Wednesday, October 28, 2026
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Sharia Courts: शरिया अदालतें केवल धार्मिक राय दे सकती हैं, तलाक का फैसला नहीं; निजी धार्मिक निकायों के आदेश बाध्यकारी नहीं, फैसला किया शून्य

हाईकोर्ट का मुख्य कानूनी निष्कर्ष

  • दारुल कज़ा कानूनी अदालत नहीं:हाईकोर्ट ने माना कि दारुल कज़ा (Darul Qaza) जैसी संस्थाएं केवल फतवा या धार्मिक राय (Religious Opinions) जारी कर सकती हैं। वे कानून द्वारा गठित अदालतें नहीं हैं।
  • नागरिक/वैवाहिक अधिकारों पर बाध्यकारी नहीं:कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा:“ऐसी निजी संस्थाएं धार्मिक दृष्टिकोण या राय व्यक्त कर सकती हैं, लेकिन उनकी राय किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकारों, वैवाहिक स्थिति या दायित्वों को बाध्यकारी रूप से समाप्त या परिवर्तित नहीं कर सकती।”
  • केवल न्यायिक प्रक्रिया से ही संभव:अदालत ने स्पष्ट किया कि तलाक या वैवाहिक स्थिति का कानूनी निर्धारण केवल देश की सक्षम न्यायिक (Judicial) या विधायी (Legislative) प्रक्रिया के जरिए ही हो सकता है।

बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने शरिया अदालतों और निजी धार्मिक संस्थाओं के विधिक दर्जे और अधिकार क्षेत्र को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है।

न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने रायपुर की एक शरिया अदालत (इदारा-ए-शरिया) द्वारा महिला को उसके पति से तलाकशुदा घोषित करने वाले 18 जनवरी 2022 के आदेश को पूरी तरह शून्य और निष्प्रभावी (Void and Inoperative) घोषित कर दिया [निरोश अब्बासी बनाम भारत संघ एवं अन्य]। अदालत ने स्पष्ट किया है कि शरिया अदालत के रूप में काम करने वाली निजी संस्थाओं या ‘दारुल कज़ा’ (Darul Qaza) को किसी सक्षम न्यायालय का दर्जा प्राप्त नहीं है। ऐसी संस्थाएं केवल धार्मिक राय या परामर्श (Religious Opinions) दे सकती हैं, लेकिन वे कानूनी रूप से किसी विवाह को भंग करने या वैवाहिक अधिकारों को तय करने वाला कोई बाध्यकारी आदेश पारित नहीं कर सकतीं।

उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां

1. निजी संस्थाओं को न्यायालय का दर्जा नहीं

शरिया संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र को स्पष्ट करते हुए न्यायमूर्ति प्रसाद ने कहा:

  • ‘दारुल कज़ा’ या इदारा-ए-शरिया जैसी निजी धार्मिक संस्थाएं, जो फतवा या धार्मिक राय जारी करती हैं, वे कानून द्वारा स्थापित अदालतें (Legally Constituted Courts) नहीं हैं।
  • ऐसे निकाय अपनी धार्मिक राय व्यक्त कर सकते हैं, लेकिन उनकी राय या आदेश किसी भी व्यक्ति के कानूनी अधिकारों, वैवाहिक स्थिति (Marital Status) या विधिक दायित्वों को बाध्यकारी रूप से नहीं बदल सकते।

2. केवल सक्षम न्यायिक या विधायी प्रक्रिया से ही तलाक मान्य

अदालत ने रेखांकित किया:

  • विवाह विच्छेद (Divorce) और वैवाहिक अधिकारों का विधिक निर्धारण केवल भारत के संविधान और कानूनों के तहत स्थापित सक्षम अदालतों (जैसे पारिवारिक न्यायालय/Family Courts) या संसद द्वारा पारित विधायी प्रक्रिया के माध्यम से ही किया जा सकता है।
  • कोई भी निजी या स्वयंभू (Self-styled) निकाय राज्य के न्यायिक अधिकारों का अतिक्रमण नहीं कर सकता।

मामले की पृष्ठभूमि और विवाद (2020-2022)

  • विवाह और विवाद: 38 वर्षीय याचिकाकर्ता निरोश अब्बासी के पहले पति का 2015 में निधन हो गया था। इसके बाद उन्होंने मोहम्मद आबिद खान से विवाह किया। याचिकाकर्ता के पहले विवाह से बच्चे थे। बाद में बच्चों के नए परिवार में तालमेल न बैठ पाने को लेकर दंपति के बीच विवाद उत्पन्न हो गया।
  • ट्रिपल तलाक और उत्पीड़न का आरोप: पति ने कथित तौर पर 31 अगस्त, 30 सितंबर और 30 अक्टूबर 2021 को नोटिस भेजकर तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) देने का दावा किया। वहीं, महिला ने पति और ससुराल वालों पर प्रताड़ना, क्रूरता और दुर्व्यवहार का आरोप लगाते हुए एसपी से शिकायत की, जिसके बाद महिला थाने में आईपीसी की धारा 498-A और 34 के तहत प्राथमिकी (FIR No. 118/2021) दर्ज की गई।
  • शरिया अदालत का विवादित आदेश (18 जनवरी 2022): मामले में एफआईआर और वैधानिक कार्यवाहियों के लंबित रहने के दौरान, रायपुर स्थित ‘इदारा-ए-शरिया इस्लामी अदालत’ ने 18 जनवरी 2022 को एक आदेश जारी कर घोषित कर दिया कि महिला को तीन तलाक के माध्यम से तलाक दिया जा चुका है। इस आदेश के खिलाफ महिला ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की।

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हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय

  1. शरिया कोर्ट का आदेश निरस्त: हाईकोर्ट ने रायपुर की शरिया अदालत द्वारा पारित 18 जनवरी 2022 के तलाक के आदेश को कानूनन शून्य (Void) घोषित करते हुए पूरी तरह खारिज कर दिया।
  2. संवैधानिक वैधता पर विचार सीमित: अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने मामले में तलाक की संवैधानिक वैधता पर फैसला देने के बजाय अपना निर्णय निजी धार्मिक संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र तक सीमित रखा है। अदालत ने साफ किया कि वैवाहिक स्थिति का कोई भी कानूनी निर्धारण केवल स्थापित अदालतों के माध्यम से ही प्रभावी होगा।

Sharia Courts: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतछत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय (Chhattisgarh High Court)
पीठासीन न्यायाधीशन्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद (Justice Amitendra Kishore Prasad)
याचिकाकर्तानिरोश अब्बासी (Nirosh Abbasi)
मुख्य मुद्दारायपुर शरीयत अदालत द्वारा जारी तलाक के आदेश की कानूनी वैधता
हाईकोर्ट का निर्णयशरीयत अदालत का तलाक का आदेश अमान्य व शून्य; केवल सक्षम न्यायिक/विधायी प्रक्रिया से ही तलाक वैध।
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