कैदी कैसे हुआ रिहा? (The Conspiracy)
- मूल सजा: शंकर और उसकी पत्नी लक्ष्मी को 2004 में अपहरण और हत्या के मामले में उम्रकैद हुई थी। सीमित भूमिका के कारण लक्ष्मी पहले रिहा हो गई, लेकिन शंकर जेल में ही बंद था।
- जेल क्लर्क से सांठगांठ: जेल में तैनात फर्स्ट डिविजन असिस्टेंट (FDA) श्रीकांत ने पैसे के लालच में शंकर की पत्नी लक्ष्मी से उसकी रिहाई कराने का वादा किया।
- सुप्रीम कोर्ट के आदेश से छेड़छाड़: श्रीकांत ने तमिलनाडु की जेल से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के एक वास्तविक रिहाई आदेश को इंटरसेप्ट किया और फॉन्ट व लेआउट हूबहू कॉपी करते हुए तमिलनाडु के कैदी की जगह शंकर का नाम और ब्योरा एडिट कर दिया।
- फर्जी मेलिंग: कानूनी औपचारिकताओं का भ्रम देने के लिए श्रीकांत ने एक वकील का छद्म नाम (Pseudonym) इस्तेमाल कर शिवाजीनगर डाकघर से फर्जी आदेश जेल को पोस्ट कर दिया। जेल अधिकारियों ने बिना सत्यापन (Verification) के इसे असली मानकर नवंबर 2018 में शंकर को रिहा कर दिया।
बेंगलुरु: कर्नाटक के कारागार और सुरक्षा तंत्र में एक बेहद चौंकाने वाला और सनसनीखेज फर्जीवाड़ा उजागर हुआ है।
वर्ष 2004 में फिरौती के लिए एक नाबालिग बच्चे के अपहरण और जघन्य हत्याकांड में उम्रकैद की सजा काट रहा दोषी कैदी सुप्रीम कोर्ट के जाली रिहाई आदेश (Forged Supreme Court Order) के दम पर 2018 में जेल से बाहर आ गया और लगभग 6 वर्षों तक खुले में सामान्य जीवन जीता रहा। अंदरूनी व्हिसलब्लोअर की गुमनाम शिकायतों और कारागार महानिदेशक (DGP Prisons) द्वारा कराई गई उच्चस्तरीय जांच के बाद इस फर्जीवाड़े का पर्दाफाश हुआ, जिसके बाद पुलिस ने हत्यारे और जाली दस्तावेज तैयार करने वाले जेल क्लर्क (FDA) दोनों को गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे भेज दिया है।
फर्जीवाड़े और साजिश की मुख्य बातें
- मूल अपराध व सजा: पेशे से राजमिस्त्री (Mason) शंकर ए. और उसकी पत्नी लक्ष्मी को चिकपेट से एक नाबालिग बच्चे के अपहरण व हत्या (2004) के मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। पत्नी सीमित भूमिका के कारण समय से पहले रिहा हो गई थी, जबकि शंकर परप्पना अग्रहारा सेंट्रल जेल में बंद था।
- जेल क्लर्क की अंदरूनी मिलीभगत: परप्पना अग्रहारा जेल में कार्यरत प्रथम श्रेणी सहायक (FDA) श्रीकांत ने पैसे के लालच में शंकर की पत्नी को उसके पति की रिहाई कराने का झांसा दिया।
- असली आदेश को एडिट कर तैयार किया फर्जी दस्तावेज: श्रीकांत ने तमिलनाडु की जेल के एक कैदी की रिहाई के संबंध में जारी वास्तविक सुप्रीम कोर्ट आदेश को हासिल किया। उसने शीर्ष अदालत के फॉन्ट, टाइपोग्राफी और न्यायिक प्रारूप से हूबहू मिलान करते हुए उस कैदी के स्थान पर शंकर का नाम व विवरण बदल दिया।
- फर्जी वकील के नाम से डाक द्वारा प्रेषण: अधिकारियों को चकमा देने के लिए श्रीकांत ने एक फर्जी वकील के नाम से शिवाजीनगर डाकघर से वह आदेश आधिकारिक पते पर पोस्ट किया, जिससे यह सामान्य न्यायिक डाक प्रतीत हुआ।
- सत्यापन में भारी चूक: जेल के वरिष्ठ अधिकारियों ने बिना किसी ऑनलाइन क्रॉस-वेरिफिकेशन या सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री से पुष्टि किए शंकर को नवंबर 2018 में जेल के मुख्य दरवाजे से रिहा कर दिया।
पर्दाफाश और री-अरेस्ट की समयरेखा
- मैसूर में सामान्य जीवन: रिहाई के बाद शंकर पहले बेंगलुरु के ज्ञानभारती और बाद में मैसूर में अपने घर पर शांतिपूर्वक सामान्य जिंदगी बिता रहा था।
- व्हिसलब्लोअर की शिकायतें और डीजीपी का संज्ञान: जनवरी में आई पहली गुमनाम शिकायत को जेल के भीतर दबाने की कोशिश की गई, लेकिन मई में दूसरी विस्तृत शिकायत सीधे कारागार एवं सुधार सेवा महानिदेशक (DGP Prisons) आलोक कुमार के पास पहुंची।
- सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री से भौतिक सत्यापन: डीजीपी के निर्देश पर पुलिस टीम ने नई दिल्ली स्थित उच्चतम न्यायालय का दौरा किया और सहायक रजिस्ट्रार (Assistant Registrar) के रिकॉर्ड से मिलान किया। सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री ने आधिकारिक तौर पर पुष्टि की कि शंकर के नाम से ऐसा कोई रिहाई आदेश कभी जारी ही नहीं हुआ था।
- एफआईआर और गिरफ्तारी:
- परप्पना अग्रहारा थाने में जालसाजी (Forgery), धोखाधड़ी (Cheating), फर्जी दस्तावेज निर्माण (Fabrication) और आपराधिक षड्यंत्र (Criminal Conspiracy) की धाराओं में एफआईआर दर्ज की गई।
- पुलिस ने मैसूर स्थित घर पर छापा मारकर शंकर को गिरफ्तार कर सीधे न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया।
- मुख्य षड्यंत्रकारी जेल क्लर्क श्रीकांत को भी गिरफ्तार कर लिया गया।
पुलिस बयान और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल
इलेक्ट्रॉनिक सिटी के पुलिस उपायुक्त (DCP) एम. नारायण ने पुष्टि की: “क्लर्क श्रीकांत ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश में कूट-रचना (Forgery) की और सत्यापन से बचने के लिए इसे स्थानीय डाकघर से भेजा। हम इस पूरे षड्यंत्र में श्रीकांत और शंकर की पत्नी के बीच हुए वित्तीय लेनदेन की गहन जांच कर रहे हैं।”
यह घटना जेल प्रशासन और न्यायिक आदेशों के क्रियान्वयन के आंतरिक सुरक्षा प्रोटोकॉल पर गंभीर सवाल खड़े करती है कि कैसे बिना किसी ई-कोर्ट / ऑनलाइन पोर्टल सत्यापन के लगभग 6 साल तक उम्रकैद का दोषी कैदी खुले में घूमता रहा।
Forged Order:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| मूल अपराध | 2004 में चिकपेट से नाबालिग बच्चे का अपहरण और हत्या (उम्रकैद की सजा) |
| संबंधित जेल | परप्पना अग्रहारा सेंट्रल जेल, बेंगलुरु |
| फर्जीवाड़ा कब हुआ | नवंबर 2018 (जाली आदेश से रिहाई) |
| धोखाधड़ी की अवधि | लगभग 6 वर्ष (2018 से 2024 तक आजाद रहा) |
| मुख्य आरोपी | शंकर ए (कैदी) और श्रीकांत (जेल क्लर्क/FDA) |
| कार्रवाई | FIR दर्ज, दोनों गिरफ्तार और न्यायिक हिरासत में भेजे गए |

