हाईकोर्ट का विश्लेषण और मुख्य टिप्पणियां
- ट्रायल कोर्ट ‘सुपर-स्पेशलिस्ट’ की तरह काम न करे: हाईकोर्ट ने निचली अदालत द्वारा डॉक्टरों की विशेषज्ञ सलाह को दरकिनार करने पर कड़ी आपत्ति जताई:“जब जांच करने वाले डॉक्टर और रेडियोलॉजिस्ट ने पीड़िता की उम्र लगभग 18 वर्ष बताई थी, तो ट्रायल कोर्ट को सुपर-स्पेशलिस्ट की तरह व्यवहार नहीं करना चाहिए था और डॉक्टर व रेडियोलॉजिस्ट की राय पर अपनी विशेषज्ञ राय थोपने से बचना चाहिए था।” — न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी
- दांत और प्यूबिक हेयर के मेडिकल मानक: अदालत ने स्पष्ट किया कि अक्ल दाढ़ का 18 वर्ष तक न निकलना एक सामान्य बात है और केवल इसके आधार पर किसी को नाबालिग नहीं माना जा सकता।
- उम्र में 2 साल का मार्जिन (Radiological Margin of Error): सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक मामलों (Jaya Mala v. Govt of J&K) का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने दोहराया कि रेडियोलॉजिकल जांच से तय की गई उम्र में 2 साल का अंतर (+/- 2 Years) दोनों तरफ मान्य होता है। यदि डॉक्टर ने उम्र 18 वर्ष बताई है, तो इस मार्जिन के तहत घटना के समय लड़की की उम्र 20 वर्ष भी हो सकती है।
- कक्षा 8 की विवादित मार्कशीट खारिज: ट्रायल कोर्ट ने लड़की की जन्मतिथि साबित करने के लिए कक्षा 8 की जिस मार्कशीट पर भरोसा किया था, वह कोर्ट रिकॉर्ड के इंडेक्स या सबूतों में मौजूद ही नहीं थी और न ही स्कूल के प्रधानाचार्य द्वारा साबित की गई थी।
- सहमति से साथ जाना और बयानों में विरोधाभास: लड़की ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 161 और 164 के बयानों में स्वीकार किया था कि वह अपनी मर्जी से आरोपी के साथ लुधियाना गई, वहां दोनों ने शादी की और 7 महीने तक पति-पत्नी की तरह रहे। ट्रायल कोर्ट में उसने बेहोश करके ले जाने का नया आरोप लगाया, जिसे हाईकोर्ट ने अविश्वसनीय माना।
प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आयु निर्धारण (Age Determination) और चिकित्सकीय साक्ष्यों के मूल्यांकन पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक व फॉरेंसिक व्यवस्था दी है।
न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की एकल पीठ ने 31 अगस्त 2026 के अपने फैसले में ट्रायल कोर्ट द्वारा वर्ष 2013 में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 366 के तहत सुनाई गई 7 साल के कठोर कारावास और ₹10,000 के जुर्माने की सजा को निरस्त करते हुए अपीलकर्ता को सभी आरोपों से पूरी तरह बरी कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि विस्डम टूथ (अक्ल दाढ़ / Third Molar) का न निकलना या कांख व प्यूबिक हेयर (Axillary & Pubic Hair) की मौजूदगी किसी लड़की के अवयस्क (नाबालिग) होने का निर्णायक या अकाट्य प्रमाण नहीं हो सकती। अदालत ने कहा कि जब रेडियोलॉजिस्ट और डॉक्टरों ने लड़की की उम्र लगभग 18 वर्ष आंकी थी, तो दो वर्ष के अनुमेय मार्जिन (Two-Year Margin of Error) के तहत उसे बालिग (20 वर्ष तक) माना जा सकता है [भैया लाल रैदास बनाम उत्तर प्रदेश राज्य]।
उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक व फॉरेंसिक टिप्पणियां
1. दांत और शारीरिक विकास से उम्र तय करने का तर्क खारिज ट्रायल कोर्ट द्वारा लड़की के 14×14 दांत होने और प्यूबिक हेयर के आधार पर उसे 14 से 17 वर्ष का मानने के दृष्टिकोण को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा: “मेडिको-लीगल रिपोर्ट में जब तक स्पष्ट न लिखा हो, तब तक केवल कांख या प्यूबिक हेयर की मौजूदगी से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वे पूरी तरह विकसित नहीं थे। इसी प्रकार, अक्ल दाढ़ (Third Molars) का निकलना अनिवार्य नहीं होता और तीसरे दाढ़ की अनुपस्थिति को यह मानने का आधार नहीं बनाया जा सकता कि व्यक्ति ने 18 वर्ष की आयु प्राप्त नहीं की है।”
2. ट्रायल कोर्ट ‘सुपर-स्पेशलिस्ट’ नहीं बन सकती ट्रायल जज द्वारा मेडिकल विशेषज्ञों की राय को दरकिनार करने पर कड़ी आपत्ति जताते हुए अदालत ने टिप्पणी की: “जब पीड़िता की जांच करने वाले डॉक्टर और रेडियोलॉजिस्ट ने उसकी उम्र लगभग 18 वर्ष बताई थी, तो ट्रायल कोर्ट को ‘सुपर-स्पेशलिस्ट’ (Super-Specialist) के रूप में कार्य नहीं करना चाहिए था कि वह डॉक्टर और रेडियोलॉजिस्ट की विशेषज्ञ राय के ऊपर अपना अलग अनुमान थोप दे।”
3. रेडियोलॉजिकल जांच में 2 वर्ष का मार्जिन (जया माला केस का संदर्भ) सुप्रीम कोर्ट के नजीर फैसलों—जया माला बनाम जम्मू-कश्मीर सरकार, ज्योति प्रकाश राय बनाम बिहार राज्य और रजक मोहम्मद बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य—का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने रेखांकित किया:
- न्यायिक रूप से यह स्थापित सिद्धांत है कि रेडियोलॉजिकल/ऑसिफिकेशन टेस्ट (X-Ray Ossification) द्वारा निर्धारित उम्र में दोनों तरफ दो वर्ष का अंतर (Margin of error of 2 years) माना जाता है।
- यदि चिकित्सीय रिपोर्ट में उम्र 18 वर्ष बताई गई थी, तो इस मार्जिन के तहत घटना की तारीख पर पीड़िता की उम्र 20 वर्ष तक हो सकती है। अभियोजन यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि वह नाबालिग थी।
ट्रायल कोर्ट की प्रक्रियात्मक खामियां (लापता 8वीं की मार्कशीट)
- रिकॉर्ड से गायब दस्तावेज: ट्रायल कोर्ट ने लड़की की जन्मतिथि 25 सितंबर 1993 साबित करने के लिए कक्षा 8 की जिस मार्कशीट पर भरोसा किया था, वह ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड/इंडेक्स में मौजूद ही नहीं थी और न ही उस पर कोई प्रदर्श (Exhibit Number) अंकित था।
- दस्तावेज साबित नहीं हुआ: मार्कशीट को स्कूल के प्रधानाध्यापक या किसी अधिकृत अधिकारी द्वारा कोर्ट में साबित नहीं कराया गया था। अदालत ने कहा कि जो दस्तावेज रिकॉर्ड का हिस्सा ही नहीं है, उसके आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
बयानों में विरोधाभास और ‘स्टर्लिंग विटनेस’ (Sterling Witness) का अभाव
- धारा 161 और 164 CrPC के बयान: पुलिस और मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज बयानों में लड़की ने स्पष्ट कहा था कि वह अपनी मर्जी से रैदास के साथ गई थी, दोनों शादी करना चाहते थे लेकिन पिता विरोध कर रहे थे। वे पहले लुधियाना गए, फिर हरदोई आकर शादी की और 7 महीने तक पति-पत्नी की तरह रहे। वह गर्भवती थी और अपने माता-पिता के पास लौटने के बजाय पति के साथ रहना चाहती थी।
- ट्रायल में नया मोड़: ट्रायल के दौरान उसने आरोप लगाया कि आरोपी ने उसे कुछ सुंघाकर बेहोश कर दिया था।
- हाईकोर्ट का रुख: अदालत ने कहा कि एक बालिग महिला को उन्नाव से लुधियाना तक अकेले बेहोशी की हालत में ले जाना व्यावहारिक रूप से असंभव है और 7 महीने तक उसने कोई विरोध नहीं किया। सुप्रीम कोर्ट के ‘स्टर्लिंग विटनेस’ के सिद्धांत के अनुसार पीड़िता की गवाही शुरू से अंत तक सुसंगत और संदेह से परे नहीं थी।
मामले की पृष्ठभूमि (2011 का उन्नाव मामला)
- घटना: जनवरी 2011 में उन्नाव जिले के आसीवन थाने में लड़की के पिता की शिकायत पर एफआईआर दर्ज हुई थी, जिसमें पड़ोसी भैया लाल रैदास पर नाबालिग बेटी को बहला-फुसलाकर ले जाने का आरोप लगाया गया था।
- मेडिकल रिपोर्ट (मई 2011): चिकित्सीय जांच में कोई चोट नहीं पाई गई, अल्ट्रासाउंड में 20 सप्ताह का गर्भ पाया गया और घुटने, कोहनी व कलाई के जोड़ों के फ्यूजन (Ossification) के आधार पर उम्र 18 वर्ष आंकी गई थी।
- ट्रायल कोर्ट का 2013 का निर्णय: ट्रायल कोर्ट ने बलात्कार (376 IPC) और अपहरण (363 IPC) से बरी कर दिया था, लेकिन शादी के लिए विवश करने (366 IPC) में 7 साल की सजा सुनाई थी, जिसे अब हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया है।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
- दोषसिद्धि रद्द व बरी: अपील स्वीकार करते हुए 8 फरवरी 2013 का दोषसिद्धि आदेश रद्द किया गया और भैया लाल रैदास को IPC की धारा 366 के आरोप से बरी किया गया।
- धारा 437-A CrPC की औपचारिकता: अपीलार्थी को धारा 437-A CrPC के तहत व्यक्तिगत मुचलका भरने का निर्देश दिया गया ताकि भविष्य में सुप्रीम कोर्ट में अपील होने पर उपस्थिति सुनिश्चित की जा सके।
विधिक विवरण
- केस शीर्षक: भैया लाल रैदास बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (Criminal Appeal)
- प्रासंगिक कानून: भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 363, 366, 376; दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 161, 164, 437-A
- पीठ: न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी (इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ खंडपीठ)
Age Determination: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी |
| मामले का नाम | भैया लाल रैदास बनाम राज्य (Bhaiya Lal Raidas v. State) |
| संबंधित कानून/धारा | IPC की धारा 366 (शादी के लिए मजबूर करने हेतु अपहरण); धारा 363 और 376 में पहले ही बरी |
| अदालत का निर्णय | 2013 की 7 साल की सजा और ₹10,000 जुर्माना रद्द; आरोपी पूरी तरह बरी। |

