इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष
- कब्जे का विवाद केवल सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में: पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी बेदखल संपत्ति का मालिकाना हक (Title) या कब्जा वापस पाने का विवाद विशुद्ध रूप से सिविल प्रकृति (Civil Nature) का है। हाईकोर्ट, कलेक्टर या जिलाधिकारी को सिविल जज में तब्दील नहीं कर सकता। याचिकाकर्ता को सिविल अदालत में ही जाना होगा।
- कोर्ट फीस पर सरकार को सिफारिश: कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता की आशंकाएं पूरी तरह से गलत नहीं हैं। मौद्रिक मूल्य के हिसाब से कोर्ट फीस वसूलना संवैधानिक ढांचे में पूरी तरह फिट बैठता नहीं दिखता।
- वरिष्ठ नागरिकों की परेशानी: कोर्ट ने माना कि सिविल मुकदमों में देरी और अत्यधिक फीस के कारण वरिष्ठ नागरिकों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दीवानी (Civil) मुकदमों में संपत्ति के मूल्यांकन के आधार पर देय ‘एड वेलोरम’ (Ad Valorem) कोर्ट फीस व्यवस्था को अत्यधिक कठोर बताते हुए सरकार से इस पर पुनर्विचार करने की सिफारिश की है।
न्यायमूर्ति जे. जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने कानपुर देहात स्थित अपनी पेपर मिल पर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति द्वारा किए गए अतिक्रमण के खिलाफ 70 वर्षीय वरिष्ठ नागरिक लक्ष्मीकांत अग्रवाल की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की। अदालत ने टिप्पणी की कि नागरिक न्याय (Civil Justice) पर संपत्ति के बाजार मूल्य के अनुपात में इस तरह टैक्स लगाना संवैधानिक ढांचे के अनुकूल प्रतीत नहीं होता।
उच्च न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियां
मूल्य-आधारित कोर्ट फीस और न्याय तक पहुंच पर अदालत ने कहा: “हम सरकार से सिफारिश करेंगे कि वह ‘एड वेलोरम’ (मूल्य-आधारित) दरों पर दीवानी न्याय पर कर लगाकर उत्पन्न होने वाली कठिनाई को कम करने पर विचार करे। यह संवैधानिक व्यवस्था में पूरी तरह फिट बैठता प्रतीत नहीं होता। हम यह नहीं कहते कि कोर्ट फीस बिल्कुल नहीं ली जानी चाहिए, लेकिन न्याय पर इस दर से कर लगाना वास्तव में कठोर (Harsh) है।”
दीवानी अदालतों के क्षेत्राधिकार और वरिष्ठ नागरिकों के मामलों पर पीठ ने रेखांकित किया: “याचिकाकर्ता मूलतः एक अनधिकृत कब्जाधारी (Trespasser) से अपनी संपत्ति का कब्जा वापस पाना चाहता है। उसे इसके लिए सक्षम दीवानी अदालत में ही जाना होगा। हम कलेक्टर को वरिष्ठ नागरिकों के दीवानी मुकदमों की सुनवाई करने वाला जज नहीं बना सकते।”
मामले की पृष्ठभूमि और याचिकाकर्ता का पक्ष
- संपत्ति पर अतिक्रमण: 70 वर्षीय याचिकाकर्ता लक्ष्मीकांत अग्रवाल ने आरोप लगाया कि कानपुर देहात के विसायकपुर रानियां गांव स्थित उनकी पेपर मिल पर एक आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति ने अवैध कब्जा कर लिया है।
- दीवानी अदालत न जाने का तर्क: याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि दीवानी अदालतों में प्रक्रिया अत्यधिक समय लेने वाली है और वह संपत्ति के मूल्य के अनुसार भारी-भरकम ‘एड वेलोरम’ कोर्ट फीस चुकाने में असमर्थ हैं।
- सीनियर सिटीजन एक्ट के तहत राहत की मांग: पूर्व में हाईकोर्ट द्वारा दीवानी अदालत जाने का निर्देश दिए जाने के बाद, याचिकाकर्ता ने पुनः याचिका दायर कर जिलाधिकारी को ‘उत्तर प्रदेश माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण नियमावली, 2014’ के नियम 21 और 22 के तहत संपत्ति की बहाली के लिए जांच करने का निर्देश देने की मांग की।
हाईकोर्ट का निर्णय
- दीवानी अदालत ही सक्षम मंच: अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक किसी कानून द्वारा दीवानी अदालतों का अधिकार क्षेत्र स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित न किया गया हो, तब तक संपत्ति के स्वामित्व और कब्जे से जुड़े सभी दीवानी विवादों के निस्तारण का अधिकार केवल दीवानी अदालत को ही है।
- रिट याचिका में राहत से इनकार: अदालत ने कहा कि रिट क्षेत्राधिकार का उपयोग कर प्रशासनिक अधिकारियों को संपत्ति के टाइटल और कब्जे का फैसला करने का अधिकार नहीं सौंपा जा सकता।
- सक्षम अदालत जाने का निर्देश: उच्च न्यायालय ने याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को उपयुक्त दीवानी अदालत में वाद दायर करने को कहा, हालांकि उनकी व्यावहारिक कठिनाइयों के मद्देनजर सरकार को एड वेलोरम कोर्ट फीस नीति में सुधार करने की सलाह दी।
- संपत्ति पर कब्जा: 70 वर्षीय याचिकाकर्ता लक्ष्मीकांत अग्रवाल ने आरोप लगाया कि कानपुर देहात स्थित उनकी पेपर मिल (व्यावसायिक संपत्ति) पर एक आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति ने अवैध कब्जा कर लिया है।
- सिविल कोर्ट न जाने का कारण: याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि सिविल अदालतों में प्रक्रिया अत्यधिक समय लेने वाली होती है और वे ‘एड वैलोरम’ दर (संपत्ति के कुल मूल्य के अनुपात में) से भारी कोर्ट फीस चुकाने में असमर्थ हैं। उन्होंने जिलाधिकारी से ‘वरिष्ठ नागरिक नियमों’ के तहत मदद मांगी थी।
- हाईकोर्ट की शरण: जब कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट से हस्तक्षेप करने और जिलाधिकारी को इस मामले में जांच व कब्जा वापस दिलाने का आदेश देने की मांग की।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी
न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की पीठ ने कहा: “हम सरकार से सिफारिश करेंगे कि वह मूल्यानुसार (Ad Valorem Rates) दरों पर सिविल न्याय पर कर लगाने से होने वाली कठिनाई को कम करने पर विचार करे। यह संवैधानिक व्यवस्था में सटीक बैठता प्रतीत नहीं होता। हम यह नहीं कहते कि कोर्ट फीस बिल्कुल नहीं ली जानी चाहिए, लेकिन न्याय पर मूल्यानुसार कर लगाना वाकई कठोर (harsh) है।”
विधिक प्रतिनिधित्व
- याचिकाकर्ता की ओर से: अधिवक्ता देवव्रत यादव, फूल सिंह यादव और राम प्रताप यादव।
- राज्य सरकार की ओर से: अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता (ACSC) गिरीश कुमार त्रिपाठी।
Court Fee:एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| पीठासीन पीठ | न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर एवं न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला |
| मामला/पक्षकार | लक्ष्मीकांत अग्रवाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य (Laxmikant Aggarwal v State of UP and Others) |
| मुख्य मुद्दा | व्यावसायिक संपत्ति पर कब्जे का विवाद और सिविल कोर्ट की ‘एड वैलोरम’ (मूल्यानुसार) फीस की चुनौती |
| अदालत का फैसला | याचिका खारिज; याचिकाकर्ता को सिविल कोर्ट जाने का निर्देश और सरकार से कोर्ट फीस नीति पर विचार की सिफारिश। |

