी ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड पर साक्ष्य के रूप में पेश ही नहीं किया और न ही डॉक्टर से इस संबंध में कोई जिरह/पूछताछ की।
प्रॉसिक्यूशन डायरेक्टर की रिपोर्ट और हाईकोर्ट की फटकार
- हटाने की सिफारिश पर सरकार की निष्क्रियता: हाईकोर्ट के निर्देश पर अभियोजन निदेशक (Director of Prosecution) ने मामले की जांच की और गंभीर लापरवाही पाते हुए 7 जुलाई 2025 को उक्त लोक अभियोजक को पद से हटाने की सिफारिश राज्य सरकार को भेजी थी।
- सरकार के ढुलमुल रवैये पर नाराजगी: हाईकोर्ट ने फाइल लंबित रखने पर राज्य सरकार की खिंचाई करते हुए कहा था कि ऐसे अयोग्य व्यक्ति को पद पर बनाए रखकर सरकार अन्य पीड़ितों के साथ भी अन्याय करने की छूट दे रही है।
सरकारी वकीलों की राजनीतिक नियुक्तियों पर मद्रास हाईकोर्ट की गंभीर टिप्पणियां
मद्रास हाईकोर्ट ने सरकारी वकीलों की योग्यता और नियुक्ति प्रक्रिया पर तीखी टिप्पणी की थी: “यह बेहद चिंताजनक है कि राज्य सरकार सरकारी वकीलों और लोक अभियोजकों की नियुक्ति योग्यता और पेशेवर क्षमता के आधार पर नहीं, बल्कि सत्ताधारी दल से निकटता और वफादारी के आधार पर कर रही है। कभी-कभी तो ऐसी नियुक्तियां उन लोगों को भी दे दी जाती हैं जिनकी एकमात्र योग्यता चुनावों के दौरान पोस्टर चिपकाना जैसी तुच्छ राजनीतिक गतिविधियां होती हैं।” हाईकोर्ट ने थेनी के जिला कलेक्टर और गृह सचिव को 4 सप्ताह के भीतर अभियोजक को हटाने की सिफारिश पर फैसला लेने का निर्देश दिया था।
अदालत का रुख
मद्रास हाईकोर्ट द्वारा की गई टिप्पणियों को हटाने की मांग लेकर पहुंचे सरकारी वकील को सुप्रीम कोर्ट से कोई राहत नहीं मिली। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है, लेकिन साथ ही स्पष्ट कर दिया कि इस तरह की लापरवाही करने वाले अधिकारी लोक अभियोजक के पद के योग्य नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट में आगे की कार्यवाही
मद्रास हाईकोर्ट के इस आदेश और प्रतिकूल टिप्पणियों के खिलाफ संबंधित लोक अभियोजक ने शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया है। सुप्रीम कोर्ट ने अभियोजक के आचरण को अनुचित बताते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी कर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है।
Withheld Key Evidence: एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | विवरण जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ (Bench) | न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता |
| मूल मामला | अनुसूचित जाति की महिला से दुष्कर्म के प्रयास से जुड़ा मामला (थेनी जिला, तमिलनाडु) |
| मुख्य विवाद | पीड़िता के मेडिकल एक्सीडेंट रजिस्टर (जिसमें चोटों का ब्योरा था) को ट्रायल कोर्ट के सामने पेश न करना |
| सुप्रीम कोर्ट का रुख | वकील की खिंचाई करते हुए तमिलनाडु सरकार को नोटिस जारी किया। |

