Thursday, October 15, 2026
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Ground Of Infertility: बांझपन/निःसंतानता विवाह रद्द करने का आधार नहीं; हिंदू विवाह कोई अनुबंध नहीं बल्कि एक संस्कार है, पति की याचिका पढ़ें

झारखंड हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष

  • विवाह कोई कॉन्ट्रैक्ट नहीं है: कोर्ट ने कहा कि हालांकि हिंदू विवाह अधिनियम में संशोधन हुए हैं, लेकिन विवाह को संस्कार मानने की प्राचीन परंपरा आज भी उतनी ही मजबूत है। कॉन्ट्रैक्ट एक्ट की धोखाधड़ी की परिभाषा को हिंदू विवाह पर लागू नहीं किया जा सकता।
  • हर छिपाव ‘धोखाधड़ी’ नहीं: पीठ ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत हर एक तथ्य या बीमारी का न बताना धोखाधड़ी (Fraud) के दायरे में नहीं आता, जो विवाह को रद्द करने का आधार बने।
  • समयसीमा और जानकारी: कोर्ट ने नोट किया कि पति 2018 से ही पत्नी का इलाज करा रहा था और उसे स्वास्थ्य स्थिति का पता था, इसलिए 2022 में नए सिरे से धोखाधड़ी का दावा करना कानूनी रूप से स्वीकार्य नहीं है।

रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) के तहत एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि हिंदू कानून के तहत विवाह कोई व्यावसायिक अनुबंध (Contract) नहीं, बल्कि एक पवित्र संस्कार (Sacrament) है। अदालत ने पत्नी की पुरानी चिकित्सीय स्थिति (Medical Condition) और गर्भधारण न कर पाने की कथित अक्षमता को छुपाने के आधार पर विवाह को शून्य (Annul) घोषित करने की मांग करने वाली पति की याचिका को सिरे से खारिज कर दिया।

न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि ‘भारतीय अनुबंध अधिनियम’ (Contract Act) में दी गई धोखाधड़ी (Fraud) की परिभाषा को सीधे तौर पर हिंदू विवाह पर लागू नहीं किया जा सकता।

उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां

1. विवाह संस्कार है, अनुबंध नहीं हिंदू विवाह अधिनियम और अनुबंध अधिनियम के अंतर को स्पष्ट करते हुए अदालत ने कहा: “हिंदू विवाह अधिनियम ने निस्संदेह प्राचीन हिंदू कानून में कुछ सुधार किए हैं, फिर भी यह दृढ़ता से मानता है कि विवाह एक संस्कार (Sacrament) है, न कि कोई अनुबंध (Contract)। हिंदू विवाह अधिनियम और अनुबंध अधिनियम ‘परी मटेरिया’ (समान विषय से संबंधित) नहीं हैं, क्योंकि पहला विवाह से संबंधित है और दूसरा व्यापार व वाणिज्य से। इसलिए, अनुबंध अधिनियम के तहत दी गई धोखाधड़ी की परिभाषा को पूरी तरह से विवाह जैसे संस्कार में लागू नहीं किया जा सकता।”

2. हर तरह का छिपाव विवाह रद्द करने की धोखाधड़ी नहीं अदालत ने आगे रेखांकित किया: “यह कानून की स्थापित स्थिति है कि हिंदू विवाह अधिनियम सामान्य रूप से धोखाधड़ी से नहीं निपटता है, और न ही यह हर प्रकार के गलत बयानी या तथ्य छिपाने को ऐसा धोखाधड़ी मानता है जिसके आधार पर विवाह को शून्य घोषित कर दिया जाए।”

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मामले की पृष्ठभूमि और पति के आरोप

  • 2017 में विवाह और चिकित्सा इतिहास: जोड़े का विवाह वर्ष 2017 में हुआ था। पति का आरोप था कि विवाह से पहले (वर्ष 2011 में) उसकी पत्नी की सिस्ट और अंडाशय (Ovary) की सर्जरी हुई थी और वह एक पुरानी ऑटोइम्यून स्थिति से पीड़ित थी।
  • तथ्य छिपाने का दावा: पति का दावा था कि उसे 2022 में घर की सफाई के दौरान पत्नी के पुराने मेडिकल रिकॉर्ड मिले। डॉक्टरों से परामर्श के बाद उसे पता चला कि इस बीमारी के कारण पत्नी के गर्भधारण करने (Conceive) की क्षमता प्रभावित हो सकती है। पति ने दलील दी कि यह जानकारी उससे जानबूझकर छिपाई गई थी, इसलिए विवाह के लिए उसकी सहमति धोखे से ली गई थी।
  • फैमिली कोर्ट का फैसला: फैमिली कोर्ट ने पाया कि पति 2018 से ही पत्नी के इलाज और स्वास्थ्य समस्याओं से पूरी तरह अवगत था, इसलिए धोखाधड़ी का दावा टिकने योग्य नहीं है। फैमिली कोर्ट द्वारा याचिका खारिज किए जाने के बाद पति ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
  • शादी और आरोप: जोड़े का विवाह 2017 में हुआ था। पति का दावा था कि शादी के बाद से ही पत्नी का व्यवहार ठीक नहीं था और वह बीमार रहती थी। उसने आरोप लगाया कि पत्नी की 2011 (शादी से पहले) में ओवरी में सिस्ट की सर्जरी हुई थी और वह एक पुरानी बीमारी से पीड़ित थी, जिससे उसके मां बनने में समस्या थी।
  • दस्तावेज़ मिलने का दावा: पति ने कहा कि उसे अक्टूबर 2022 में घर की सफाई के दौरान पत्नी के पुराने मेडिकल रिकॉर्ड्स मिले, जिससे उसे धोखाधड़ी का पता चला। इसके बाद उसने फैमिली कोर्ट में हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 12 के तहत शादी रद्द करने का केस किया।
  • फैमिली कोर्ट और हाईकोर्ट का रुख: फैमिली कोर्ट द्वारा याचिका खारिज होने के बाद पति ने हाईकोर्ट का रुख किया। हाईकोर्ट ने सबूतों की जांच के बाद पाया कि पति को 2018 से ही अपनी पत्नी की मेडिकल स्थिति की पूरी जानकारी थी।

हाईकोर्ट द्वारा याचिका खारिज करने के मुख्य आधार

  1. चिकित्सीय स्थिति की पूर्व जानकारी: साक्ष्यों की श्रृंखला से स्पष्ट हुआ कि पति 2018 से ही पत्नी की बीमारी और उपचार से भली-भांति परिचित था और उसने उसके इलाज पर खर्च भी किया था। ऐसे में कई वर्षों बाद 2022 में ‘अचानक धोखाधड़ी का पता चलने’ की दलील स्वीकार्य नहीं है।
  2. धोखाधड़ी का दायरा सीमित: हिंदू विवाह कानून के तहत सहमति प्राप्त करने में धोखाधड़ी केवल विवाह की प्रकृति या जीवनसाथी की पहचान जैसी मूलभूत पहचान तक सीमित होती है; हर चिकित्सीय जटिलता या प्रजनन क्षमता से जुड़ी समस्या वैवाहिक बंधन को शून्य करने का आधार नहीं बन सकती।
  3. पत्नी के जवाब न देने पर भी दावा साबित नहीं: पति के इस तर्क को अदालत ने खारिज कर दिया कि पत्नी द्वारा लिखित बयान न देने के कारण उसका दावा स्वतः सच मान लिया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि वैवाहिक मामलों में वादी को स्वयं कानूनन अपना मामला साबित करना होता है।

झारखंड हाईकोर्ट की टिप्पणी

न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की पीठ ने 18 अगस्त के अपने आदेश में कहा: “हिंदू विवाह अधिनियम और अनुबंध अधिनियम (Contract Act) एक जैसे नहीं हैं। पहला विवाह से संबंधित है और दूसरा व्यापार व अनुबंधों से। इसलिए, कॉन्ट्रैक्ट एक्ट के तहत दी गई धोखाधड़ी की परिभाषा को पूरी तरह से विवाह में नहीं लाया जा सकता, जो कि एक संस्कार है। पत्नी की पुरानी बीमारी या बांझपन को छिपाने के आरोप से विवाह अमान्य करने योग्य धोखाधड़ी साबित नहीं होती।”

अंतिम आदेश

झारखंड उच्च न्यायालय ने फैमिली कोर्ट के निर्णय को पूरी तरह सही ठहराते हुए पति द्वारा विवाह को शून्य घोषित करने (Decree of Nullity) की मांग वाली अपील को खारिज कर दिया।

विधिक प्रतिनिधित्व

  • पति (अपीलकर्ता) की ओर से: अधिवक्ता हेमंत जैन।

Ground Of Infertility:एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतझारखंड उच्च न्यायालय (Jharkhand High Court)
पीठासीन पीठन्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद एवं न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव
कानून/धाराहिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (धारा 12 – विवाह का अमान्यीकरण)
मामला/विवादपति का आरोप कि शादी से पहले पत्नी की ओवरी की बीमारी और बांझपन की बात छिपाई गई।
अदालत का फैसलापति की याचिका खारिज; बीमारी या बांझपन के आधार पर शादी रद्द नहीं हो सकती।
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