हाईकोर्ट द्वारा तय किए गए 3 प्रमुख कानूनी सिद्धांत
हाईकोर्ट ने इस मामले में तीन बड़े कानूनी प्रश्नों का उत्तर देते हुए स्पष्ट नियम तय किए:
- एक बार ही लिया जा सकता है संज्ञान (Single Cognizance Rule): संज्ञान हमेशा अपराध (Offence) पर लिया जाता है, न कि केवल अभियुक्तों पर। यदि किसी पुलिस रिपोर्ट/चार्जशीट पर एक बार संज्ञान ले लिया गया है, तो उसी मामले या तथ्यों पर दोबारा संज्ञान (Second Cognizance) लेना कानूनन पूरी तरह वर्जित है।
- संज्ञान के समय धाराएं जोड़ने/हटाने का अधिकार नहीं: चार्जशीट स्वीकार कर संज्ञान लेते समय मजिस्ट्रेट पुलिस द्वारा लगाई गई धाराओं में अपनी तरफ से नई धाराएं जोड़ने (Add) या हटाने (Delete) का काम नहीं कर सकता। यदि किसी अतिरिक्त अपराध या धारा को जोड़ा जाना आवश्यक लगता है, तो उसकी सही कानूनी अवस्था आरोप तय करने का चरण (Framing of Charge) होती है।
- प्रोटेस्ट पिटीशन से अपने आदेश की समीक्षा (Review) संभव नहीं: मजिस्ट्रेट अपने खुद के पूर्व में दिए गए संज्ञान आदेश की समीक्षा या पुनर्विचार करने के लिए विरोध याचिका (Protest Petition) का सहारा नहीं ले सकता।
लखनऊ: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान लेने की शक्तियों की सीमाएं तय करते हुए एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक व्यवस्था दी है।
न्यायमूर्ति श्री प्रकाश सिंह की एकल पीठ ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM), गोंडा द्वारा 22 मई 2026 को पारित आदेश को अधिकार क्षेत्र से बाहर और कानूनन अमान्य मानते हुए पूरी तरह निरस्त (Quash) कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि एक न्यायिक मजिस्ट्रेट समान तथ्यों और अपराध के आधार पर केवल एक बार ही संज्ञान ले सकता है। किसी बाद में दाखिल विरोध याचिका (Protest Petition) का उपयोग पूर्व में पारित संज्ञान आदेश की समीक्षा (Review) या उसमें फेरबदल करने के साधन के रूप में नहीं किया जा सकता [अल्पना सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य]।
उच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित 3 प्रमुख विधिक सिद्धांत
अदालत ने मजिस्ट्रेट की संज्ञान शक्तियों से जुड़े तीन मुख्य कानूनी प्रश्नों का निस्तारण करते हुए व्यवस्था दी:
1. संज्ञान केवल एक बार लिया जा सकता है (Single Cognizance Rule)
- आपराधिक विधि में संज्ञान ‘अपराध’ (Offence) का लिया जाता है, न कि केवल ‘अपराधी’ का। इसलिए समान तथ्यात्मक पृष्ठभूमि पर मजिस्ट्रेट दोबारा संज्ञान नहीं ले सकता।
- एक बार पुलिस रिपोर्ट/चार्जशीट पर संज्ञान का आदेश पारित होने के बाद मजिस्ट्रेट उस आदेश की समीक्षा (Review) नहीं कर सकता, क्योंकि आपराधिक प्रक्रिया में मजिस्ट्रेट को अपने स्वयं के न्यायिक आदेशों की समीक्षा का कोई अंतर्निहित अधिकार (Inherent Power) प्राप्त नहीं है।
2. संज्ञान के चरण में धाराएं जोड़ने या हटाने पर रोक (No Addition/Deletion of Sections)
- अदालत ने व्यवस्था दी कि पुलिस रिपोर्ट पर संज्ञान लेते समय मजिस्ट्रेट अपनी मर्जी से दंडात्मक धाराओं को घटा या बढ़ा नहीं सकता।
- यदि पुलिस चार्जशीट के अतिरिक्त कोई अन्य अपराध बनता हुआ प्रतीत होता है, तो उसका उपयुक्त विधिक चरण आरोप तय करने का चरण (Stage of Framing of Charges) है, न कि संज्ञान लेने का चरण।
3. विरोध याचिका पूर्व आदेश की समीक्षा का माध्यम नहीं बन सकती
- किसी अभियुक्त के पक्ष में दाखिल क्लोजर/फाइनल रिपोर्ट के विरुद्ध आई प्रोटेस्ट पिटीशन पर निर्णय करते समय मजिस्ट्रेट पूर्व में जिन अभियुक्तों के खिलाफ संज्ञान ले चुका है, उनके खिलाफ नए सिरे से संज्ञान लेकर अतिरिक्त धाराएं नहीं जोड़ सकता।
मामले की पृष्ठभूमि (गोंडा के नवाबगंज थाने का मामला)
- एफआईआर व चार्जशीट (2025): गोंडा जिले के नवाबगंज थाने में दर्ज प्राथमिकी में अखिलेश सिंह, शेखर सिंह और अल्पना सिंह नामजद थे। पुलिस ने जांच पूरी कर अखिलेश सिंह और शेखर सिंह के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की, जबकि अल्पना सिंह के पक्ष में फाइनल रिपोर्ट (FR) पेश की।
- पहला संज्ञान आदेश (17 नवंबर 2025): सीजेएम गोंडा ने चार्जशीट पर संज्ञान लेते हुए अखिलेश सिंह को BNS की धारा 115(2), 351(2), 352, 324(2), 109(1) और शेखर सिंह को धारा 115(2), 351(2), 352 BNS के तहत तलब (Summon) किया।
- प्रोटेस्ट पिटीशन और दूसरा संज्ञान (22 मई 2026): अल्पना सिंह को छोड़े जाने के खिलाफ शिकायतकर्ता ने प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल की। 22 मई 2026 को सीजेएम ने प्रोटेस्ट पिटीशन तय करते हुए न केवल अल्पना सिंह को तलब किया, बल्कि पहले से तलब शेखर सिंह के खिलाफ भी दोबारा संज्ञान लेते हुए नई और अतिरिक्त धाराएं जोड़ दीं।
- हाईकोर्ट में चुनौती: अल्पना सिंह और अन्य ने सीजेएम के इस दूसरे आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
- सीजेएम गोंडा का आदेश रद्द: न्यायमूर्ति श्री प्रकाश सिंह ने 22 मई 2026 के विवादित आदेश को क्षेत्राधिकार से परे (Beyond Jurisdiction) ठहराते हुए रद्द कर दिया।
- प्रक्रियात्मक स्पष्टता: अदालत ने रेखांकित किया कि अतिरिक्त अपराधों के संबंध में सामग्री होने पर ट्रायल कोर्ट आरोप विरचन (Framing of Charges) या आवश्यकता पड़ने पर विचारण के दौरान अतिरिक्त अभियुक्तों/अपराधों के लिए उपयुक्त कानूनी प्रावधानों के तहत आगे बढ़ सकता है, किंतु संज्ञान आदेश को री-ओपन नहीं कर सकता।
विधिक विवरण
- केस शीर्षक: अल्पना सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य
- प्रासंगिक कानून: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) / CrPC के संज्ञान, प्रोटेस्ट पिटीशन और चार्ज फ्रेमिंग प्रावधान; भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धाराएं 115(2), 351(2), 352, 324(2) एवं 109(1)
- पीठ: न्यायमूर्ति श्री प्रकाश सिंह (इलाहाबाद उच्च न्यायालय, लखनऊ खंडपीठ)
Single Cognizance Rule: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (लखनऊ पीठ) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति श्री प्रकाश सिंह |
| याचिकाकर्ता | अल्पना सिंह (Alpana Singh) |
| मुख्य कानूनी मुद्दा | क्या मजिस्ट्रेट विरोध याचिका (Protest Petition) के जरिए अपने पूर्व संज्ञान आदेश की समीक्षा या दोबारा संज्ञान ले सकता है? |
| संबंधित कानून | भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 / CrPC / BNSS |
| अदालत का निर्णय | CJM गोंडा का 22 मई 2026 का आदेश रद्द; मजिस्ट्रेट दोबारा संज्ञान या धाराएं नहीं जोड़ सकता। |

