मुख्य बिंदु (Key Indicators)
- सरकार से हलफनामा तलब: हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को आगामी सुनवाई तक हलफनामा दाखिल कर यह बताने को कहा है कि वह सहायता राशि में कितनी बढ़ोतरी का प्रस्ताव रखती है। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि उचित हलफनामा पेश नहीं किया गया तो इसे गंभीरता से लिया जाएगा।
- यूपी बार काउंसिल पर नाराजगी: कोर्ट ने मृतक वकीलों के आवेदनों के सत्यापन और फॉरवर्ड करने में अत्यधिक देरी के लिए यूपी बार काउंसिल (Bar Council of UP) की खिंचाई की। वर्तमान में कमियों के कारण 1,207 आवेदन लंबित हैं। कोर्ट ने काउंसिल से भविष्य में इन आवेदनों के त्वरित निस्तारण के लिए गाइडलाइन जारी करने का निर्देश दिया।
- फंड के उपयोग पर निर्देश: ट्रस्ट केवल ब्याज के पैसों (वार्षिक लगभग ₹22.4 करोड़) से दावों का भुगतान कर रहा था, जिससे प्रतिवर्ष केवल 440 आवेदनों का ही निपटारा हो पा रहा था। कोर्ट ने कहा कि ट्रस्ट को जरूरत पड़ने पर मूल कॉर्पस (Principal Amount/FD) का उपयोग करना चाहिए या राज्य सरकार से एकमुश्त वित्तीय सहायता मांगनी चाहिए।
- मामले की पृष्ठभूमि: यह याचिका एक मृत अधिवक्ता की विधवा द्वारा 2020 में दिए गए आवेदन पर 2025 में हुए देरी से भुगतान के चलते ब्याज की मांग को लेकर दायर की गई थी।
प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को मृतक अधिवक्ताओं के आश्रितों को ‘अधिवक्ता वित्तीय सहायता योजना’ (Financial Assistance Scheme for Advocates) के तहत दी जाने वाली ₹5 लाख की मुआवजा राशि को बढ़ाने पर विचार करने का निर्देश दिया है। अदालत ने रेखांकित किया कि वर्ष 2015 से योजना का फंड ₹20 करोड़ से बढ़कर ₹330 करोड़ हो चुका है, लेकिन आश्रितों को मिलने वाली सहायता राशि 11 वर्षों से ₹5 लाख पर ही स्थिर बनी हुई है [ज्योतिमा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 2 अन्य]।
न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने राज्य सरकार को अगली सुनवाई तक यह स्पष्ट करते हुए हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया कि वह मुआवजे में कितनी वृद्धि करने का प्रस्ताव रखती है।
उच्च न्यायालय के प्रमुख निर्देश और टिप्पणियां
पीठ ने सहायता राशि में संशोधन की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा: “सरकार इस संबंध में एक हलफनामा दाखिल करे कि वह वित्तीय सहायता योजना के तहत मुआवजे की राशि में कितनी वृद्धि का प्रस्ताव करती है; हम इसे राज्य सरकार के विवेक पर छोड़ते हैं। यदि अगली नियत तारीख तक उचित हलफनामा दाखिल नहीं किया जाता है, तो अदालत इस मामले को गंभीरता से लेने के लिए बाध्य होगी।”
Scheme for Advocates: मामले की पृष्ठभूमि और देरी पर अदालत की नाराजगी
- मुआवजे में 5 साल की देरी: यह मामला एक दिवंगत अधिवक्ता की विधवा द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है, जिन्होंने ₹5 लाख के मुआवजे के भुगतान में अत्यधिक देरी के कारण ब्याज की मांग की थी। उन्होंने वर्ष 2020 में आवेदन किया था, लेकिन भुगतान 2025 में किया गया।
- 1,207 आवेदन लंबित: ‘उत्तर प्रदेश अधिवक्ता कल्याण कोष न्यासी समिति’ (UP Advocate Welfare Fund Trustee Society) ने अदालत को बताया कि यूपी बार काउंसिल से आने वाले आवेदनों में कमियों और सत्यापन प्रक्रिया के कारण वर्तमान में 1,207 आवेदन लंबित पड़े हैं।
- बार काउंसिल की कार्यप्रणाली पर सवाल: हाईकोर्ट ने यूपी बार काउंसिल की खिंचाई करते हुए कहा कि जब पंजीकृत वकीलों का पूरा रिकॉर्ड उनके पास मौजूद है, तो अधूरी जानकारी या बिना जरूरी दस्तावेजों के आवेदन ट्रस्ट को क्यों भेजे जाते हैं। अदालत ने बार काउंसिल को सत्यापन प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए प्रस्तावित दिशानिर्देशों पर हलफनामा दाखिल करने को कहा।
ट्रस्ट की वित्तीय स्थिति और कॉर्पस फंड का उपयोग
अदालत ने ट्रस्ट की कार्यप्रणाली का वित्तीय विश्लेषण करते हुए पाया:
- फंड की स्थिति: योजना का कॉर्पस फंड ₹20 करोड़ से बढ़कर ₹330 करोड़ हो चुका है।
- ब्याज से भुगतान की सीमा: ट्रस्ट वर्तमान में केवल कॉर्पस पर मिलने वाले ब्याज (लगभग ₹5.64 करोड़ प्रति तिमाही / ₹22.4 करोड़ वार्षिक) से ही भुगतान कर रहा है, जिससे एक साल में केवल करीब 440 आवेदनों का ही निपटारा हो पाता है।
- वित्तीय वर्ष 2026-27 की स्थिति: मौजूदा वित्तीय वर्ष में दो तिमाहियां बाकी हैं और 939 से अधिक लंबित आवेदनों का निपटारा केवल ब्याज से संभव नहीं है।
समयबद्ध भुगतान के लिए निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आश्रितों को समय पर राहत देने के लिए निम्नलिखित व्यवस्था दी:
- सरकार से वित्तीय सहायता की मांग: ट्रस्ट को अगले 30 दिनों के भीतर राज्य सरकार से एकमुश्त वित्तीय सहायता मांगने का निर्देश दिया गया ताकि कॉर्पस फंड सुरक्षित रह सके।
- एफडी (FD) तोड़ने की अनुमति: अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि सरकार से वित्तीय सहायता मिलने में देरी होती है, तो ट्रस्ट कॉर्पस की सावधि जमा (Fixed Deposits) को भुनाकर पात्र आश्रितों को बिना किसी अनावश्यक देरी के मुआवजा वितरित कर सकता है।
अदालत का निर्देश
न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की पीठ ने मामले पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा: “सरकार हलफनामे के माध्यम से बताए कि वित्तीय सहायता योजना के तहत मुआवजे के रूप में वह कितनी राशि बढ़ाने का प्रस्ताव रखती है। हम इसे राज्य सरकार के विवेक पर छोड़ते हैं। यदि अगली तिथि तक इस संबंध में उचित हलफनामा दाखिल नहीं किया गया, तो अदालत इस मामले को गंभीरता से लेने के लिए बाध्य होगी।” अदालत ने ट्रस्ट को अगले 30 दिनों के भीतर राज्य सरकार से अतिरिक्त वित्तीय सहायता मांगने का निर्देश दिया है और मामले की अगली सुनवाई 5 अक्टूबर 2026 तय की है।
एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | विवरण जानकारी |
| केस शीर्षक | जोतिमा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व 2 अन्य (Jyotima v. State of UP & 2 Others) |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| पीठ (Bench) | न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद |
| मुख्य मुद्दा | मृतक अधिवक्ताओं के परिवारों को मिलने वाले ₹5 लाख के मुआवजे में वृद्धि व देरी |
| अगली सुनवाई | 5 अक्टूबर 2026 |

