हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क
- संज्ञेय अपराध की अनुपस्थिति: न्यायमूर्ति मिलिंद एन. जाधव ने कहा कि केवल एक-दूसरे पर चिल्लाने के अलावा ऐसा कोई आरोप नहीं है कि उन्होंने किसी तीसरे पक्ष (जनता) को परेशान किया या कोई अश्लीलता/अभद्रता की।“प्रथम दृष्टया, आरोपों को पढ़ने से मेरी स्पष्ट राय है कि कोई भी संज्ञेय अपराध नहीं बनता है और इसलिए इस अदालत का हस्तक्षेप आवश्यक है।” — बॉम्बे हाईकोर्ट
- शराब का सेवन स्वतः अपराध नहीं: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल शराब का सेवन करना धारा 85 के तहत अपराध नहीं बनता। अनुचित या अशिष्ट व्यवहार (Improper and Disorderly Behaviour) है या नहीं, यह प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर तय किया जाना चाहिए।
- BNSS की धारा 528 का उपयोग: अदालत ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 (पुराणी CrPC की धारा 482 के समकक्ष) का उल्लेख करते हुए कहा कि हाईकोर्ट के पास यह अधिकार है कि वह दुर्भावनापूर्ण या परेशान करने के इरादे से दर्ज मामलों में हस्तक्षेप करे ताकि आरोपियों को प्रक्रियात्मक उत्पीड़न (Procedural Harassment) से बचाया जा सके।
- सहमति से रद्द मामलों पर हर्जाना (Costs on Consent Quashing): अदालत ने सहमति के आधार पर मामले रद्द कराने की बढ़ती प्रवृत्ति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे मामलों से न्यायिक समय और सार्वजनिक संसाधनों की बर्बादी होती है, जिससे अदालतों में लंबित मामलों का बोझ बढ़ता है।
मुंबई: बॉम्बे हाईकोर्ट ने सार्वजनिक शांति, व्यक्तिगत आचरण और आपराधिक कानूनों के दुरुपयोग पर एक व्यावहारिक विधिक व्यवस्था दी है।
न्यायमूर्ति मिलिंद एन. जाधव की एकल पीठ ने पिंपरी पुलिस स्टेशन (पुणे) में दर्ज प्राथमिकी (FIR) और आरोप पत्र को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए निरस्त (Quash) कर दिया। इसके साथ ही अदालत का समय बर्बाद होने के एवज में आवेदकों पर ₹10,000 की कॉस्ट अधिरोपित की। अदालत ने स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक सड़क पर बिना किसी अश्लीलता (Obscenity) या भ्रष्ट आचरण के केवल दो व्यक्तियों का आपस में जोर-जोर से चिल्लाना या बहस करना महाराष्ट्र मद्यनिषेध अधिनियम, 1949 (Maharashtra Prohibition Act, 1949) की धारा 85(1) के तहत कोई संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) नहीं बनता। अदालत ने माना कि केवल शराब का सेवन कर लेना अपने आप में कोई गैर-कानूनी आचरण सिद्ध नहीं करता जब तक कि तथ्यों से अव्यवस्थित और अशोभनीय व्यवहार स्पष्ट न हो।
उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां
1. प्राथमिक तौर पर संज्ञेय अपराध का अभाव न्यायमूर्ति मिलिंद एन. जाधव ने आरोपों का अवलोकन करते हुए कहा: “प्रथम दृष्टया, आरोपों के सीधे अध्ययन से मेरी स्पष्ट राय है कि कोई भी संज्ञेय अपराध नहीं बनता है और इसलिए इस न्यायालय का हस्तक्षेप आवश्यक है। अभियोजन का यह मामला बिल्कुल नहीं था कि आरोपियों ने किसी तीसरे पक्ष पर चिल्लाया था या सार्वजनिक शांति को भंग किया था। केवल दो लोगों का आपस में चिल्लाना संज्ञेय अपराध की श्रेणी में नहीं लाया जा सकता।”
2. केवल शराब पीना धारा 85 के तहत अपराध नहीं
- अदालत ने रेखांकित किया कि शराब का सेवन करना स्वतः धारा 85 के तहत दंडात्मक अपराध नहीं बन जाता।
- कानूनन यह साबित करना आवश्यक होता है कि व्यक्ति शराब के नशे में सार्वजनिक स्थान पर ऐसा अनुचित, अनियंत्रित और अशांत व्यवहार (Disorderly Behaviour) कर रहा था जिससे आम जनता को गंभीर असुविधा या क्षोभ हुआ हो।
3. BNSS की धारा 528 (पूर्ववर्ती CrPC 482) का प्रयोग
- अदालत ने कहा कि उच्च न्यायालय BNSS की धारा 528 के तहत अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग दुर्भावनापूर्ण इरादे से दर्ज मामलों और आरोपियों के अनुचित प्रक्रियात्मक उत्पीड़न (Procedural Harassment) को रोकने के लिए करते हैं।
4. सहमति से रद्दीकरण (Consent Quashing) पर हर्जाने का औचित्य
- अदालत ने अदालती समय की बर्बादी पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा:“यदि ऐसे मामलों में आसानी से सहमति से रद्दीकरण की अनुमति दी जाती है, तो कीमती न्यायिक समय पूरी तरह बर्बाद हो जाता है, जिसका उपयोग वास्तविक मुकदमों के निस्तारण के लिए किया जा सकता था। ऐसे मामले कानूनी प्रणाली को अवरुद्ध करते हैं और भारी पेंडेंसी का कारण बनते हैं। इसलिए तुच्छ मुकदमों पर हर्जाना लगाना आवश्यक है।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (पिंपरी पुलिस स्टेशन का मामला)
- प्राथमिकी व आरोप: पिंपरी पुलिस स्टेशन में दो व्यक्तियों के खिलाफ महाराष्ट्र मद्यनिषेध अधिनियम, 1949 की धारा 85(1) (शराब के नशे में सार्वजनिक स्थान पर दुर्व्यवहार) के तहत एफआईआर दर्ज कर चार्जशीट दाखिल की गई थी।
- पुलिस का दावा: पुलिस का आरोप था कि दोनों आरोपी शराब के नशे में सार्वजनिक सड़क पर एक-दूसरे पर जोर-जोर से चिल्ला रहे थे, जिससे सार्वजनिक शांति भंग हुई और आम जनता को परेशानी हुई।
- याचिकाकर्ताओं का रुख: दोनों आरोपियों ने हाईकोर्ट में संयुक्त रूप से याचिका दायर कर एफआईआर और आपराधिक कार्यवाही को इस आधार पर रद्द करने की मांग की कि उनके बीच का विवाद पूरी तरह व्यक्तिगत था और कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
- एफआईआर निरस्त: उच्च न्यायालय ने माना कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से कोई संज्ञेय अपराध स्थापित नहीं होता, अतः पिंपरी पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर को रद्द किया जाता है।
- ₹10,000 की कॉस्ट: कीमती न्यायिक समय लेने और तुच्छ मुकदमेबाजी के निवारण के तौर पर आवेदकों को ₹10,000 की हर्जाना राशि जमा करने का निर्देश दिया गया।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: आपराधिक विविध आवेदन (BNSS धारा 528 / CrPC धारा 482 – एफआईआर निरस्तीकरण)
- प्रासंगिक कानून: महाराष्ट्र मद्यनिषेध अधिनियम, 1949 की धारा 85(1); भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528
- पीठ: न्यायमूर्ति मिलिंद एन. जाधव (बॉम्बे उच्च न्यायालय)
Loud Shouting On Street: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | बॉम्बे उच्च न्यायालय (Bombay High Court) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति मिलिंद एन. जाधव (Justice Milind N. Jadhav) |
| संबंधित कानून | महाराष्ट्र निषेध अधिनियम, 1949 की धारा 85(1) व BNSS, 2023 की धारा 528 |
| मुख्य मुद्दा | क्या शराब के नशे में सार्वजनिक स्थान पर केवल जोर से चिल्लाना संज्ञेय अपराध है? |
| अदालत का फैसला | FIR रद्द की गई; याचिकाकर्ताओं पर ₹10,000 की लागत (Cost) लगाई गई। |

