Monday, August 31, 2026
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Question Of Eligibility: फैमिली कोर्ट जज ‘हाईकोर्ट जज’ बनने के योग्य नहीं; सुप्रीम कोर्ट ने 2011 की नजीर पर पुनर्विचार करने से किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और टिप्पणियां

  • अलग कैडर (Separate Cadre) ही असली समस्या: CJI सूर्य कांत ने रेखांकित किया कि अधिकांश राज्यों में फैमिली कोर्ट जज जिला जजों के मुख्य कैडर से ही डेप्युटेशन (Deputation) पर भेजे जाते हैं, जिससे उनका ‘न्यायिक अधिकारी’ का दर्जा बरकरार रहता है। समस्या महाराष्ट्र में फैमिली कोर्ट के लिए बनाए गए अलग और विशिष्ट कैडर से है, जहां जज आपराधिक या अन्य सामान्य सिविल मामलों की सुनवाई नहीं करते।
  • समानता का अभाव: न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची ने स्पष्ट किया कि 2011 के फैसले में जिला जज के कैडर और फैमिली कोर्ट जज के कार्यों व क्षेत्राधिकार की विस्तृत तुलना की गई थी, जिसमें दोनों को समान नहीं पाया गया था।
  • नीतिगत सुधार (Policy Reform) का रास्ता खुला: कोर्ट ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता इस संरचनात्मक समस्या का समाधान चाहते हैं, तो वे हाईकोर्ट और राज्य सरकार के समक्ष प्रशासनिक स्तर पर गुहार लगा सकते हैं। राज्य सरकार और हाईकोर्ट आपस में परामर्श कर इस अलग कैडर को समाप्त कर इसे मुख्य न्यायिक कैडर में विलय (Merge) करने का नीतिगत फैसला ले सकते हैं।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने फैमिली कोर्ट जजों की पदोन्नति को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए महाराष्ट्र के सात फैमिली कोर्ट जजों की उस याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया है, जिसमें उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 217(2)(a) के तहत हाईकोर्ट जज के रूप में नियुक्ति की पात्रता के लिए अपने पद को “न्यायिक पद” (Judicial Office) घोषित करने की मांग की थी।

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने स्पष्ट किया कि यह विधिक मुद्दा सुप्रीम कोर्ट के वर्ष 2011 के ऐतिहासिक निर्णय—एस.डी. जोशी एवं अन्य बनाम बॉम्बे हाईकोर्ट [(2011) 1 SCC 252]—द्वारा पहले ही पूरी तरह तय किया जा चुका है। शीर्ष अदालत ने पूर्व नजीर (Precedent) पर पुनर्विचार करने से साफ इनकार कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख विधिक टिप्पणियां

1. अलग कैडर के फैमिली कोर्ट जज ‘न्यायिक पद’ के दायरे में नहीं 2011 के फैसले का हवाला देते हुए पीठ ने कहा: “एस.डी. जोशी के फैसले में इस मुद्दे का स्पष्ट उत्तर दिया जा चुका है कि एक अलग (एक्सक्लूसिव) कैडर के तहत काम करने वाले फैमिली कोर्ट जज को संविधान के अनुच्छेद 217(2)(a) के प्रयोजनों के लिए ‘न्यायिक पद’ (Judicial Office) धारण करने वाला नहीं माना जा सकता। जब तक कानून या तथ्यों में कोई ठोस बदलाव न हो, इस तय सिद्धांत पर दोबारा विचार करने का कोई औचित्य नहीं है।”

2. अनुच्छेद 32 के तहत फैसले की समीक्षा की मांग अनुचित पीठ ने याचिका के प्रारूप पर सवाल उठाते हुए कहा: “यह रिट याचिका मूल रूप से सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णय की समीक्षा (Review/Recall) की मांग करती है। अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका इस अदालत के बाध्यकारी निर्णय की समीक्षा मांगने का उपयुक्त विधिक माध्यम नहीं है।”

अलग कैडर (Separate Cadre) की समस्या पर CJI की टिप्पणी

सीजेआई सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र में फैमिली कोर्ट के लिए अलग कैडर बनाए जाने की व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा:

  • अन्य राज्यों की व्यवस्था: अधिकांश राज्यों में फैमिली कोर्ट के लिए कोई स्वतंत्र कैडर नहीं होता; वहां नियमित जिला जज (District Judge) कैडर के अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति (Deputation) पर फैमिली कोर्ट में भेजा जाता है। ऐसे जज नियमित न्यायिक सेवा का हिस्सा बने रहते हैं और अनुच्छेद 217(2)(a) के तहत हाईकोर्ट जज पद के लिए पात्र रहते हैं।
  • महाराष्ट्र का विशेष ढांचा: महाराष्ट्र में फैमिली कोर्ट का एक अलग कैडर बनाया गया है, जहां के जज अन्य आपराधिक या दीवानी मामलों की नियमित सुनवाई नहीं करते। अदालत ने रेखांकित किया कि मुख्य समस्या अलग कैडर के निर्माण में है।

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याचिकाकर्ताओं की दलीलें

36 वर्षों की सेवा स्थिति: याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता आर. बसंत ने तर्क दिया कि महाराष्ट्र में पिछले 36 वर्षों से किसी बाहरी व्यक्ति को फैमिली कोर्ट जज नियुक्त नहीं किया गया है। सभी जज न्यायिक परीक्षा पास कर या वकील के रूप में नियुक्त हुए हैं और उनके पास 7 से 26 वर्षों का न्यायिक अनुभव है।

अनुच्छेद 217(2)(a) का दायरा: उन्होंने दलील दी कि SD Joshi का फैसला उस समय की परिस्थितियों पर आधारित था। चूंकि अब केवल कानूनी/न्यायिक पृष्ठभूमि के लोग ही नियुक्त हो रहे हैं, इसलिए उन्हें “न्यायिक पद” धारक माना जाना चाहिए।

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता आर. बसंत ने तर्क दिया:

  • सभी सातों याचिकाकर्ताओं ने 7 से 26 वर्षों तक न्यायिक सेवा दी है और वे सबऑर्डिनेट जज के बाद फैमिली कोर्ट जज बने हैं।
  • पिछले 36 वर्षों में महाराष्ट्र में न्यायिक सेवा से बाहर के किसी व्यक्ति को फैमिली कोर्ट जज नियुक्त नहीं किया गया है; सभी ने न्यायिक सेवा परीक्षा उत्तीर्ण की है।
  • इसलिए बदले हुए तथ्यों के आधार पर 2011 के एस.डी. जोशी निर्णय पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए।

प्रशासनिक व नीतिगत सुधार का सुझाव

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए याचिकाकर्ताओं को प्रशासनिक स्तर पर समाधान तलाशने की छूट दी:

  • नीतिगत निर्णय: अदालत ने स्पष्ट किया कि अलग कैडर को समाप्त करना या फैमिली कोर्ट के पदों को उच्चतर न्यायिक सेवा (Higher Judicial Service) के साथ ट्रांसफर योग्य बनाना पूरी तरह से एक नीतिगत मामला (Policy Matter) है।
  • हाईकोर्ट और राज्य सरकार से संपर्क: याचिकाकर्ता फैमिली कोर्ट भर्ती नियमों में संशोधन और कैडर सुधार के लिए बॉम्बे हाईकोर्ट और महाराष्ट्र राज्य सरकार के समक्ष अपना पक्ष रख सकते हैं, जो आपसी परामर्श से इस पर उचित निर्णय ले सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश

पीठ ने अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिका को खारिज करते हुए कहा: “यह याचिका अनिवार्य रूप से इस अदालत के 2011 के फैसले (SD Joshi) के पुनरीक्षण या उसे वापस लेने की मांग करती है। हमारी राय में अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका इस अदालत के फैसले की समीक्षा मांगने का सही जरिया नहीं है। राज्य सरकार और उच्च न्यायालय आपस में परामर्श करके फैमिली कोर्ट के नियमों में संशोधन का नीतिगत फैसला लेने के लिए स्वतंत्र हैं।”

Question Of Eligibility: एट ए ग्लान्स (At a Glance of Order)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतउच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठासीन पीठCJI सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
मामला/कानूनअनुच्छेद 217 (हाईकोर्ट जज की योग्यता) एवं S.D. Joshi [(2011) 1 SCC 252]
मुख्य विवादक्या फैमिली कोर्ट के अलग कैडर के जज हाईकोर्ट जज बनने के योग्य हैं?
अदालत का निर्णययाचिका खारिज (अनुच्छेद 32 के तहत नजीर को चुनौती नहीं दी जा सकती); नीतिगत बदलाव के लिए राज्य व हाईकोर्ट जाने की सलाह।
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