Tuesday, September 8, 2026
HomeHigh CourtDivorce Case: पत्नी से वोडाफोन विज्ञापन के पग (Pug) की तरह पति...

Divorce Case: पत्नी से वोडाफोन विज्ञापन के पग (Pug) की तरह पति के पीछे चलने की उम्मीद नहीं की जा सकती; फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द, पढ़िए

अदालत के मुख्य कानूनी निष्कर्ष

  • व्यभिचार (Adultery) का आरोप खारिज: पति ने पत्नी पर व्यभिचार का आरोप लगाया था, लेकिन हाईकोर्ट ने इसे स्वीकार नहीं किया क्योंकि जिस व्यक्ति पर आरोप था, उसे मुकदमे में पक्षकार (Party/Impleaded) नहीं बनाया गया था।
  • धारा 23(1)(a) की व्याख्या: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘गलती’ (Wrong) का तात्पर्य गंभीर दुर्व्यवहार से होता है, न कि केवल काम के सिलसिले में दूसरे शहर स्थानांतरित होने से।
  • क्रूरता और अपूरणीय अलगाव (Irrerrievable Breakdown):
    • अदालत ने पाया कि 16 वर्षों से दोनों अलग रह रहे हैं और पत्नी ने भी कभी वापस लौटने का प्रयास नहीं किया।
    • सुप्रीम कोर्ट के ‘राकेश रमन बनाम कविता’ (Rakesh Raman v. Kavitha) फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने माना कि लंबे समय तक अलग रहना, सहवास का अभाव और शादी का पूरी तरह से टूट जाना अपने आप में मानसिक क्रूरता (Mental Cruelty) के दायरे में आता है।

चेन्नई: मद्रास हाईकोर्ट ने वैवाहिक दायित्वों और रोजगार के लिए स्थानांतरण को लेकर एक महत्वपूर्ण और व्यावहारिक टिप्पणी की है।

न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति एम.डी. सुमति की खंडपीठ ने शिवगंगा फैमिली कोर्ट के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें पति की तलाक याचिका को यह कहकर खारिज कर दिया गया था कि उसने मुंबई में नौकरी के दौरान पत्नी को साथ न ले जाकर अपने वैवाहिक दायित्वों का उल्लंघन किया था। अदालत ने कहा है कि पत्नी से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह मशहूर वोडाफोन विज्ञापन के पग (कुत्ते की नस्ल) की तरह पति जहां भी जाए, उसके पीछे-पीछे चले। इसके साथ ही, रोजगार या परिस्थितियों के चलते पति के लिए भी हर जगह पत्नी को साथ ले जाना हमेशा संभव नहीं होता।

उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक व व्यावहारिक टिप्पणियां

1. वोडाफोन विज्ञापन और परिस्थितियों की व्यावहारिकता फैमिली कोर्ट के तर्क को खारिज करते हुए खंडपीठ ने कहा: “पत्नी को हमेशा साथ ले जाना हर परिस्थिति में व्यावहारिक नहीं हो सकता। मान लीजिए कि पति एक सैनिक है, तो सैन्य बैरकों में वैवाहिक घर स्थापित करना संभव नहीं है। पत्नी भी अपनी नौकरी में कार्यरत हो सकती है। उससे यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह अविस्मरणीय वोडाफोन विज्ञापन के पग (Pug) की तरह आचरण करे।”

2. फैमिली कोर्ट के दृष्टिकोण पर असहमति निचली अदालत के फैसले पर टिप्पणी करते हुए पीठ ने कहा: “कट्टरपंथी नारीवादी (Radical Feminists) शायद ट्रायल कोर्ट के इस क्रांतिकारी दृष्टिकोण की सराहना करें, लेकिन हमें खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि हम इस पर अपनी सहमति की मुहर नहीं लगा सकते।”

3. धारा 23(1)(a) के तहत ‘अपनी गलती का लाभ उठाना’ नहीं हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 23(1)(a) के तहत ‘गलती’ (Wrong) का तात्पर्य किसी गंभीर या घोर कदाचार (Grave Misconduct) से है। केवल रोजगार के सिलसिले में दूसरे शहर चले जाना ऐसा कदाचार नहीं है जिसके आधार पर तलाक से इनकार किया जाए।

Also Read; Matrimonial Suit: पति-पत्नी के ‘दीवानी अलगाव’ का पूरे परिवार पर आपराधिक मुकदमे में बदलना; यह गंभीर न्यायिक जांच की मांग करता है

मामले की पृष्ठभूमि और विवाद

  • 1992 का विवाह और 16 साल का अलगाव: दंपति का विवाह सितंबर 1992 में हुआ था और उनके चार बच्चे हैं। सुनवाई के समय पति की उम्र 67 वर्ष थी और दोनों पिछले 16 वर्षों से पूरी तरह अलग रह रहे थे।
  • पारस्परिक आरोप: पति ने आरोप लगाया था कि पत्नी ‘व्यभिचार’ (Adultery) में लिप्त थी।
  • फैमिली कोर्ट का अजीबोगरीब तर्क: फैमिली कोर्ट ने माना था कि पति ने पत्नी को मुंबई न ले जाकर गलती की, क्योंकि “यौन इच्छाओं पर काबू पाना अत्यधिक अव्यावहारिक है और पत्नी को साथ रखना पति का परम कर्तव्य है।” अतः पति अपनी ही गलती का लाभ उठा रहा है और तलाक का हकदार नहीं है।

हाईकोर्ट द्वारा तलाक मंजूर करने के मुख्य विधिक आधार

  1. व्यभिचार साबित नहीं (कथित प्रेमी को पक्षकार न बनाना घातक): हाईकोर्ट ने पति के व्यभिचार के आरोप को भी स्वीकार नहीं किया, क्योंकि उसने कथित प्रेमी को मामले में पक्षकार (Party/Respondent) नहीं बनाया था, जो मद्रास हाईकोर्ट के स्थापित नियमों के तहत अनिवार्य है।
  2. रिश्ते का पूरी तरह टूट जाना (Irretrievable Breakdown): अदालत ने पाया कि 16 वर्षों के लंबे अलगाव के दौरान पत्नी ने भी साथ रहने के लिए कोई औपचारिक पत्राचार या नोटिस जैसी पहल नहीं की।
  3. लंबे अलगाव को मानसिक क्रूरता माना: सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले (राकेश रमन बनाम कविता) का हवाला देते हुए पीठ ने तय किया कि इतने लंबे समय तक सहवास का अभाव, अलगाव और वैवाहिक संबंधों का पूरी तरह बिखर जाना हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत ‘क्रूरता’ (Cruelty) के दायरे में आता है।

अंतिम आदेश

मद्रास उच्च न्यायालय ने फैमिली कोर्ट के फैसले को दरकिनार करते हुए विवाह विच्छेद की डिक्री पारित की और 67 वर्षीय पति की तलाक याचिका को मंजूरी दे दी।

Divorce Case:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतमद्रास उच्च न्यायालय (मदुरै पीठ)
खंडपीठन्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन एवं न्यायमूर्ति एम.डी. सुमति
मूल शादी का वर्षसितंबर 1992 (4 बच्चे; 16 वर्षों से दोनों अलग रह रहे थे)
कानूनी आधारहिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) – मानसिक क्रूरता और अपूरणीय वैवाहिक अलगाव
मुख्य फैसलाफैमिली कोर्ट का आदेश रद्द; लंबे अलगाव और क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद (तलाक) मंजूर।
RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
few clouds
29 ° C
29 °
29 °
89 %
0kmh
17 %
Mon
29 °
Tue
33 °
Wed
33 °
Thu
33 °
Fri
33 °

Recent Comments