दो जजों की पीठ ने बड़ी पीठ को रेफर क्यों किया?
- कानून की सीधी व्याख्या: पीठ ने नोट किया कि धारा 47-ए केवल यह मांग करती है कि अधिकारी के पास यह विश्वास करने का “कारण” (Reason to Believe) होना चाहिए कि बाजार मूल्य सही नहीं दर्शाया गया है। इस धारा में ‘धोखाधड़ी’ या ‘कपटपूर्ण मंशा’ जैसा कोई शब्द दर्ज नहीं है।
- न्यायिक विधायन (Judicial Legislation): कोर्ट ने कहा कि धारा 47-ए में कपटपूर्ण मंशा की शर्त जोड़ना अदालत द्वारा अपनी सीमा से बाहर जाकर कानून बनाने (Judicial Legislation) जैसा होगा।
- व्यावहारिक कठिनाई: यदि शुरुआती स्तर पर ही अधिकारियों से धोखाधड़ी साबित करने को कहा जाएगा, तो उन मामलों की जांच रुक जाएगी जहां गुप्त रूप से नकद (Cash) लेनदेन किया जाता है। साथ ही, यह मूल्यांकन प्रक्रिया को एक “अर्ध-आपराधिक जांच” (Quasi-criminal Inquiry) में बदल देता है।
नई दिल्ली: भारतीय स्टांप अधिनियम, 1899 की धारा 47-A के तहत स्टांप प्राधिकारियों की शक्तियों और संपत्तियों के कम मूल्यांकन (Undervaluation) की जांच से जुड़े एक अहम कानूनी प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच विचार करेगी।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि न्यायिक अनुशासन (Judicial Discipline) के तहत दो जजों की पीठ तीन जजों के फैसले को सीधे पलट नहीं सकती, इसलिए कानून की सही व्याख्या के लिए बड़ी पीठ का गठन आवश्यक है। शीर्ष अदालत की दो सदस्यीय पीठ ने 3-जजों की बेंच द्वारा दिए गए पुराने फैसले (वी.एन. देवदास बनाम चीफ रेवेन्यू कंट्रोल ऑफिसर) की शुद्धता पर गंभीर संदेह जताते हुए मामले को मुख्य न्यायाधीश (CJI) को संदर्भित (Refer) कर दिया है [BPCL बनाम DRO]।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा उठाए गए मुख्य विधिक बिंदु
1. धारा 47-A में ‘कपटपूर्ण मंशा’ का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं अदालत ने अधिनियम की भाषा पर गौर करते हुए टिप्पणी की:
- भारतीय स्टांप अधिनियम की धारा 47-A को लागू करने के लिए निबंधन प्राधिकारी (Registering Authority) के पास केवल यह “विश्वास करने का कारण” (Reason to believe) होना पर्याप्त है कि संपत्ति का बाजार मूल्य या प्रतिफल (Consideration) सही ढंग से प्रदर्शित नहीं किया गया है।
- धारा 47-A में धोखाधड़ी या स्टांप शुल्क चोरी करने की कपटपूर्ण मंशा (Fraudulent Intent) को पूर्व शर्त (Prerequisite) के रूप में स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया गया है। कानून में इस आवश्यकता को जबरन जोड़ना एक तरह से न्यायिक विधान (Judicial Legislation) करने जैसा हो सकता है।
2. मूल्यांकन को ‘अर्ध-आपराधिक जांच’ में बदलने का खतरा पीठ ने रेखांकित किया:
- यदि धोखाधड़ी की मंशा को अनिवार्य शर्त बना दिया जाए, तो एक सामान्य मूल्यांकन प्रक्रिया एक ‘अर्ध-आपराधिक जांच’ (Quasi-Criminal Enquiry) में बदल सकती है, जहां किसी ईमानदार खरीदार को केवल इसलिए अपने चरित्र का बचाव करना पड़ेगा क्योंकि संपत्ति गाइडलाइन वैल्यू से कम कीमत पर बेची गई थी।
- इसके विपरीत, शुरुआती स्तर पर ही धोखाधड़ी के पुख्ता सबूत मांगने से अधिकारी उन संदिग्ध सौदों की जांच करने से वंचित हो जाएंगे जहां प्रतिफल का एक बड़ा हिस्सा गुपचुप तरीके से नकद (Black Money/Cash) में चुकाया गया हो।
मामले की पृष्ठभूमि (BPCL विवाद)
- केंद्र सरकार से भूमि खरीद: भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) ने केंद्र सरकार से जमीन खरीदी थी और ट्रांसफर डीड में दर्ज मूल्य के आधार पर स्टांप शुल्क व पंजीकरण शुल्क का भुगतान किया था।
- धारा 47-A के तहत अतिरिक्त मांग: निबंधन प्राधिकारी ने दर्ज मूल्य और गाइडलाइन वैल्यू (सर्किल रेट) के बीच अंतर पाते हुए धारा 47-A के तहत मामला संदर्भित किया और अतिरिक्त स्टांप शुल्क की मांग की।
- मद्रास हाईकोर्ट का रुख: हाईकोर्ट के सिंगल जज ने वी.एन. देवदास फैसले पर भरोसा करते हुए अतिरिक्त मांग को रद्द कर दिया था। हालांकि, डिवीजन बेंच ने सिंगल जज के आदेश को पलटते हुए बीपीसीएल को वैधानिक जांच प्रक्रिया में भाग लेने का निर्देश दिया, जिसके खिलाफ बीपीसीएल ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
बड़ी पीठ के विचारार्थ भेजे गए मुख्य प्रश्न
- क्या वी.एन. देवदास (2009) और बाद में रजिस्ट्रार ऑफ एश्योरेंस बनाम एएसएल व्यापार प्रा. लि. में यह सही फैसला दिया गया था कि धारा 47-A केवल तभी लागू हो सकती है जब स्टांप चोरी की कपटपूर्ण मंशा (Fraudulent Intent) के साथ जानबूझकर अवमूल्यन किया गया हो?
- या फिर कपटपूर्ण मंशा/आपराधिक मानसिकता (Culpable Mindset) के अभाव में भी लेन-देन की वास्तविक प्रकृति और बाजार मूल्य के आधार पर प्राधिकारी धारा 47-A के तहत जांच शुरू कर सकते हैं?
- क्या रमेश चंद बंसल बनाम डीएम/कलेक्टर और शांति भूषण बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसलों में सही कानून प्रतिपादित किया गया है?
विधिक प्रतिनिधित्व
- याचिकाकर्ता (BPCL) की ओर से: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) एन. वेंकटरमण, अधिवक्ता टी. सुंदर रामनाथन, विवेक पांडे, कृष्ण सिंघल, आस्था सरदाना, अंशिका सिंह, शिवकुमार और अभिषेक आर.।
- प्रतिवादियों (तमिलनाडु राज्य) की ओर से: तमिलनाडु की वरिष्ठ अतिरिक्त महाधिवक्ता (Senior AAG) हरिप्रिया पद्मनाभन, अधिवक्ता कनिका कलैयारासन और शौर्य दास गुप्ता।
Fraudulent Intent:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता एवं न्यायमूर्ति शील नागू |
| मुख्य पक्षकार | भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) बनाम जिला राजस्व अधिकारी (DRO) |
| संबंधित कानून | भारतीय स्टांप अधिनियम, 1899 की धारा 47-ए (Section 47-A) |
| मुख्य मुद्दा | क्या स्टांप अधिकारियों को अवमूल्यन की जांच के लिए ‘धोखाधड़ी/कपटपूर्ण मंशा’ साबित करना जरूरी है? |

