मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य कानूनी निष्कर्ष
- तकनीक और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग नियम: कोर्ट ने 9 सितंबर के अपने आदेश में ‘मद्रास हाई कोर्ट वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग रूल्स, 2026’ का उल्लेख करते हुए कहा:“एक ऐसा दौर आ गया है जहां किसी भी कार्यवाही को वीसी मोड के जरिए संचालित किया जा सकता है। बड़े टर्नओवर और कई फाइलों वाले जटिल मध्यस्थता (Arbitration) मामलों को ऑनलाइन संचालित किया जा रहा है। इसलिए निचली अदालतें केवल इस आधार पर वीसी गवाही से इनकार नहीं कर सकतीं कि मामला जटिल है या उसमें कई दस्तावेज शामिल हैं।”
- प्रतिवादियों का दोहरा रवैया: न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि जब डॉक्टर तीन बार व्यक्तिगत रूप से भारत में उपस्थित थे, तब प्रतिवादियों ने जिरह नहीं की और अब जब वे स्वास्थ्य कारणों से यात्रा नहीं कर सकते, तो उनकी भौतिक उपस्थिति की जिद की जा रही है।
- स्वास्थ्य और उम्र का ध्यान: अदालत ने माना कि 72 वर्षीय वादी की उम्र और उनकी बाईपास सर्जरी की चिकित्सीय स्थिति उन्हें वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए गवाही देने का पूरा हक देती है।
चेन्नई: मद्रास हाईकोर्ट ने दीवानी मुकदमों में गवाहों के परीक्षण, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग नियमावली, 2026 और तकनीकी सुलभता के सिद्धांतों पर एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया है।
न्यायमूर्ति एन. आनंद वेंकटेश की एकल पीठ ने कोयंबटूर की ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए लंदन में कार्यरत 72 वर्षीय एक डॉक्टर को विभाजन वाद (Partition Suit) में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए गवाही और जिरह की अनुमति दी। इसके साथ ही अदालत ने प्रतिवादियों द्वारा डॉक्टर की सशरीर उपस्थिति की मांग वाली पुनरीक्षण याचिकाओं को खारिज कर दिया। अदालत ने फैसला सुनाया है कि यदि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के माध्यम से प्रभावी प्रतिपरीक्षण (Cross-examination) संभव है, तो किसी गवाह को अदालत के समक्ष सशरीर (Physically) उपस्थित होने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मामले में कई दस्तावेज या जटिल मुद्दे शामिल होने मात्र से कोई भी अदालत वर्चुअल मोड में गवाही दर्ज करने से इनकार नहीं कर सकती [नारायणसामी बनाम बालसुंदरम]।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं टिप्पणियां
1. ‘वीसी से साक्ष्य दर्ज करने से इनकार नहीं कर सकती अदालतें’ आधुनिक न्यायिक कार्यप्रणाली में तकनीक की भूमिका को रेखांकित करते हुए न्यायमूर्ति एन. आनंद वेंकटेश ने कहा: “अब वह चरण आ चुका है जहां किसी भी न्यायिक कार्यवाही को वीसी मोड के माध्यम से सफलतापूर्वक संचालित किया जा सकता है। बड़े टर्नओवर और कई जिल्दों (Volumes) वाले दस्तावेजों से जुड़े कई जटिल मध्यस्थता (Arbitration) मामलों का संचालन ऑनलाइन/वीसी मोड से सुगमतापूर्वक किया जा रहा है। इसी उद्देश्य से ‘मद्रास उच्च न्यायालय वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग नियमावली, 2026’ अधिसूचित की गई है, जो वीसी मोड से साक्ष्य दर्ज करने की स्पष्ट प्रक्रिया और सुरक्षा उपाय प्रदान करती है। अतः निचली अदालतें केवल इस आधार पर वीसी से गवाहों का परीक्षण करने से कभी मना नहीं कर सकतीं कि मामले में कई दस्तावेज या जटिल मुद्दे शामिल हैं।”
2. मौके गंवाने के बाद सशरीर उपस्थिति का आग्रह आश्चर्यजनक
- अदालत ने पाया कि वादी-डॉक्टर पूर्व में कम से कम तीन तारीखों पर जिरह के लिए भारत में सशरीर उपस्थित रहे थे, लेकिन प्रतिवादियों ने उस समय उनका प्रतिपरीक्षण नहीं किया और अवसर गंवा दिया।
- पीठ ने टिप्पणी की कि जब गवाह भारत में व्यक्तिगत रूप से मौजूद था तब अवसर चूकने के बाद, अब उसकी गंभीर चिकित्सा स्थिति के बावजूद उसकी प्रत्यक्ष उपस्थिति पर अड़े रहना केवल मुकदमे में विलंब करने का प्रयास है।
3. उम्र और स्वास्थ्य आधार पर वर्चुअल उपस्थिति न्यायोचित
- अदालत ने संज्ञान लिया कि 72 वर्षीय डॉक्टर की बाईपास सर्जरी हो चुकी है और चिकित्सकों ने उन्हें लंबी अंतरराष्ट्रीय हवाई यात्रा न करने की सलाह दी है।
- वीसी रूल्स 2026 में निष्पक्ष जिरह के सभी आवश्यक विधिक सुरक्षा उपाय मौजूद हैं, जो तमिलनाडु और पुडुचेरी की सभी अदालतों व न्यायाधिकरणों पर लागू होते हैं। ऐसे में यात्रा खर्च वहन करने की प्रतिवादियों की पेशकश भी गवाह को व्यक्तिगत रूप से बुलाने का आधार नहीं बन सकती।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (कोयंबटूर विभाजन वाद विवाद)
- मूल वाद: वादी (लंदन निवासी डॉक्टर) ने कोयंबटूर की दीवानी अदालत में कुछ संपत्तियों में 1/3 हिस्से के लिए विभाजन का मुकदमा, एक पूर्व डिक्री के विरुद्ध घोषणा और संपत्तियों के हस्तांतरण पर रोक (Injunction) की मांग की थी।
- पहले साक्ष्य बंद होना और दोबारा खुलना: वादी तीन सुनवाई पर व्यक्तिगत रूप से पेश हुआ था, लेकिन प्रतिवादियों ने जिरह नहीं की, जिसके बाद नवंबर 2021 में उसका साक्ष्य बंद कर दिया गया था। बाद में प्रतिवादियों ने अर्जी देकर गवाह को जिरह के लिए दोबारा तलब कराया।
- बाईपास सर्जरी और वीसी की मांग: इस दौरान वादी की बाईपास सर्जरी हुई और उसने वीसी से पेश होने की अर्जी दी। ट्रायल कोर्ट ने इसे स्वीकार कर लिया।
- प्रतिवादियों की आपत्ति: प्रतिवादियों ने हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिकाएं दायर कर दलील दी कि मामले में धोखाधड़ी, जालसाजी और कंपनियों के बंटवारे के जटिल दस्तावेज शामिल हैं, इसलिए प्रभावी जिरह केवल भौतिक उपस्थिति में ही संभव है। हाईकोर्ट ने इन दलीलों को खारिज कर दिया।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: नारायणसामी बनाम बालसुंदरम [Civil Revision Petition – मद्रास उच्च न्यायालय]
- प्रासंगिक कानून: सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) का आदेश XVIII नियम 4 (साक्ष्य की रिकॉर्डिंग); मद्रास उच्च न्यायालय वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग नियमावली, 2026 (Madras High Court Video Conferencing Rules, 2026); भारतीय साक्ष्य अधिनियम/भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की प्रासंगिक धाराएं
- संबद्ध न्यायिक नजीर: स्टेट ऑफ महाराष्ट्र बनाम डॉ. प्रफुल बी. देसाई (2003, सुप्रीम कोर्ट) — ‘वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से साक्ष्य दर्ज करना व्यक्तिगत उपस्थिति का ही एक वैध समकालीन कानूनी विकल्प है।’
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ताओं (प्रतिवादियों) की ओर से: अधिवक्ता टी.एम. हरिहरन एवं जी.एम. अनंतकुमार
- मुख्य प्रतिवादी (वादी डॉक्टर) की ओर से: अधिवक्ता नवनीत राघवाचारी (अधिवक्ता वी. श्रीमती के निर्देश पर)
- अन्य प्रतिवादियों की ओर से: अधिवक्ता एल. लीला रमन
- पीठ: न्यायमूर्ति एन. आनंद वेंकटेश (मद्रास उच्च न्यायालय)
मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | मद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति एन. आनंद वेंकटेश (Justice N Anand Venkatesh) |
| मामला | संपत्ति के बंटवारे (Partition Suit) से जुड़ा सिविल विवाद |
| गवाह/वादी | लंदन में रहने वाले 72 वर्षीय डॉक्टर (बाईपास सर्जरी से पीड़ित) |
| कोर्ट का फैसला | वीसी (VC) के जरिए साक्ष्य दर्ज करने की अनुमति; प्रतिवादियों की पुनरीक्षण याचिकाएं खारिज। |

