हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और सख्त टिप्पणियां
- हिंसा और छेड़छाड़ आधिकारिक कर्तव्य नहीं: चिकित्सा बोर्ड (Medical Board) की रिपोर्ट में पीड़ितों के शरीर पर गंभीर चोटों के निशान देखकर हाईकोर्ट ने कहा:“पीड़ितों के हाथ-पैर रस्सी से बांधकर पेट के बल लिटाकर बार-बार पीटा गया। इसे किसी भी तरह से पुलिस कर्तव्य का हिस्सा नहीं कहा जा सकता, यह केवल एक जघन्य अपराध है। न ही यह तर्क दिया जा सकता है कि जांच के दौरान पुलिस ने केवल अपनी सीमा का थोड़ा सा उल्लंघन किया था।” — इलाहाबाद हाईकोर्ट
- धारा 197 CrPC का अपवाद (Explanation): अदालत ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 197(1) के स्पष्टीकरण (Explanation) के अनुसार, जब किसी लोक सेवक पर धारा 354 (महिला की लज्जा भंग करना/छेड़छाड़) जैसे अपराध का आरोप हो, तो मुकदमा चलाने के लिए किसी पूर्व सरकारी मंजूरी (Sanction) की आवश्यकता नहीं होती है।
- पुलिस डायरी की फर्जी कहानी खारिज: पुलिस ने जनरल डायरी (GD) में लिखा था कि गिरफ्तारी के दौरान जमीन पर गिरने से चारों आरोपियों को खून बहने वाली चोटें आईं। हाईकोर्ट ने इस स्पष्टीकरण को “अत्यंत हास्यास्पद” (Absolutely Ridiculous) करार दिया।
अदालत का अंतिम आदेशहाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और सख्त टिप्पणियां
- हिंसा और छेड़छाड़ आधिकारिक कर्तव्य नहीं: चिकित्सा बोर्ड (Medical Board) की रिपोर्ट में पीड़ितों के शरीर पर गंभीर चोटों के निशान देखकर हाईकोर्ट ने कहा:“पीड़ितों के हाथ-पैर रस्सी से बांधकर पेट के बल लिटाकर बार-बार पीटा गया। इसे किसी भी तरह से पुलिस कर्तव्य का हिस्सा नहीं कहा जा सकता, यह केवल एक जघन्य अपराध है। न ही यह तर्क दिया जा सकता है कि जांच के दौरान पुलिस ने केवल अपनी सीमा का थोड़ा सा उल्लंघन किया था।” — इलाहाबाद हाईकोर्ट
- धारा 197 CrPC का अपवाद (Explanation): अदालत ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 197(1) के स्पष्टीकरण (Explanation) के अनुसार, जब किसी लोक सेवक पर धारा 354 (महिला की लज्जा भंग करना/छेड़छाड़) जैसे अपराध का आरोप हो, तो मुकदमा चलाने के लिए किसी पूर्व सरकारी मंजूरी (Sanction) की आवश्यकता नहीं होती है।
- पुलिस डायरी की फर्जी कहानी खारिज: पुलिस ने जनरल डायरी (GD) में लिखा था कि गिरफ्तारी के दौरान जमीन पर गिरने से चारों आरोपियों को खून बहने वाली चोटें आईं। हाईकोर्ट ने इस स्पष्टीकरण को “अत्यंत हास्यास्पद” (Absolutely Ridiculous) करार दिया।
अदालत का अंतिम आदेश
प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस हिरासत में हिंसा (Custodial Violence), महिलाओं के शीलभंग (Molestation) और लोक सेवकों को मिलने वाले अभियोजन पूर्व स्वीकृति संरक्षण (Sanction for Prosecution under Section 197 CrPC) पर एक अत्यंत कड़ा और नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है।
न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की एकल पीठ ने बांदा जिले के बबेरू थाने से जुड़े मामले में महिला पुलिसकर्मी सहित आरोपी पुलिसकर्मियों की डिस्चार्ज अर्जियों (Discharge Applications) को खारिज करने वाले ट्रायल कोर्ट के 27 सितंबर 2024 के आदेश को पूरी तरह वैध ठहराया और पुलिसकर्मियों की दोनों आपराधिक याचिकाओं को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया है कि नागरिकों के हाथ-पैर रस्सी से बांधकर पेट के बल लिटाकर लाठियों से पीटना और महिलाओं के साथ छेड़छाड़ करना पुलिस की किसी आधिकारिक ड्यूटी का हिस्सा नहीं हो सकता, बल्कि यह एक “जघन्य अपराध” (Heinous Crime) है। ऐसे कृत्यों के लिए आरोपी पुलिसकर्मियों को दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 197 के तहत किसी पूर्व सरकारी मंजूरी की सुरक्षा नहीं मिल सकती।
उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां
1. हिरासत में क्रूरता ‘ड्यूटी’ नहीं, जघन्य अपराध मेडिकल बोर्ड की चोट रिपोर्ट का अवलोकन करते हुए न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह ने कहा: “घायलों (जिसमें शिकायतकर्ता भी शामिल है) के नितंबों, जांघों, पैरों, सीने और शरीर के अन्य हिस्सों पर आई चोटों और सूजन का अवलोकन स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि पुलिस कर्मियों (याचिकाकर्ताओं सहित) द्वारा थाने में हिरासत के दौरान उनके हाथ-पैर रस्सी से बांधकर, मुंह के बल लिटाकर विशेष रूप से नितंबों और जांघों पर अंधाधुंध वार किए गए थे। इस प्रकार की हिंसा को किसी भी तरह से पुलिस की आधिकारिक ड्यूटी का हिस्सा नहीं कहा जा सकता। इसे केवल एक जघन्य अपराध (Heinous Crime) के रूप में ही वर्णित किया जा सकता है, और न ही यह तर्क दिया जा सकता है कि पुलिस ने जांच के दौरान अपनी सीमाओं को थोड़ा लांघा था।”
2. पुलिस का जीडी (General Diary) स्पष्टीकरण ‘हास्यास्पद’
- पुलिस ने 14 मई 2022 की जीडी में दर्ज किया था कि गिरफ्तारी के दौरान सभी आरोपी जमीन पर गिर गए जिससे उन्हें चोटें आईं और खून बहने लगा।
- हाईकोर्ट ने पुलिस के इस बहाने को पूरी तरह “हास्यास्पद” (Absolutely Ridiculous) करार देते हुए कहा कि गिरफ्तारी के समय चारों का एक साथ गिर जाना और गंभीर रूप से लहूलुहान हो जाना अविश्वसनीय है। यदि ट्रायल कोर्ट ने स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड का गठन न कराया होता, तो पुलिस की झूठी कहानी ही रिकॉर्ड पर रह जाती।
3. धारा 354 IPC के मामलों में धारा 197 CrPC की मंजूरी की आवश्यकता नहीं
- अदालत ने रेखांकित किया कि चार्जशीट में भारतीय दंड संहिता की धारा 354 (महिला की लज्जा भंग करना) भी शामिल है।
- CrPC की धारा 197(1) के स्पष्टीकरण (Explanation) का हवाला देते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि जब किसी लोक सेवक पर महिला के शीलभंग (Section 354 IPC) का आरोप हो, तो मुकदमा चलाने के लिए किसी पूर्व सरकारी अभियोजन मंजूरी (Prior Sanction) की आवश्यकता नहीं होती।
4. बिना जमानत और सरेंडर के डिस्चार्ज अर्जी पोषणीय नहीं
- अदालत ने यह भी नोट किया कि पुलिसकर्मियों ने पूर्व में हाईकोर्ट से समनिंग आदेश को चुनौती देने वाली अर्जी इस आधार पर वापस ली थी कि वे ट्रायल कोर्ट में सरेंडर कर नियमित जमानत लेंगे।
- इसके बावजूद उन्होंने न तो ट्रायल कोर्ट में आत्मसमर्पण किया और न ही जमानत ली, बल्कि सीधे डिस्चार्ज अर्जी दाखिल कर दी, जो प्रक्रियात्मक रूप से पोषणीय नहीं थी।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (बांदा जिले के बबेरू थाने की घटना)
- घटना की शुरुआत (मई 2022): बबेरू थाने में आईपीसी की धारा 147, 323, 504, 506 के तहत दर्ज एक केस में सब-इंस्पेक्टर ने धारा 41A CrPC का नोटिस तामील कराने के लिए चार सिपाहियों को पादरी गांव भेजा।
- पुलिस पर हमले का आरोप: पुलिस का आरोप था कि आरोपियों और उनके परिजनों ने सिपाहियों के साथ गाली-गलौज व मारपीट की, नोटिस फाड़े, पथराव किया और एक सिपाही का मोबाइल छीन लिया।
- पुलिस की जवाबी बर्बरता: इसके बाद भारी पुलिस बल गांव पहुंचा और 13 मई 2022 की रात 4 महिलाओं को तथा अगले दिन शिकायतकर्ता सहित 4 पुरुषों को गिरफ्तार किया गया।
- हिरासत में यातना व लूट के आरोप: रिहाई के बाद पीड़ितों ने आरोप लगाया कि थाने में उन्हें बंधक बनाकर अमानवीय यातनाएं दी गईं, महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की गई और लूटपाट की गई।
- CrPC 156(3) के तहत एफआईआर: पीड़ित पक्ष द्वारा मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 156(3) CrPC की अर्जी दाखिल करने के बाद अदालत के आदेश पर 9 नामजद और अज्ञात पुलिसकर्मियों के खिलाफ धारा 147, 148, 323, 504, 452, 354 और 395 (डकैती) IPC के तहत एफआईआर दर्ज हुई और चार्जशीट पर संज्ञान लिया गया।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
- डिस्चार्ज अर्जियों की खारिजी बरकरार: उच्च न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट द्वारा 27 सितंबर 2024 को पारित आदेश को सही ठहराते हुए आरोपी पुलिसकर्मियों पर मुकदमा चलाने की मंजूरी दी।
- आपराधिक याचिकाएं निरस्त: पुलिसकर्मियों की दोनों याचिकाओं को पूरी तरह सारहीन (Devoid of Merits) मानते हुए खारिज कर दिया गया।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: आपराधिक विविध आवेदन (धारा 482 CrPC / धारा 528 BNSS – डिस्चार्ज आदेश को चुनौती)
- प्रासंगिक कानून: दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 197(1) (लोक सेवकों का अभियोजन संरक्षण एवं इसका अपवाद); भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354, 323, 395; संविधान का अनुच्छेद 21
- पीठ: न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह (इलाहाबाद उच्च न्यायालय)
Custodial Violence:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह (Justice Madan Pal Singh) |
| संबंधित कानून | CrPC की धारा 197 / BNSS की धारा 218 और IPC की धारा 354 |
| मुख्य मुद्दा | क्या कस्टोडियल हिंसा (Custodial Violence) के आरोपी पुलिसकर्मियों को धारा 197 CrPC के तहत सरकारी संरक्षण (Sanction) प्राप्त है? |
| अदालत का फैसला | याचिका खारिज; ऐसी हिंसा को आधिकारिक कर्तव्य नहीं माना जा सकता, इसलिए मुकदमा चलाने के लिए पूर्व स्वीकृति अनिवार्य नहीं है। |

