NCLAT के मुख्य कानूनी निष्कर्ष
- IBC की धारा 60(2) का महत्व: NCLAT ने जोर देकर कहा कि IBC की धारा 60(2) के अनुसार, किसी पर्सनल गारंटर के खिलाफ दिवाला कार्यवाही उसी NCLT पीठ के समक्ष चलनी चाहिए जहां मुख्य कॉर्पोरेट देनदार (कंपनी) की CIRP या लिक्विडेशन प्रक्रिया लंबित है। इसका मुख्य उद्देश्य एक ही मामले से जुड़ी सभी कार्यवाहियों को एक जगह समेकित (Consolidate) करना और विरोधाभासी फैसलों से बचना है।
- NCLT नई दिल्ली का अधिकार क्षेत्र नहीं: अधिकरण ने माना कि NCLT नई दिल्ली के पास सिंगला के खिलाफ धारा 95 की कार्यवाही जारी रखने का कोई प्रादेशिक या अंतर्निहित क्षेत्राधिकार नहीं था। इस याचिका को शुरुआत में ही खारिज कर दिया जाना चाहिए था और क्रेडिटर को चंडीगढ़ पीठ जाने को कहा जाना चाहिए था।
- NCLT अध्यक्ष का आदेश रद्द: NCLAT ने NCLT अध्यक्ष के दिसंबर 2025 के आदेश को रद्द कर दिया और NCLT नई दिल्ली में लंबित कार्यवाही को समाप्त कर दिया। क्रेडिटर को उचित क्षेत्राधिकार वाली NCLT (चंडीगढ़) में नए सिरे से मामला दायर करने की छूट दी गई।
नई दिल्ली: राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण (NCLAT) की प्रधान पीठ ने दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC) के तहत एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत तय करते हुए फैसला सुनाया है कि नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के प्रेसिडेंट के पास मामलों को अंतर-क्षेत्रीय स्तर पर (Across Benches in Different States/Locations) ट्रांसफर करने का पूर्ण अधिकार है।
न्यायिक सदस्य न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा तथा तकनीकी सदस्य अरुण बारोका और इंदीवर पांडे की तीन सदस्यीय पीठ ने NCLT प्रेसिडेंट के दिसंबर 2025 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें गुजरात हाईकोर्ट के एक पूर्व फैसले का हवाला देते हुए दिल्ली से चंडीगढ़ बेंच में केस ट्रांसफर करने की अर्जी खारिज कर दी गई थी। अपीलीय अधिकरण ने स्पष्ट किया कि NCLT अध्यक्ष की केस ट्रांसफर करने की प्रशासनिक व वैधानिक शक्तियां किसी एक क्षेत्रीय सीमा या भौगोलिक परिधि तक सीमित नहीं हैं [कमलेश बनाम प्रवीण]।
NCLAT की प्रमुख विधिक व्याख्या
1. प्रेसिडेंट के ट्रांसफर अधिकार क्षेत्र पर कोई भौगोलिक पाबंदी नहीं NCLT रूल्स के नियम 16(d) और IBC के प्रावधानों का विश्लेषण करते हुए अपीलीय अधिकरण ने कहा: “NCLT के प्रेसिडेंट की शक्तियां किसी विशेष क्षेत्रीय स्थान (Territorial Location) से प्रतिबंधित या बंधी हुई नहीं हैं। नियम 16(d) को IBC की धारा 60(2) और NCLT रूल्स के नियम 2(7) के साथ पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि अध्यक्ष के पास मामलों को एक बेंच से दूसरी बेंच (भले ही वे अलग-अलग राज्यों/क्षेत्राधिकार में हों) में ट्रांसफर करने का पर्याप्त अधिकार है। इस शक्ति को केवल एक ही क्षेत्रीय सीमा के भीतर सीमित करने से गंभीर ‘विसंगतिपूर्ण स्थितियां’ (Anomalous Situations) पैदा होंगी।”
2. धारा 60(2) IBC: पर्सनल गारंटर और कॉर्पोरेट देनदार की सुनवाई एक ही जगह अनिवार्य अपीलीय अधिकरण ने IBC की धारा 60(2) के मूल विधायी उद्देश्य को रेखांकित किया:
- यदि किसी कॉर्पोरेट देनदार (Corporate Debtor) की कॉर्पोरेट इंसॉल्वेंसी रेजोल्यूशन प्रोसेस (CIRP) या परिसमापन (Liquidation) किसी एक NCLT बेंच के समक्ष लंबित है, तो उसके पर्सनल गारंटर (Personal Guarantor) के खिलाफ धारा 95 के तहत दिवाला कार्यवाही भी अनिवार्य रूप से उसी NCLT बेंच के समक्ष चलनी चाहिए।
- इस प्रावधान का उद्देश्य कार्यवाहियों का एकीकरण (Consolidation) करना और दो अलग-अलग बेंचों द्वारा परस्पर विरोधी फैसले (Conflicting Decisions) आने के जोखिम को रोकना है।
3. गुजरात हाईकोर्ट के ‘आर्सेलर मित्तल’ फैसले से असहमति
- NCLT प्रेसिडेंट ने गुजरात हाईकोर्ट के आर्सेलर मित्तल निप्पॉन स्टील इंडिया लिमिटेड बनाम NCLT (अक्टूबर 2025) के उस फैसले पर भरोसा किया था, जिसमें कहा गया था कि नियम 16(d) प्रेसिडेंट को क्षेत्रीय सीमाओं से बाहर केस ट्रांसफर करने का अधिकार नहीं देता।
- NCLAT ने इस व्याख्या से असहमति जताई और स्पष्ट किया कि IBC की विशेष योजनाओं और धारा 60(2) के अनिवार्य अधिदेश के तहत प्रेसिडेंट को अंतर-राज्यीय ट्रांसफर का पूरा अधिकार है। (उल्लेखनीय है कि गुजरात हाईकोर्ट का उक्त फैसला वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचाराधीन है)।
मामले की पृष्ठभूमि (लक्ष्मी पाइप्स लिमिटेड विवाद)
- कॉर्पोरेट देनदार और पर्सनल गारंटर: लक्ष्मी पाइप्स लिमिटेड (Laxmi Pipes Ltd) की सीआईआरपी (CIRP) कार्यवाही पहले से ही NCLT चंडीगढ़ के समक्ष लंबित थी।
- दिल्ली बेंच में अलग अर्जी: कंपनी की निलंबित निदेशक और पर्सनल गारंटर कमलेश रानी सिंगला के खिलाफ ऋणदाता (Creditor) ने IBC की धारा 95 के तहत दिवाला कार्यवाही NCLT नई दिल्ली में शुरू कर दी।
- ट्रांसफर अर्जी खारिज होना: सिंगला ने दिल्ली की कार्यवाही को चंडीगढ़ ट्रांसफर करने के लिए NCLT प्रेसिडेंट के समक्ष याचिका लगाई थी, जिसे दिसंबर 2025 में खारिज कर दिया गया था। इसके खिलाफ NCLAT में अपील दायर की गई।
NCLAT का अंतिम आदेश
- प्रेसिडेंट का आदेश रद्द: NCLT प्रेसिडेंट द्वारा ट्रांसफर याचिका खारिज करने का आदेश निरस्त किया गया।
- दिल्ली बेंच की कार्यवाही निरस्त: NCLAT ने फैसला सुनाया कि NCLT नई दिल्ली के पास सिंगला के खिलाफ धारा 95 की कार्यवाही जारी रखने का न तो क्षेत्रीय और न ही अंतर्निहित (Inherent) क्षेत्राधिकार था। दिल्ली बेंच में लंबित कार्यवाही को रद्द (Quash) कर दिया गया।
- चंडीगढ़ जाने की छूट: ऋणदाता को उचित क्षेत्राधिकार वाली बेंच (NCLT चंडीगढ़) के समक्ष नए सिरे से कार्यवाही शुरू करने की स्वतंत्रता दी गई।
विधिक प्रतिनिधित्व
- अपीलकर्ता (कमलेश रानी सिंगला) की ओर से: अधिवक्ता पंकज गर्ग और यक्ष गर्ग।
- रेजोल्यूशन प्रोफेशनल (गौतम सिंघल) की ओर से: अधिवक्ता रजत चौधरी।
- पीठ: न्यायमूर्ति शरद कुमार शर्मा (न्यायिक सदस्य), अरुण बारोका (तकनीकी सदस्य) और इंदीवर पांडे (तकनीकी सदस्य)।
Territorial Limits:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| अपीलीय अधिकरण | राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण (NCLAT) |
| पीठ | जस्टिस शरद कुमार शर्मा, अरुण बरोका, इंदेवर पांडे |
| मुख्य पक्षकार | कमलेश रानी सिंगला बनाम प्रवीण |
| संबंधित कानून | इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) की धारा 60(2) और NCLT नियम 16(d) |
| मुख्य आदेश | NCLT अध्यक्ष अंतर-प्रादेशिक (Inter-territorial) मामलों को ट्रांसफर कर सकते हैं; पर्सनल गारंटर केस संबंधित CIRP पीठ में ही चलेगा। |

