Sunday, August 30, 2026
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NLU Convocation: जब बार काउंसिल अपने सदस्यों का सम्मान अर्जित नहीं कर पाती, तो यह अच्छा संकेत नहीं… बोलीं सुप्रीम कोर्ट जस्टिस बी.वी. नागरत्ना

संबोधन के प्रमुख बिंदु और मुख्य बातें

  • बार काउंसिलों को आत्ममंथन की जरूरत: न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि चाहे केंद्रीय बार काउंसिल (BCI) हो या राज्यों की बार काउंसिल, उन्हें पेशेवर नैतिकता, पवित्रता और दक्षता बनाए रखने में अपनी भूमिका पर आत्ममंथन करना चाहिए।
  • बार की स्वतंत्रता कोई विशेषाधिकार नहीं: उन्होंने बार की स्वतंत्रता पर जोर देते हुए कहा कि यह वकीलों के अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए दिया गया कोई अधिकार नहीं है। यह इसलिए मौजूद है क्योंकि एक संवैधानिक लोकतंत्र को ऐसे पेशेवरों की आवश्यकता होती है जो बिना राज्य, बाजार या अपने मुवक्किल की अनुमति की परवाह किए कानूनी सलाह, बहस और चुनौती दे सकें।
  • पेशे की गरिमा: उन्होंने कहा, “यह पेशा कोई व्यवसाय या व्यापार नहीं है, बल्कि यह विश्वास का एक पद (office of trust) है। इसे केवल घंटे के हिसाब से कानूनी ज्ञान बेचने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं किया जा सकता।”
  • लंबित मामलों और न्याय प्रणाली पर चिंता: न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि भारत में बार को एक आवाज में बोलना होगा कि वे न्याय प्रणाली को कैसे टिकाऊ बना सकते हैं, खासकर तब जब न्यायिक प्रणाली मुकदमों की पेंडेंसी (लंबित मामलों), देरी, बढ़ते खर्चों और अनिश्चितता से जूझ रही है।

नई दिल्ली: सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने बार काउंसिलों की कार्यप्रणाली और बार की स्वतंत्रता पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा है कि केंद्रीय और राज्य स्तर की बार काउंसिलों को पेशेवर नैतिकता, शुचिता और योग्यता बनाए रखने में अपनी भूमिका पर आत्मनिरीक्षण (Introspect) करना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि कोई बार काउंसिल अपने ही सदस्यों का सम्मान अर्जित करने में विफल रहती है, तो यह संपूर्ण कानूनी पेशे के लिए एक चिंताजनक संकेत है।

जस्टिस नागरत्ना शनिवार (29 अगस्त 2026) को नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (NLU), दिल्ली के 13वें दीक्षांत समारोह को संबोधित कर रही थीं। कार्यक्रम में दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय (विश्वविद्यालय के कुलाधिपति), दिल्ली हाईकोर्ट के अन्य न्यायाधीश और कुलपति प्रो. जी.एस. बाजपेयी भी उपस्थित थे।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की प्रमुख टिप्पणियां

1. बार काउंसिलों को आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता बार काउंसिलों की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा: “बार काउंसिल, चाहे वह केंद्र की हो या राज्यों की, उन्हें पेशेवर नैतिकता, नैतिकता और पेशेवर क्षमता को बनाए रखने में अपनी भूमिका और महत्व पर आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। जब एक बार काउंसिल अपने सदस्यों का सम्मान अर्जित नहीं कर पाती है, तो यह कानूनी पेशे के लिए अच्छा संकेत नहीं है।”

2. बार की स्वतंत्रता केवल वकीलों के लाभ के लिए नहीं वकालत के पेशे की स्वायत्तता पर जोर देते हुए उन्होंने रेखांकित किया: “बार की स्वतंत्रता कोई ऐसा विशेषाधिकार (Entitlement) नहीं है जो वकीलों को उनके अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए दिया गया हो। यह इसलिए अस्तित्व में है क्योंकि एक संवैधानिक लोकतंत्र को ऐसे पेशेवरों के समूह की आवश्यकता होती है जो राज्य, बाजार या यहां तक कि अपने स्वयं के मुवक्किलों से अनुमति लिए बिना सलाह दे सकें, बहस कर सकें, चुनौती दे सकें और प्रतिनिधित्व कर सकें।”

3. कानूनी पेशा केवल घंटे के हिसाब से ज्ञान बेचने का साधन नहीं कानूनी पेशे के महान आदर्शों को याद दिलाते हुए उन्होंने कहा: “वकालत केवल कोई व्यवसाय या व्यापार नहीं है, बल्कि यह एक विश्वास का पद (Office of Trust) है। इसे केवल ऐसे व्यक्ति तक सीमित नहीं किया जा सकता जो घंटे के हिसाब से कानूनी ज्ञान बेचता हो।”

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न्याय प्रणाली की चुनौतियों पर एक सुर में बोलने का आह्वान

न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि भारतीय न्याय प्रणाली मुकदमों की पेंडेंसी, अत्यधिक देरी, बढ़ती कानूनी लागत और अनिश्चितता जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है। ऐसे समय में देश की पूरी ‘बार’ (वकीलों के समुदाय) को एक सुर में आवाज उठानी चाहिए कि भारत में न्याय वितरण प्रणाली को कैसे सुदृढ़ और टिकाऊ बनाया जा सकता है।

उन्होंने युवा वकीलों को सचेत करते हुए कहा कि बार की कोई भी चूक या लापरवाही देश के राजनीतिक और नागरिक जीवन पर गहरा असर डालती है। इसलिए अधिवक्ताओं को अपनी मानसिकता बदलनी होगी और जनसेवा की भावना से काम करना होगा, अन्यथा भविष्य में वे अपनी प्रासंगिकता खो सकते हैं।

हालिया विवाद की पृष्ठभूमि

जस्टिस नागरत्ना की यह टिप्पणी हाल ही में बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) से जुड़े एक बड़े विवाद के बाद आई है। बीसीआई के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने राज्य बार काउंसिलों को निर्देश दिया था कि वे नालसार (NALSAR), हैदराबाद के 2026 के ग्रेजुएटिंग बैच के छात्रों का वकीलों के रूप में नामांकन न करें, क्योंकि उन छात्रों ने अपने दीक्षांत समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को आमंत्रित किए जाने पर आपत्ति जताई थी।

छात्रों को संदेश

दीक्षांत समारोह में डिग्री प्राप्त करने वाले छात्रों का मार्गदर्शन करते हुए न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा कि वे इस संस्थान से केवल डिग्रीधारक के रूप में नहीं, बल्कि “अदालत के अधिकारी (Officers of the Court) और संविधान के संरक्षक (Stewards of the Constitution)” के रूप में समाज में प्रवेश कर रहे हैं।

भाषण का मुख्य अंश

दीक्षांत समारोह में स्नातक हो रहे युवा वकीलों को ‘संवैधानिक न्याय का रक्षक’ बताते हुए न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा: “बार काउंसिलों को यह समझना होगा कि जब वे अपने ही सदस्यों का सम्मान खो देती हैं, तो यह कानूनी पेशे के लिए सही नहीं है। वकीलों के किसी भी विचलन या त्रुटि का देश के राजनीतिक और नागरिक जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यदि वकील अपनी सोच नहीं बदलते और केवल व्यापारिक दृष्टिकोण रखते हैं, तो वे भविष्य में अपनी प्रासंगिकता खो देंगे।

NLU Convocation: एट ए ग्लान्स (At a Glance of Key Highlights)

विवरणजानकारी
वक्तान्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना (Justice BV Nagarathna), जज, सुप्रीम कोर्ट
कार्यक्रम13वां दीक्षांत समारोह, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (NLU), दिल्ली
तिथि29 अगस्त 2026
मुख्य विषयबार की स्वतंत्रता, नैतिक जिम्मेदारी, लंबित मामलों की चुनौती और वकालत का पेशा
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