त्रिपुरा हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और टिप्पणी
- नागरिकों की सुरक्षा से खिलवाड़ पर अफसोस: हाईकोर्ट ने NHIDCL और ठेकेदारों की कार्यशैली पर कड़ा प्रहार करते हुए टिप्पणी की:“हमें राज्य के उन नागरिकों के लिए बेहद दुख होता है जिनकी जान और आजीविका को NHIDCL और उसके EPC ठेकेदारों द्वारा जोखिम में डाला जा रहा है, और राज्य सरकार इसे सुधारने में असमर्थ दिख रही है।” — त्रिपुरा हाईकोर्ट
- अधिकारियों और ठेकेदारों की साठगांठ का अंदेशा: अदालत ने पाया कि NHIDCL ने लगातार काम में देरी करने वाले ठेकेदारों पर मेहरबानी दिखाते हुए बार-बार समय सीमा बढ़ाई। कोर्ट ने कहा:“NHIDCL के अधिकारियों की EPC ठेकेदारों के साथ साठगांठ की स्पष्ट संभावना नजर आती है… यह हैरान करने वाला है कि निर्माण पूरा होने के तुरंत बाद सड़कें जर्जर हो रही हैं।” — त्रिपुरा हाईकोर्ट
- ठेकेदारों को काम सौंपने से सरकारी जवाबदेही खत्म नहीं होती: हाईकोर्ट ने NHAI v. Aam Aadmi Lokmanch (2021) का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 की धारा 4 और 5 के तहत, यदि किसी एजेंसी (NHIDCL) को काम सौंपा जाता है, तो नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की उसकी प्राथमिक कानूनी जिम्मेदारी (Duty of Care) समाप्त नहीं हो जाती।
- केंद्र सरकार को सिस्टमिक ऑडिट का निर्देश: कोर्ट ने कहा कि देशभर से ऐसी खबरें आ रही हैं कि अरबों रुपये की लागत से बने हाईवे उद्घाटन से पहले या पहले मानसून में ही ढह जाते हैं। इसलिए पूरे देश में NHAI और NHIDCL के कामकाज का सिस्टमिक ऑडिट (Systemic Audit) किया जाना समय की आवश्यकता है।
अदालत द्वारा जारी मुख्य निर्देश
- ठेकेदार चयन की जांच: भारत सरकार को 3 महीने के भीतर ठेकेदारों के चयन, घटिया सामग्री के इस्तेमाल की जांच करने और दोषी अधिकारियों व ठेकेदारों पर आपराधिक व दीवानी कार्रवाई (Civil & Criminal Prosecution) चलाने का निर्देश।
- BRO द्वारा स्वतंत्र ऑडिट: मरम्मत कार्य की गुणवत्ता की जांच के लिए सीमा सड़क संगठन (BRO) के इंजीनियरिंग अमले को एक स्वतंत्र पोस्ट-रिपेयर ऑडिट करने का जिम्मा सौंपा गया।
- पाक्षिक रिपोर्ट: NHIDCL को ongoing रिपेयर वर्क की प्रगति रिपोर्ट हर दो सप्ताह में कोर्ट में दाखिल करने का आदेश दिया गया।
अगरतला: त्रिपुरा उच्च न्यायालय ने राज्य में राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण में कथित भ्रष्टाचार, घटिया सामग्री के इस्तेमाल और पहली ही बारिश में सड़कों के ‘डेथ ट्रैप’ (मौत का जाल) बन जाने के मुद्दे पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu PIL) लेते हुए ऐतिहासिक रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश एम.एस. रामचंद्र राव और न्यायमूर्ति विश्वजीत पालित की खंडपीठ ने केंद्र सरकार (Union of India) को सुझाव दिया कि वह भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) और राष्ट्रीय राजमार्ग एवं अवसंरचना विकास निगम (NHIDCL) के संपूर्ण कामकाज की एक प्रणालीगत जांच / सिस्टेमिक ऑडिट (Systemic Audit) शुरू करे।
अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि उसे राज्य के उन नागरिकों के लिए बेहद दुख है जिनके जीवन और आजीविका को NHIDCL और उसके ईपीसी ठेकेदारों (EPC Contractors) द्वारा खतरे में डाल दिया गया है, जबकि टैक्सपेयर्स का प्रति किलोमीटर ₹5 करोड़ से अधिक का पैसा खर्च हुआ था।
उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक व तल्ख टिप्पणियां
1. उद्घाटन से पहले या पहले मानसून में हाईवे टूटना चिंताजनक देशभर में नई सड़कों की बदहाली पर चिंता जताते हुए खंडपीठ ने कहा:“अब वह समय आ गया है जब भारत सरकार को NHAI और NHIDCL के कामकाज का एक समग्र सिस्टेमिक ऑडिट शुरू करना चाहिए। आजकल अखबारों की रिपोर्टें इस बात से भरी पड़ी हैं कि भारी लागत से बने राष्ट्रीय राजमार्ग अपने उद्घाटन से पहले या उसके तुरंत बाद, और पहले मानसून से पहले या ठीक बाद बिखर (Disintegrating) रहे हैं। इस जनहित याचिका में, हमें राज्य के नागरिकों के लिए गहरा खेद है, जिनके जीवन और आजीविका को NHIDCL और उसके EPC ठेकेदारों द्वारा जोखिम में डाला गया है और राज्य सरकार चीजों को सुधारने में असहाय रही है।”
2. NHIDCL और ठेकेदारों की मिलीभगत की आशंका
- अदालत ने नोट किया कि NH-208 और NH-108B के लिए बार-बार समय सीमा बढ़ाने और रियायतें देने के पीछे NHIDCL के अधिकारियों और EPC ठेकेदारों के बीच आपसी मिलीभगत (Collusion) की स्पष्ट संभावना दिखती है।
- सीएसआईआर-सीआरआरआई (CSIR-CRRI) की रिपोर्ट मंगाने में एक साल का समय गंवाने पर कोर्ट ने कहा कि जब NHIDCL के पास अपने सक्षम इंजीनियर मौजूद थे, तो उन्होंने अगले मानसून से पहले मरम्मत में तेजी क्यों नहीं दिखाई।
3. ‘केयर ऑफ ड्यूटी’ (Duty of Care) से नहीं बच सकती वैधानिक एजेंसी
- राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 की धारा 4 व 5 और सुप्रीम कोर्ट के NHAI बनाम आम आदमी लोकमंच (2021) फैसले का हवाला देते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि EPC एजेंसियों को काम सब-कॉन्ट्रैक्ट पर देने मात्र से NHIDCL यात्रियों के प्रति अपनी विधिक जवाबदेही और सुरक्षा दायित्व से मुक्त नहीं हो जाती।
मामले की पृष्ठभूमि (DLSA की ग्राउंड इंस्पेक्शन रिपोर्ट)
- स्वतः संज्ञान (PIL): जून-जुलाई 2026 में अखबारों में छपी खबरों के आधार पर कोर्ट ने PIL दर्ज की, जिसमें खोवाई-अगरतला (NH-108B) और कुमारघाट-सबरूम (NH-208) को जलभराव और जानलेवा गड्ढों से भरा ‘डेथ ट्रैप’ बताया गया था।
- डीएलएसए (DLSA) की रिपोर्ट: जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (खोवाई) के सचिव द्वारा किए गए तीन दिवसीय जमीनी मुआयने में पाया गया कि हाईवे पर लगातार “उच्च जोखिम” (High Risk) की स्थिति बनी हुई थी—ड्रेनेज पूरी तरह बंद थे, बड़ी दरारें थीं, क्रैश बैरियर गायब थे और भूस्खलन का खतरा मंडरा रहा था।
- जिम्मेदारी पर खींचतान: राज्य सरकार ने प्रशासनिक नियंत्रण NHIDCL के पास होने की बात कही, जबकि NHIDCL ने ठेकेदारों की लेटलतीफी और लचर मोबिलाइजेशन को जिम्मेदार ठहराया।
त्रिपुरा हाईकोर्ट द्वारा जारी मुख्य निर्देश
- ठेकेदार चयन और घटिया सामग्री की 3 महीने में जांच: केंद्र सरकार को निर्देश दिया गया कि वह 3 महीने के भीतर ठेकेदारों के चयन और सब-स्टैंडर्ड सामग्री के इस्तेमाल की समयबद्ध जांच करे और दोषी अधिकारियों व ठेकेदारों के खिलाफ दीवानी (Civil) या आपराधिक (Criminal) मुकदमा चलाए।
- बीआरओ (Border Roads Organisation) द्वारा क्वालिटी ऑडिट: मरम्मत कार्य पूरा होने के बाद काम की गुणवत्ता का निष्पक्ष मूल्यांकन करने के लिए सीमा सड़क संगठन (BRO) के इंजीनियरिंग विंग को स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट का जिम्मा सौंपा गया।
- द्विसाप्ताहिक प्रगति रिपोर्ट (Bi-weekly Reports): NHIDCL को निर्देश दिया गया कि वह चालू मरम्मत कार्यों की प्रगति पर हर दो सप्ताह में हाईकोर्ट के समक्ष एक्शन टेकन रिपोर्ट दाखिल करे।
- अगली सुनवाई: मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर 2026 तय की गई है।
विधिक प्रतिनिधित्व
- केंद्र सरकार/NHIDCL की ओर से: विद्युत मजूमदार (उप सॉलिसिटर जनरल) एवं वरिष्ठ अधिवक्ता बी.एन. मजूमदार।
- त्रिपुरा राज्य की ओर से: एस.एम. चक्रवर्ती (महाधिवक्ता / Advocate General)।
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश एम.एस. रामचंद्र राव और न्यायमूर्ति विश्वजीत पालित।
Risky Highway:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | त्रिपुरा उच्च न्यायालय (Tripura High Court) |
| पीठासीन पीठ | चीफ जस्टिस एम.एस. रामचंद्र राव एवं जस्टिस विश्वजीत पालित |
| मुख्य विषय | मानसून में जर्जर होते हाईवे, घटिया निर्माण और NHIDCL अधिकारियों व EPC ठेकेदारों की साठगांठ |
| संबंधित राजमार्ग | NH-208 (कुमारघाट-सबरूम) और NH-108B (खोवाई-अगरतला) |
| अदालत का अंतरिम आदेश | केंद्र सरकार 3 महीने में जांच करे; BRO से ऑडिट का आदेश; हर 2 सप्ताह में प्रगति रिपोर्ट मांगी गई। |

