Thursday, September 10, 2026
HomeLaworder HindiCaste Certificate Act: महाराष्ट्र जाति प्रमाणपत्र अधिनियम संशोधनों को चुनौती; राज्य के...

Caste Certificate Act: महाराष्ट्र जाति प्रमाणपत्र अधिनियम संशोधनों को चुनौती; राज्य के महाधिवक्ता से मांगी मदद, याचिका की अहम बातें जानिए

संशोधन अधिनियम में किए गए मुख्य बदलाव और विवाद

  1. ‘फर्जी’ और ‘झूठे’ प्रमाणपत्रों का एकीकरण: संशोधन के जरिए ‘फेक’ (Fake) और ‘फॉल्स’ (False) जाति प्रमाणपत्रों की वैधानिक परिभाषाएं शामिल की गई हैं। याचिका का तर्क है कि यदि कोई वास्तविक दावेदार सबूत का बोझ साबित करने में विफल रहता है, तो उसे भी धोखाधड़ी/जालसाजी करने वाले व्यक्ति के समान अपराधी मान लिया जाएगा।
  2. बिना समय सीमा के स्वतः संज्ञान (Suo Motu Review): संशोधित कानून के तहत जांच समितियों (Scrutiny Committees) को बिना किसी समय-सीमा (Limitation Period) के प्रमाणपत्रों की वैधता की समीक्षा करने और उन्हें रद्द करने की असीमित शक्तियां दी गई हैं।
  3. गैर-न्यायिक अधिकारियों को अपीलीय अधिकार: संशोधन में राजस्व विभाग के कार्यकारी अधिकारियों (Executive Revenue Officers) को अपीलीय प्राधिकरण (Appellate Authority) बनाया गया है। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया है कि न्यायिक प्रशिक्षण के बिना ये अधिकारी निष्पक्ष फैसला नहीं कर सकते, जिससे यह प्रक्रिया “Caesar to Caesar” (स्वयं की ही अपील स्वयं सुनना) बनकर रह जाएगी।
  4. तत्काल FIR और लाभ वापसी: संशोधन के तहत जांच समिति के आदेश के बाद अनिवार्य रूप से FIR दर्ज कराने और आरक्षण के लाभों को तुरंत वापस लेने का प्रावधान किया गया है।

नागपुर: बॉम्बे हाईकोर्ट (नागपुर पीठ) ने ‘महाराष्ट्र जाति प्रमाण पत्र (सत्यापन एवं विनियमन) अधिनियम, 2000’ में हाल ही में किए गए विवादास्पद संशोधनों को चुनौती देने वाली याचिका पर संज्ञान लेते हुए महाराष्ट्र के महाधिवक्ता (Advocate General) से विधिक सहायता मांगी है [हलबी आदिम जमात मंडल, यवतमाल बनाम महाराष्ट्र राज्य एवं अन्य]।

न्यायमूर्ति अनिल किल्लोर और न्यायमूर्ति रजनीश व्यास की खंडपीठ ने यवतमाल स्थित एक पब्लिक ट्रस्ट द्वारा जुलाई 2026 के संशोधन अधिनियम और 10 अगस्त 2026 की आधिकारिक अधिसूचना के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया।

नए संशोधनों में क्या प्रावधान किए गए हैं?

महाराष्ट्र सरकार द्वारा लाए गए हालिया संशोधनों के तहत कानून में कई कड़े और नए प्रावधान जोड़े गए हैं-

  • ‘फर्जी’ और ‘झूठे’ प्रमाण पत्रों की नई परिभाषाएं: अधिनियम में ‘Fake’ और ‘False’ जाति व वैधता प्रमाण पत्रों की वैधानिक परिभाषाएं तय की गई हैं।
  • असीमित स्वतः संज्ञान समीक्षा शक्तियां (Suo Motu Powers): जाति जांच समितियों (Scrutiny Committees) को बिना किसी समयसीमा (No Period of Limitation) के कभी भी पुराने वैधता प्रमाण पत्रों की स्वतः संज्ञान लेकर समीक्षा और उन्हें रद्द करने का असीमित अधिकार दिया गया है।
  • अनिवार्य प्राथमिकी (Compulsory FIR): प्रमाण पत्र खारिज होते ही अनिवार्य रूप से आपराधिक प्राथमिकी दर्ज करने और आरक्षण लाभों को तत्काल वापस लेने का प्रावधान।
  • विभागीय अपीलीय प्राधिकरण: कार्यकारी राजस्व अधिकारियों (Executive Revenue Officers) को अपीलीय प्राधिकरण (Appellate Authority) के रूप में नामित किया गया है।

याचिका में उठाए गए मुख्य विधिक व संवैधानिक तर्क

1. वास्तविक दावेदारों को जालसाजों के समकक्ष रखना अधिवक्ता अश्विन देशपांडे के माध्यम से दायर याचिका में तर्क दिया गया है कि ‘फर्जी’ (मनगढ़ंत) और ‘झूठे’ (दस्तावेजी सबूत न दे पाने वाले) प्रमाण पत्रों को मनमाने ढंग से एक ही श्रेणी में जोड़ दिया गया है:

  • यदि कोई वास्तविक और निर्दोष दावेदार पुराने दस्तावेजी साक्ष्य (Burden of Proof) जुटाने में विफल रहता है, तो उसे भी सीधे धोखाधड़ी करने वाले जालसाज के बराबर मानकर आपराधिक कार्रवाई का भागीदार बना दिया जाएगा।
  • याचिका में कहा गया:

“इस संशोधन का उद्देश्य न केवल वैधता प्रमाण पत्र प्राप्त करने की वास्तविक प्रक्रिया को हतोत्साहित और विफल करना है, बल्कि यह पूरी प्रक्रिया शुरू करने पर ही एक खतरा पैदा करता है। यह संशोधन अप्रत्यक्ष रूप से वैध आरक्षण दावों को समाप्त करने के उद्देश्य से लाया गया है।”

2. बिना समयसीमा के स्वतः संज्ञान शक्तियां लोक नीति के विरुद्ध याचिका में दलील दी गई है कि जांच समितियों को बिना किसी सीमा अवधि के वैधता प्रमाण पत्रों को कभी भी रद्द करने का बेलगाम अधिकार देना लोक नीति (Public Policy) और विधि के शासन के सिद्धांतों के पूरी तरह प्रतिकूल है, जिससे दशकों से सुरक्षित अधिकारों पर अनिश्चितता की तलवार लटक जाएगी।

3. ‘सीजर से सीजर को अपील’ (Appeal from Caesar to Caesar): संरचनात्मक पूर्वाग्रह कार्यकारी राजस्व अधिकारियों को अपीलीय मंच बनाए जाने को चुनौती देते हुए याचिका में कहा गया:

  • राजस्व अधिकारियों के पास न्यायिक प्रशिक्षण और स्वतंत्रता का अभाव होता है, जिससे संरचनात्मक पूर्वाग्रह (Structural Bias) उत्पन्न होगा।
  • याचिका के अनुसार, “यह उपाय न्याय की अवधारणा को खत्म कर केवल ‘सीजर से सीजर को अपील’ बनाकर रख देता है, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और संविधान के बुनियादी ढांचे का घोर उल्लंघन है।”

Also Read; Priest Income: वंशानुगत पुजारी को दी गई दक्षिणा उसकी व्यक्तिगत आय है, संयुक्त परिवार की संपत्ति नहीं; उससे खरीदी गई संपत्ति का बंटवारा नहीं हो सकता

मामले में प्रतिवादी

याचिका में महाराष्ट्र सरकार को उसके निम्नलिखित प्रमुख विभागों के सचिवों के माध्यम से प्रतिवादी बनाया गया है:

  1. विधि एवं न्याय विभाग (Law and Judiciary)
  2. जनजातीय विकास विभाग (Tribal Development)
  3. सामाजिक न्याय विभाग (Social Justice)
  4. अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) कल्याण विभाग

उच्च न्यायालय का रुख

नागपुर खंडपीठ ने अधिनियम में हुए संशोधनों के दूरगामी विधिक प्रभावों और संवैधानिक प्रश्नों की गंभीरता को देखते हुए राज्य के महाधिवक्ता को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर अदालत का सहयोग करने का निर्देश दिया है।

विधिक प्रतिनिधित्व

  • याचिकाकर्ता (हलबी आदिम जमात मंडल) की ओर से: अधिवक्ता अश्विन देशपांडे।
  • महाराष्ट्र राज्य की ओर से: अतिरिक्त सरकारी वकील (AGP) पीयूष पेंडके।
  • पीठ: न्यायमूर्ति अनिल किल्लोर और न्यायमूर्ति रजनीश व्यास।

Caste Certificate Act:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतबॉम्बे उच्च न्यायालय, नागपुर पीठ (Bombay High Court)
पीठासीन पीठजस्टिस अनिल किलोर और जस्टिस रजनीश व्यास
याचिकाकर्ताहल्दी आदिम जमात मंडल, यवतमाल
चुनौतीजुलाई 2026 का संशोधन अधिनियम और 10 अगस्त 2026 की अधिसूचना
मुख्य कानूनी मुद्दासबूत न दे पाने और धोखाधड़ी को एक समान मानना, स्वतः संज्ञान (Suo Motu) समीक्षा और गैर-न्यायिक अपीलीय प्राधिकारी का गठन।
RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
light rain
29 ° C
29 °
29 °
84 %
2.6kmh
98 %
Wed
30 °
Thu
35 °
Fri
33 °
Sat
34 °
Sun
34 °

Recent Comments