जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष
- अपील में व्यक्तिगत उपस्थिति अनिवार्य नहीं: कोर्ट ने माना कि आपराधिक अपील एक ऐसी कार्यवाही नहीं है जिसमें अपीलकर्ता का व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होना और बहस करना अनिवार्य हो। चूंकि याचिकाकर्ता के वकील (एडवोकेट महबूब सोफी) पहले से ही रिकॉर्ड पर मौजूद थे, इसलिए अपील की सुनवाई रोकने की कोई कानूनी वजह नहीं थी।
- मानसिक स्थिति का बहाना नहीं चलेगा: हाईकोर्ट ने कहा कि अगर कोई मेडिकल सर्टिफिकेट यह साबित नहीं करता कि आरोपी सभी कानूनी और व्यावहारिक कार्यों में पूरी तरह अक्षम हो गया है, तो केवल ‘डिप्रेशन’ के आधार पर अपील को निलंबित नहीं किया जा सकता।
- सजा के तनाव से जुड़ा डिप्रेशन: न्यायमूर्ति राहुल भारती ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि 40 लाख रुपये के चेक बाउंस मामले में मिली सजा के कारण उत्पन्न तनाव का डिप्रेशन की स्थिति से संबंध होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट ने आपराधिक अपीलों की सुनवाई में व्यक्तिगत उपस्थिति और बीमारी के आधार पर स्थगन (Deferment) मांगने की प्रवृत्ति पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
न्यायमूर्ति राहुल भारती की एकल पीठ ने श्रीनगर के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (Additional Sessions Judge) द्वारा अपील की सुनवाई टालने से इनकार करने के आदेश को पूरी तरह वैध ठहराते हुए हकीम जफर अहमद द्वारा दायर विविध याचिका [CM(M) 353/2026] को शुरुआती चरण में ही खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act) की धारा 138 के तहत दोषी ठहराए गए किसी अपीलकर्ता को अपील में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने या बहस करने की अनिवार्यता नहीं होती। यदि उसका वकील (Counsel on Record) अदालत में प्रतिनिधित्व करने के लिए मौजूद है, तो मानसिक या शारीरिक अस्वस्थता का प्रमाण पत्र अपील की सुनवाई टालने का आधार नहीं बन सकता।
उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां
1. आपराधिक अपील में वकील का प्रतिनिधित्व पर्याप्त अपील की सुनवाई और व्यक्तिगत उपस्थिति के विधिक सिद्धांत पर पीठ ने कहा: “आपराधिक अपील ऐसी कार्यवाही नहीं है जिसमें अपीलकर्ता को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर स्वयं बहस करने की आवश्यकता हो। चूंकि अपीलकर्ता की ओर से अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के समक्ष अधिवक्ता पहले से रिकॉर्ड पर मौजूद हैं, इसलिए ऐसा कोई कानूनी या प्रक्रियात्मक अवरोध नहीं है जो उनकी ओर से अपील की सुनवाई और बहस को रोके। याचिकाकर्ता का मानसिक तनाव या बीमारी अपील की कार्यवाही को रोकने का औचित्य नहीं बन सकती।”
2. बीमारी और दोषसिद्धि के संबंध पर अदालत का रुख अदालत ने याचिकाकर्ता की नीयत पर संदेह जताते हुए टिप्पणी की कि 40 लाख रुपये के चेक बाउंस मामले में हुई दोषसिद्धि के परिणाम से उत्पन्न तनाव को सुनवाई टालने की ढाल नहीं बनाया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि और विवाद
- चेक बाउंस में दोषसिद्धि: 10 सितंबर 2025 को न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (सिटी जज), श्रीनगर ने ₹40 लाख के चेक अनादर (Cheque Bounce) मामले में हकीम जफर अहमद को एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत दोषी ठहराया था।
- सत्र अदालत में अपील और स्थगन की मांग: दोषसिद्धि के खिलाफ याचिकाकर्ता ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, श्रीनगर के समक्ष आपराधिक अपील दायर की। सुनवाई के दौरान उसने खुद को ‘एडजस्टमेंट डिसऑर्डर विथ डिप्रेस्ड मूड’ (मानसिक अवसाद) का मरीज बताते हुए अपील की सुनवाई टालने का आवेदन दिया।
- सत्र अदालत का इनकार: 30 जून 2026 को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने इस आधार पर सुनवाई टालने से इनकार कर दिया कि रिकॉर्ड पर वकील मौजूद है, इसलिए अपील आगे बढ़ सकती है। इसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
- दोषसिद्धि और अपील: 10 सितंबर 2025 को न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (सिटी जज), श्रीनगर द्वारा 40 लाख रुपये के चेक बाउंस मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद, याचिकाकर्ता (हकीम जफर अहमद) ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, श्रीनगर की अदालत में आपराधिक अपील दायर की थी।
- बीमारी के आधार पर स्थगन की मांग: अपील लंबित रहने के दौरान, याचिकाकर्ता ने साइकियाट्रिक (मानसिक बीमारी) का हवाला देते हुए सुनवाई टालने की मांग की। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने 30 जून 2026 को इस मांग को खारिज कर दिया, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
- मेडिकल सर्टिफिकेट की स्थिति: याचिकाकर्ता की ओर से अप्रैल 2026 का एक “बीमारी प्रमाण पत्र” पेश किया गया, जिसमें उसे ‘एडजस्टमेंट डिसऑर्डर’ (Adjustment Disorder with Depressed Mood) से पीड़ित बताया गया था।
मेडिकल सर्टिफिकेट और हाईकोर्ट का विश्लेषण
- नाकाफी मेडिकल साक्ष्य: याचिकाकर्ता ने ‘गवर्नमेंट साइकियाट्रिक डिजीज हॉस्पिटल, श्रीनगर’ द्वारा 2 अप्रैल 2026 को जारी एक “इलनेस सर्टिफिकेट” पेश किया, जिसमें केवल एडजस्टमेंट डिसऑर्डर का उल्लेख था।
- अदालत की कसौटी पर खरा नहीं: हाईकोर्ट ने पाया कि यह प्रमाण पत्र ऐसी किसी पूर्ण अक्षमता (Comprehensive Disability) को प्रमाणित नहीं करता जो व्यक्ति को अपने कानूनी मामलों या सामान्य जीवन के कार्यों को संभालने से पूरी तरह अक्षम बनाती हो। इसके अतिरिक्त, जब वकालतनामा देकर वकील नियुक्त किया जा चुका है, तो सुनवाई को अनिश्चितकाल के लिए नहीं रोका जा सकता।
अंतिम आदेश
जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय ने सत्र अदालत के 30 जून 2026 के आदेश में किसी भी प्रकार की विधिक त्रुटि न पाते हुए याचिका को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि श्रीनगर के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के समक्ष लंबित आपराधिक अपील अब बिना किसी देरी के आगे बढ़ेगी, जहां अधिवक्ता महबूब सोफी याचिकाकर्ता का पक्ष रखेंगे।
जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट की टिप्पणी
न्यायमूर्ति राहुल भारती ने आदेश सुनाते हुए स्पष्ट किया: “अपील की कार्यवाही में अपीलकर्ता को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर तर्क देने की कानूनी आवश्यकता नहीं होती है। चूंकि याचिकाकर्ता की ओर से अपील में बहस करने के लिए अधिवक्ता पहले से ही रिकॉर्ड पर मौजूद हैं, इसलिए उसकी कथित मानसिक स्थिति अपील की कार्यवाही को रोकने या टालने का कोई वैध आधार नहीं बन सकती।”
विधिक प्रतिनिधित्व
- याचिकाकर्ता (दोषी) की ओर से: अधिवक्ता अस्मा रशीद।
- प्रतिवादी (शिकायतकर्ता रतन सिंह) की ओर से: अधिवक्ता आसिफ अहमद भट।
Criminal Appeal: एट ए ग्लान्स (At a Glance of Order)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय (Srinagar Bench) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति राहुल भारती (Justice Rahul Bharti) |
| मामले की पृष्ठभूमि | 40 लाख रुपये के चेक बाउंस (Section 138 NI Act) में 10 सितंबर 2025 को सजा का मामला। |
| याचिकाकर्ता की दलील | डिप्रेशन/मानसिक बीमारी (Adjustment Disorder) के आधार पर अपील की सुनवाई स्थगित (Defer) करने की मांग। |
| अदालत का फैसला | याचिका खारिज (Petition Dismissed); वकील रिकॉर्ड पर मौजूद है तो आरोपी की व्यक्तिगत उपस्थिति जरूरी नहीं। |

