मामले की पृष्ठभूमि और प्रमुख विवाद
- 2010 APAR में विरोधाभासी मूल्यांकन:
- रिपोर्टिंग/जिला जज का मूल्यांकन: 2010 की APAR के पार्ट-1 में रिपोर्टिंग ऑफिसर ने अधिकारी को “Good” ग्रेड दिया था। पार्ट-2 में जिला जज ने उनकी ईमानदारी और सत्यनिष्ठा (Integrity) को “उत्कृष्ट/अच्छा” प्रमाणित किया था।
- मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी: तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने उनकी ग्रेडिंग को घटाकर “Average” कर दिया और उनकी सत्यनिष्ठा (Integrity) को “Doubtful” (संदिग्ध) दर्ज कर दिया।
- हाईकोर्ट (न्यायिक पक्ष) द्वारा ‘हेरफेर’ का खुलासा: मई 2026 में राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने अधिकारी की याचिका स्वीकार करते हुए पाया कि:
- ईमानदारी पर प्रतिकूल टिप्पणी के लिए कोई ठोस सामग्री मौजूद नहीं थी।
- दो अलग-अलग मुख्य न्यायाधीशों के कार्यकाल की प्रविष्टियाँ एक ही स्याही और एक ही लिखावट में 2012 में दर्ज की गई थीं, जिससे सर्विस रिकॉर्ड में “गंभीर हेराफेरी” (Serious Manipulation) का संकेत मिलता है।
- हाईकोर्ट ने अधिकारी की 2010 की APAR को “Good” पढ़ने और सभी परिणामी लाभ (Consequential Benefits) देने का आदेश दिया था।
- सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणियां:
- उच्च मानक की आवश्यकता: सुप्रीम कोर्ट ने पूछा, “क्या जिला न्यायाधीश या प्रशासनिक न्यायाधीश के निष्कर्षों को डाउनग्रेड करने के लिए मुख्य न्यायाधीश को बहुत उच्च मानक प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं होगी?”
- खारिज हो चुके आरोपों का पुनरुत्थान: राजस्थान हाईकोर्ट के प्रशासनिक वकील द्वारा अधिकारी के पुराने रिकॉर्ड (पेट्रोल पंप आवेदन संबंधी आरोप) का हवाला देने पर पीठ ने कहा कि जब वह आरोप पहले ही हटा/खारिज किया जा चुका था, तो प्रशासन उसे दोबारा क्यों उठा रहा है?
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान न्यायिक सेवा के एक अधिकारी की वार्षिक प्रदर्शन मूल्यांकन रिपोर्ट (APAR / ACR) को सीधे निगरानी करने वाले जिला जज और प्रशासनिक जज की सकारात्मक रिपोर्ट के विपरीत जाकर चीफ जस्टिस द्वारा डाउनग्रेड करने के आधार पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने राजस्थान उच्च न्यायालय के प्रशासनिक पक्ष द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई करते हुए यह सख्त रुख अपनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब पर्यवेक्षण करने वाले प्रत्यक्ष जजों ने अधिकारी की ईमानदारी और कार्यप्रणाली को प्रमाणित किया हो, तो किसी मजबूत और ठोस आधार के बिना उसे ‘डाउटफुल’ (Doubtful Integrity) या ‘एवरेज’ करार देना अत्यंत उच्च विधिक मानकों की मांग करता है [राजस्थान उच्च न्यायालय (प्रशासनिक पक्ष) बनाम राकेश गोयल]।
सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख विधिक व प्रक्रियात्मक टिप्पणियां
1. सीधे पर्यवेक्षण करने वाले जजों की राय पलटने पर सवाल खंडपीठ ने राजस्थान हाईकोर्ट की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता से तीखा सवाल पूछा: “क्या जिला जज (District Judge) या प्रशासनिक जज (Administrative Judge) के सकारात्मक निष्कर्षों को डाउनग्रेड करने के लिए बहुत उच्च स्तर के प्रमाण और मजबूत आधार (Much Higher Standard) की आवश्यकता नहीं होगी? क्या हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, जो मूल्यांकन अवधि के दौरान अधिकारी की सीधी निगरानी नहीं कर रहे थे, बिना किसी ठोस सामग्री के जिला जज और अन्य पर्यवेक्षी न्यायाधीशों के विचारों से असहमति जता सकते हैं?”
2. बंद हो चुके आरोपों को फिर से उठाने पर फटकार जब हाईकोर्ट प्रशासन ने न्यायिक अधिकारी द्वारा सेवा में रहते हुए पेट्रोल पंप आवंटन के लिए आवेदन करने से जुड़े पुराने आरोप का हवाला दिया, तो पीठ ने कड़ी आपत्ति जताई: “क्या वह आरोप सच साबित हुआ था? वह आरोप तो पहले ही बंद/निरस्त (Dropped) किया जा चुका है। आपका प्रशासन जिस मामले को खुद खारिज कर चुका है, आप उसी गड़े मुर्दे को दोबारा जिंदा (Resurrecting) करने की कोशिश कर रहे हैं।”
3. मूल रिकॉर्ड तलब करने का निर्देश अदालत ने मामले की तह तक जाने के लिए राजस्थान उच्च न्यायालय प्रशासन को तत्कालीन चीफ जस्टिस द्वारा दर्ज की गई टिप्पणियों और संबंधित मूल्यांकन का मूल रिकॉर्ड (Original Records) अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।
मामले की पृष्ठभूमि (2010 APAR विवाद और ‘गंभीर हेराफेरी’)
- अधिकारी का परिचय: राकेश गोयल वर्ष 2002 में राजस्थान न्यायिक सेवा में सिविल जज (Civil Judge) के रूप में नियुक्त हुए थे।
- 2010 की APAR में विरोधाभास:
- भाग-I: रिपोर्टिंग ऑफिसर ने उन्हें ‘Good’ (अच्छा) ग्रेड दिया था, लेकिन तत्कालीन चीफ जस्टिस ने बाद में इसे घटाकर ‘Average’ (औसत) कर दिया।
- भाग-II: जिला जज ने उनकी सत्यनिष्ठा (Integrity) को पूरी तरह प्रमाणित किया और उनकी ईमानदारी की सामान्य प्रतिष्ठा को ‘अच्छा’ बताया, जबकि चीफ जस्टिस ने उनकी सत्यनिष्ठा को ‘Doubtful’ (संदेहास्पद) दर्ज कर दिया।
- राजस्थान हाईकोर्ट खंडपीठ का मई 2026 का फैसला:
- मई 2026 में राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने न्यायिक पक्ष पर फैसला सुनाते हुए पाया कि अधिकारी के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणी दर्ज करने के लिए रिकॉर्ड पर कोई पुख्ता सामग्री मौजूद नहीं थी।
- हाईकोर्ट ने पाया कि दो अलग-अलग अवधियों में दो अलग-अलग मुख्य न्यायाधीशों के कार्यकाल की प्रविष्टियां वर्ष 2012 में एक ही स्याही और एक ही लिखावट में दर्ज की गई थीं।
- इसे अधिकारी के सेवा रिकॉर्ड में “गंभीर हेरफेर/छेड़छाड़” (Serious Manipulation) करार देते हुए हाईकोर्ट ने 2010 की APAR को ‘Good’ और उनकी निष्ठा को ‘Not Doubtful’ मानते हुए सभी परिणामी सेवा लाभ देने का आदेश दिया था।
- सुप्रीम कोर्ट में चुनौती: राजस्थान हाईकोर्ट के प्रशासनिक पक्ष ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: न्यायिक अधिकारियों के प्रदर्शन मूल्यांकन (APAR/ACR) में निष्पक्षता और प्रक्रियात्मक संतुलन
- याचिकाकर्ता (प्रशासनिक पक्ष) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता वीरेंद्र लोढ़ा
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना
Serious Manipulation:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठासीन पीठ | CJI सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना |
| न्यायिक अधिकारी | राकेश गोयल (2002 में सिविल जज के रूप में नियुक्त) |
| विवादित APAR वर्ष | वर्ष 2010 की वार्षिक प्रदर्शन मूल्यांकन रिपोर्ट (APAR) |
| हाईकोर्ट का फैसला (मई 2026) | अधिकारी के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियां हटाई गईं और ग्रेडिंग “Good” करने के आदेश दिए गए। |
| सुप्रीम कोर्ट का वर्तमान रुख | मूल प्रशासनिक रिकॉर्ड तलब किया; मुख्य न्यायाधीश द्वारा रिपोर्ट बदलने के आधार पर सवाल उठाए। |

