मुख्य निष्कर्ष
- डीएनए साक्ष्य की सीमा: हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि डीएनए रिपोर्ट केवल शारीरिक संबंध की पुष्टि का साक्ष्य है:“यह साक्ष्य निस्संदेह महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पक्षों के बीच शारीरिक संबंध स्थापित करता है। हालांकि, डीएनए रिपोर्ट अपने आप में उन परिस्थितियों को स्थापित नहीं करती जिनमें ऐसा संबंध बना, न ही यह तय करती है कि संबंध सहमति से था या असहमति से।”
- बयानों में विरोधाभास और सुधार: अदालत ने पाया कि नशीला पदार्थ पिलाए जाने के दावों और पीड़िता के मुख्य बयानों में महत्वपूर्ण विरोधाभास (Inconsistencies) थे।
- सहमति का परीक्षण: अदालत ने माना कि यौन अपराधों में देरी या व्यवहार को रूढ़िवादिता के आधार पर नहीं आंका जा सकता, लेकिन बयानों की विश्वसनीयता जांचने के लिए घटना की परिस्थितियां और पक्षों का आचरण प्रासंगिक होता है।
- बरी के मामलों में हस्तक्षेप का दायरा: कोर्ट ने दोहराया कि जब ट्रायल कोर्ट ने साक्ष्यों के आधार पर एक संभावित और तर्कसंगत निष्कर्ष निकाला हो, तो केवल इसलिए कि दूसरा दृष्टिकोण भी संभव है, बरी के फैसले में हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए।
नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने बलात्कार और यौन उत्पीड़न से जुड़े मामलों में डीएनए साक्ष्य (DNA Evidence) की कानूनी प्रासंगिकता पर एक महत्वपूर्ण विधिक निर्णय दिया है।
न्यायमूर्ति मधु जैन की एकल पीठ ने एक व्यक्ति को आईपीसी की धारा 328 (नशीला पदार्थ देना), 376(2)(n) (बार-बार दुष्कर्म), 377 (अप्राकृतिक यौन संबंध), 506 (धमकी) और 509 के आरोपों से बरी करने के ट्रायल कोर्ट के फैसले को पूरी तरह बरकरार रखा। अदालत ने फैसला सुनाया है कि डीएनए रिपोर्ट केवल आरोपी और पीड़िता के बीच शारीरिक संबंध (Sexual Intercourse) होने की पुष्टि करती है, लेकिन वह अपने आप में यह साबित नहीं करती कि संबंध सहमति से (Consensual) बने थे या बिना सहमति के (Non-consensual)।
प्रमुख विधिक टिप्पणियां
1. डीएनए साक्ष्य की सीमाएं डीएनए रिपोर्ट की साक्ष्य गुणवत्ता का विश्लेषण करते हुए अदालत ने कहा: “डीएनए रिपोर्ट निस्संदेह अत्यंत महत्वपूर्ण साक्ष्य है क्योंकि यह पक्षों के बीच शारीरिक संबंध के तथ्य को स्थापित करती है और साबित करती है कि आरोपी ही बच्चे का जैविक पिता (Biological Father) है। हालांकि, डीएनए रिपोर्ट अपने आप में उन परिस्थितियों को स्थापित नहीं करती जिनमें शारीरिक संबंध बने थे, और न ही यह तय करती है कि संबंध सहमति से थे या गैर-सहमति से।”
2. दोषमुक्ति के खिलाफ अपील और निर्दोषिता की प्रबल पूर्वधारणा ट्रायल कोर्ट के बरी करने के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए पीठ ने स्पष्ट किया: “महज यह तथ्य कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से कोई दूसरा दृष्टिकोण (Alternate View) भी संभव है, दोषमुक्ति (Acquittal) के खिलाफ अपील में हस्तक्षेप करने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता। ट्रायल कोर्ट द्वारा बरी किए जाने के बाद आरोपी के पक्ष में निर्दोष होने की पूर्वधारणा (Presumption of Innocence) और अधिक मजबूत हो जाती है।”
Sexual Intercourse: मामले की पृष्ठभूमि और अभियोजन पक्ष के आरोप
- लगातार शारीरिक संबंध और नशा देने का आरोप: पीड़िता ने आरोप लगाया था कि पारिवारिक परिचित होने का फायदा उठाकर आरोपी ने 2017 से धमकियां देकर और बहला-फुसलाकर उसकी मर्जी के खिलाफ बार-बार संबंध बनाए। एक मौके पर उसे नशीला पदार्थ देकर दुष्कर्म करने का भी आरोप था।
- गर्भधारण और बच्चा: पीड़िता गर्भवती हुई और उसने जून 2019 में एक बच्चे को जन्म दिया।
- डीएनए रिपोर्ट: जांच के दौरान पीड़िता, आरोपी और बच्चे के डीएनए नमूने लिए गए। फोरेंसिक रिपोर्ट में पुष्टि हुई कि आरोपी ही बच्चे का जैविक पिता है।
- आरोपी का धारा 313 CrPC के तहत बयान: आरोपी ने शारीरिक संबंध होने की बात स्वीकार की, लेकिन दावा किया कि यह पूरी तरह आपसी सहमति से बना संबंध था और पीड़िता के पति की जानकारी में था।
- ट्रायल कोर्ट का फैसला (अक्टूबर 2024): बयानों में भारी विरोधाभास और सहमति के अभाव का पुख्ता सबूत न मिलने पर निचली अदालत ने आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया था, जिसके खिलाफ पीड़िता ने हाईकोर्ट में अपील की थी।
हाईकोर्ट द्वारा ट्रायल कोर्ट का फैसला सही ठहराने के मुख्य आधार
- बयानों में बुनियादी विरोधाभास और सुधार (Material Inconsistencies): हाईकोर्ट ने पाया कि पहली कथित घटना के समय पीड़िता के होश में होने या नशीला पदार्थ दिए जाने को लेकर उसके पूर्व और बाद के बयानों में गंभीर विरोधाभास था।
- सहमति के अभाव को साबित करने में विफलता: अभियोजन पक्ष यह संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि संबंध बलपूर्वक, धमकी देकर या नशीला पदार्थ पिलाकर बनाए गए थे।
- पारस्परिक आचरण और परिस्थितियां: अदालत ने माना कि यौन अपराधों में पीड़िता के आचरण को रूढ़िवादी धारणाओं से नहीं तौला जा सकता, लेकिन जब परस्पर विरोधी दावों की विश्वसनीयता तय करनी हो, तो पक्षों का आचरण और आसपास की परिस्थितियां अत्यंत प्रासंगिक हो जाती हैं।
Sexual Intercourse: अंतिम आदेश
न्यायमूर्ति मधु जैन की पीठ ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही मानते हुए बरी के आदेश को बरकरार रखा और याचिका खारिज कर दी। दिल्ली उच्च न्यायालय ने पीड़िता की अपील को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा अक्टूबर 2024 में पारित बरी करने के आदेश (Judgment of Acquittal) की पुष्टि की।
मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| केस संदर्भ | CNRNo.DLHC010132792026 |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति मधु जैन |
| निचली अदालत का आदेश | अक्टूबर 2024 का फैसला (आरोपी को आईपीसी की धारा 376(2)(n), 377, 328, 506 के तहत बरी किया गया) |
| मुख्य बिंदु | डीएनए रिपोर्ट बच्चे के जैविक पिता होने की पुष्टि करती है, पर सहमति/असहमति तय नहीं करती। |
| परिणाम | पीड़िता की अपील खारिज; आरोपी की बरी का फैसला बरकरार। |

