हाईकोर्ट के मुख्य कानूनी निष्कर्ष और टिप्पणियां
- धार्मिक व राजनीतिक स्वार्थ के लिए भीड़ जुटाना: हाईकोर्ट ने माना कि मौलाना तौकीर रज़ा ने बिना आधिकारिक प्रशासनिक अनुमति के अपने राजनीतिक और धार्मिक हितों को साधने के लिए इस्लामिया इंटर कॉलेज मैदान में प्रदर्शन का आह्वान किया था। भले ही वह स्वयं घटनास्थल पर मौजूद नहीं थे, लेकिन भीड़ द्वारा किए गए उपद्रव और सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान के बाद उनके द्वारा भीड़ की सराहना करना और धन्यवाद भाषण देना उनके आचरण को संदिग्ध बनाता है।
- धार्मिक नारों और हिंसक नारों में अंतर: अदालत ने अपर महाधिवक्ता (AAG) अनूप त्रिवेदी की दलीलों से सहमति जताते हुए कहा कि ‘सर तन से जुदा’ नारे को ईश्वर या गुरुओं के प्रति आस्था व्यक्त करने वाले पारंपरिक धार्मिक नारों—जैसे “नारा-ए-तकबीर अल्लाहु-अकबर”, “जो बोले सो निहाल सत श्री अकाल”, “जय श्री राम” या “हर हर महादेव” के समकक्ष नहीं रखा जा सकता।
- BNS की धारा 152 (देश की संप्रभुता को खतरा): पीठ ने रेखांकित किया कि इस तरह के हिंसक नारे लगाना भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152 (सशस्त्र विद्रोह या संप्रभुता व अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्य) के तहत दंडनीय अपराध है, जो इस्लाम के मूल सिद्धांतों के भी खिलाफ है।
प्रयागराज: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सितंबर 2025 में उत्तर प्रदेश के बरेली में हुए दंगों और हिंसा भड़काने के मामले में प्रमुख मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना तौकीर रजा खान की जमानत अर्जी को खारिज कर दिया है।
न्यायमूर्ति आशुतोष श्रीवास्तव की एकल पीठ ने राज्य सरकार की दलीलों से सहमति जताते हुए फैसला सुनाया कि ऐसे भड़काऊ नारों की तुलना ‘नारा-ए-तकबीर’, ‘जय श्री राम’, ‘हर हर महादेव’ या ‘जो बोले सो निहाल सत श्री अकाल’ जैसे धार्मिक श्रद्धा व्यक्त करने वाले पारंपरिक उद्घोषों से नहीं की जा सकती। अदालत ने स्पष्ट किया कि “गुस्ताख-ए-नबी की एक ही सजा, सर तन से जुदा” जैसा नारा कानून के अधिकार, भारत की संप्रभुता व अखंडता के लिए खुली चुनौती है और लोगों को सशस्त्र विद्रोह (Armed Rebellion) के लिए उकसाता है [मौलाना तौकीर रजा खान बनाम उत्तर प्रदेश राज्य]।
उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक व तीखी टिप्पणियां
1. ‘सर तन से जुदा’ नारा कानून के शासन और संप्रभुता के खिलाफ नारे की प्रकृति पर राज्य के अपर महाधिवक्ता (AAG) की दलीलों को स्वीकार करते हुए अदालत ने कहा: “न्यायालय विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता/अपर महाधिवक्ता की इस दलील में पूरा दम पाता है कि ‘गुस्ताख-ए-नबी की एक ही सजा, सर तन से जुदा, सर तन से जुदा’ का नारा कानून के अधिकार (Authority of Law) के साथ-साथ भारत की संप्रभुता और अखंडता के लिए सीधी चुनौती है। यह नारा लोगों को सशस्त्र विद्रोह के लिए उकसाता है, जो कानून के तहत गंभीर दंडनीय अपराध है।”
2. अन्य धार्मिक नारों से तुलना खारिज अदालत ने विभिन्न धार्मिक उद्घोषों के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए रेखांकित किया:
- “नारा-ए-तकबीर, अल्लाहु-अकबर”, “जो बोले सो निहाल सत श्री अकाल”, “जय श्री राम” या “हर हर महादेव” जैसे नारे अपने संबंधित ईश्वर, गुरु या आस्था के प्रति सम्मान और श्रद्धा व्यक्त करने के लिए लगाए जाते हैं।
- ‘सर तन से जुदा’ जैसे हिंसात्मक नारे को किसी भी प्रकार से धार्मिक श्रद्धा वाले उद्घोषों के समकक्ष नहीं रखा जा सकता।
3. बीएनएस की धारा 152 और इस्लाम के मूल सिद्धांतों के विपरीत अदालत ने दिसंबर 2025 में सह-आरोपी की जमानत खारिज करते हुए की गई टिप्पणियों का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि इस तरह के नारे न केवल भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152 (भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्य) के तहत दंडनीय हैं, बल्कि यह कृत्य इस्लाम के मूल सिद्धांतों के भी खिलाफ है।
मामले की पृष्ठभूमि और अभियोजन के आरोप
- सितंबर 2025 का बरेली प्रदर्शन: मौलाना तौकीर रजा ने मुस्लिम युवाओं पर दर्ज कथित झूठे मुकदमों और राज्य सरकार की कथित ज्यादतियों के विरोध में बरेली के इस्लामिया इंटर कॉलेज ग्राउंड में एक बड़े विरोध-प्रदर्शन का आह्वान किया था।
- बिना अनुमति भीड़ जुटाना और हिंसा: प्रशासन द्वारा अनुमति न दिए जाने के बावजूद भारी भीड़ जुटाई गई और मार्च निकाला गया। पुलिस द्वारा रोके जाने पर भीड़ हिंसक हो गई, जिसके बाद पथराव, दंगा और सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान हुआ।
- घटना के बाद की भूमिका: हालांकि मौलाना तौकीर रजा सीधे घटनास्थल पर मौजूद नहीं थे, लेकिन अदालत ने नोट किया कि उन्होंने बाद में भाषण देकर भारी संख्या में जुटने के लिए भीड़ का आभार जताया और उनके कृत्यों की सराहना की, जिसे कतई उचित नहीं ठहराया जा सकता।
- दर्ज प्राथमिकी: पुलिस ने मामले में 25 नामजद और लगभग 1,700 अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
अदालत ने पाया कि आरोपी ने अपने राजनीतिक और धार्मिक हितों को साधने के लिए बिना पूर्व अनुमति के संवेदनशील माहौल में भीड़ इकट्ठा करने का आह्वान किया, जिसके चलते कानून-व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो गई। अपराध की गंभीरता और संप्रभुता को चुनौती देने वाले नारों के इस्तेमाल को देखते हुए जमानत याचिका निरस्त कर दी गई।
विधिक प्रतिनिधित्व
- याचिकाकर्ता (मौलाना तौकीर रजा) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता सतीश त्रिवेदी व अधिवक्ता शेशाद्री त्रिवेदी, वरिष्ठ अधिवक्ता इमरान उल्लाह व अधिवक्ता मोहम्मद इमदाद सिद्दीकी।
- उत्तर प्रदेश राज्य की ओर से: अपर महाधिवक्ता (AAG) अनूप त्रिवेदी, अधिवक्ता नितेश कुमार श्रीवास्तव, पारितोष मालवीय और संजय कुमार सिंह।
Hate Speech: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति आशुतोष श्रीवास्तव |
| केस का नाम | Maulana Tauqeer Raza Khan v. State of UP |
| घटना संदर्भ | सितंबर 2025 में बरेली में हुआ दंगा व सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान |
| मुख्य निर्णय | जमानत अर्जी खारिज; ‘सर तन से जुदा’ नारे को BNS की धारा 152 के तहत राष्ट्रविरोधी कृत्य माना गया। |

