सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख
पीठ ने बैंकिंग रेगुलेशन एक्ट की धारा 35A का हवाला देते हुए कहा कि RBI के सर्कुलर वैधानिक रूप से बाध्यकारी हैं। “जब कोई फाइनेंसर कानूनी दायरे से बाहर जाकर आधी रात को लॉक तोड़ता है, बिना नोटिस और बिना किसी हस्ताक्षर के गाड़ी ले जाता है, तो वह कानून का संरक्षण खो देता है और अनधिकृत जब्ती का दोषी बनता है।”
सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री को इस फैसले की एक प्रति तुरंत भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को भेजने का निर्देश दिया गया है ताकि देश भर में इन नियमों का अनुपालन कराया जा सके।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) द्वारा लोन रिकवरी के नाम पर की जाने वाली जबरन वाहन जब्ती, रिकवरी एजेंटों की मनमानी और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के सर्कुलरों के निष्प्रभावी क्रियान्वयन पर एक अत्यंत ऐतिहासिक और कड़ा फैसला सुनाया है।
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश को निरस्त करते हुए पीड़ित ट्रक मालिक को ₹10 लाख का मुआवजा, वाहन बिक्री के ₹4.50 लाख 6% ब्याज सहित वापस करने, दोनों लोन खाते बंद करने और फाइनेंस कंपनी पर ₹50,000 का वाद व्यय (Costs) लगाने का आदेश दिया है। शीर्ष अदालत ने व्यवस्था दी है कि भारत कानून के शासन (Rule of Law) से चलने वाला देश है, जहां रिकवरी के नाम पर बाहुबल (Muscle Power) या गुंडों का इस्तेमाल करने की अनुमति किसी भी वित्तीय संस्थान को नहीं दी जा सकती। अदालत ने आरबीआई को निर्देश दिया है कि वह अपने दिशानिर्देशों का वास्तविक व कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित कराए, ताकि किसी भी नागरिक को बिना कानूनी प्रक्रिया और बिना नोटिस के आधी रात में उसकी आजीविका से बेदखल न किया जा सके।
शीर्ष अदालत की प्रमुख विधिक टिप्पणियां एवं आरबीआई को फटकार
1. ‘आरबीआई के सर्कुलर 20 साल से सिर्फ कागजों पर’ रिजर्व बैंक की विनियामक विफलता पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए पीठ ने कहा: “एनबीएफसी और अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों को पिछले दो दशकों में जारी किए गए आरबीआई के दिशानिर्देश, मास्टर सर्कुलर और स्पष्टीकरण केवल कागजों पर मौजूद रहे हैं और उन्हें धरातल पर लागू कराने के लिए आरबीआई द्वारा कोई प्रभावी कदम नहीं उठाए गए। हम आरबीआई को निर्देश देते हैं कि वह सभी बैंकों और एनबीएफसी द्वारा इन दिशानिर्देशों का वास्तविक अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाए, ताकि इस तरह की घटनाएं दोबारा न हों जहां किसी नागरिक को आधी रात में बिना किसी नोटिस और कानूनी सहारे के उसकी आजीविका से वंचित कर दिया जाए।”
2. रात के अंधेरे में ताला तोड़ना कानूनन अनधिकृत और ‘गुंडागर्दी’
- सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले आईसीआईसीआई बैंक लिमिटेड बनाम प्रकाश कौर (2007) का हवाला देते हुए अदालत ने कहा:“आरोपी कंपनी द्वारा 9 अप्रैल 2023 को देर रात करीब 1:00 बजे स्टीयरिंग लॉक तोड़कर वाहन ले जाना किसी भी दृष्टिकोण से शांतिपूर्ण कब्जा नहीं है। यह कृत्य विशुद्ध ‘गुंडागर्दी’ (Goondaism) के सभी लक्षणों को प्रदर्शित करता है, जिसे इस अदालत और आरबीआई ने बार-बार स्पष्ट शब्दों में खारिज किया है। जब कोई फाइनेंसर कानूनी दायरे से बाहर जाकर बिना नोटिस दिए ताला तोड़ता है, तो वह कानून और अनुबंध के तहत मिलने वाले संरक्षण को पूरी तरह खो देता है।”
सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए 10 बाध्यकारी सिद्धांत (Ten Principles on Repossession)
अदालत ने भविष्य में वित्तीय संस्थानों और निचली अदालतों के मार्गदर्शन हेतु 10 स्वर्णिम सिद्धांत निर्धारित किए:
- 1. उत्पीड़न और बाहुबल पर रोक: असमय (Odd hours) बार-बार फोन करके परेशान करना या लोन वसूली के लिए बाहुबल/धौंस का इस्तेमाल करना पूरी तरह प्रतिबंधित है।
- 2. कानून सम्मत जब्ती: वाहन की जब्ती केवल कानून सम्मत प्रक्रिया से ही हो सकती है; बैंक या संस्थान वसूली के लिए गुंडों की सेवाएं नहीं ले सकते।
- 3. रिकवरी एजेंटों का कड़ा सत्यापन (Due Diligence): एजेंटों को नियुक्त करने से पहले बैंकों को आउटसोर्सिंग वित्तीय सेवाओं पर आरबीआई के नियमों के तहत उचित जांच प्रक्रिया पूरी करनी होगी।
- 4. वैध जब्ती खंड (Repossession Clause): ऋण अनुबंध में शामिल जब्ती खंड भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872 के प्रावधानों के अनुरूप और कानूनी रूप से वैध होना चाहिए।
- 5. बीसीएसबीआई कोड का पालन: रिकवरी एजेंटों को आरबीआई के निर्देशों और बैंकिंग कोड्स एंड स्टैंडर्ड्स बोर्ड ऑफ इंडिया (BCSBI) के आचार संहिता का कड़ाई से पालन करना होगा।
- 6. आरबीआई की त्वरित कार्रवाई: दुर्व्यवहार या दिशानिर्देशों के उल्लंघन की शिकायतों को आरबीआई द्वारा अत्यंत गंभीरता से लिया जाएगा।
- 7. रिकवरी पर प्रतिबंध की शक्ति: बार-बार नियमों का उल्लंघन करने वाले बैंकों पर आरबीआई संबंधित क्षेत्राधिकार में रिकवरी एजेंटों के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगा सकता है।
- 8. अनिवार्य नोटिस और नीलामी प्रक्रिया: जब्ती खंड में स्पष्ट नोटिस अवधि, नीलामी से पहले बकाएदार को भुगतान का अंतिम अवसर और वाहन वापसी की स्पष्ट प्रक्रिया दर्ज होनी चाहिए।
- 9. क्रेडिट काउंसलर और स्थानीय भाषा में कोड: जरूरतमंद कर्जदारों के लिए क्रेडिट काउंसलर की व्यवस्था हो और एनबीएफसी-एमएफआई शाखाओं में स्थानीय भाषा में फेयर प्रैक्टिसेज कोड प्रदर्शित करना अनिवार्य होगा।
- 10. कार्यस्थल या घर पर वसूली की सीमाएं: लोन वसूली सामान्यतः पूर्व-निर्धारित केंद्रीय स्थल पर ही होगी। कर्जदार के घर या कार्यस्थल पर रिकवरी टीम तभी जा सकती है जब वह दो या अधिक बार तय स्थान पर उपस्थित होने में विफल रहा हो।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (चोलामंडलम फाइनेंस वाहन जब्ती विवाद)
- ऋण अनुबंध: अपीलार्थी ने वर्ष 2019 में अपने ट्रक के लिए चोलामंडलम इन्वेस्टमेंट एंड फाइनेंस कंपनी लिमिटेड से कमर्शियल व्हीकल लोन लिया था, जो वाहन के बंधक (Hypothecation) पर आधारित था। जून 2021 में पूरक ऋण भी लिया गया।
- किस्त चूक और जब्ती: किस्तों के भुगतान में चूक के बाद 2022 में एक बार गाड़ी रोकी गई, जिसे आंशिक भुगतान पर छोड़ दिया गया।
- आधी रात को ताला तोड़कर जब्ती (9 अप्रैल 2023): सीसीटीवी निगरानी में खड़े ट्रक का 4 अज्ञात व्यक्तियों ने देर रात 1 बजे स्टीयरिंग लॉक तोड़ दिया और गाड़ी लेकर फरार हो गए।
- पुलिस और मजिस्ट्रेट की निष्क्रियता: पीड़ित ने उसी दिन ई-एफआईआर दर्ज कराई और बाद में पुलिस अधीक्षक व सीजेएम के समक्ष सीआरपीसी की धारा 156(3) [अब बीएनएसएस 175(3)] के तहत अर्जी दी, जिसे यह कहकर खारिज कर दिया गया कि यह लोन डिफॉल्ट का मामला है। बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी याचिका खारिज कर दी।
- फाइनेंसर की मनमानी: बाद में कंपनी ने एक लीगल नोटिस भेजा जिससे पता चला कि कंपनी ने वाहन को पहले ही बेच दिया है और नीलामी के बाद भी कर्जदार पर बकाया बाकी है।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश व राहत
- इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश रद्द: शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के फैसले को निरस्त कर दिया।
- लोन खाते बंद: अदालत ने निर्देश दिया कि अपीलार्थी के दोनों लोन खाते पूर्ण रूप से बंद माने जाएंगे और उस पर कोई बकाया शेष नहीं रहेगा।
- नीलामी राशि की वापसी: कंपनी को आदेश दिया गया कि वह वाहन बिक्री की राशि ₹4,50,000 को बिक्री की तारीख से भुगतान तक 6% वार्षिक ब्याज के साथ पीड़ित को लौटाए।
- ₹10 लाख का भारी मुआवजा: मानसिक प्रताड़ना और लंबे समय तक आजीविका छिनने के एवज में कंपनी पीड़ित को ₹10,00,000 (दस लाख रुपये) का मुआवजा देगी।
- ₹50,000 का वाद व्यय: अपीलार्थी को ₹50,000 अतिरिक्त कानूनी खर्च के रूप में अदा किए जाएंगे।
- आरबीआई को प्रति प्रेषित: अदालत की रजिस्ट्री को इस फैसले की प्रति तत्काल भारतीय रिजर्व बैंक को भेजने का निर्देश दिया गया ताकि नियामक स्तर पर सख्त कदम उठाए जा सकें।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: ट्रक मालिक (अपीलार्थी) बनाम चोलामंडलम इन्वेस्टमेंट एंड फाइनेंस कंपनी लिमिटेड एवं अन्य [आपराधिक/सिविल अपील – सर्वोच्च न्यायालय]
- प्रासंगिक कानून: बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 35A (आरबीआई की बाध्यकारी निर्देश जारी करने की वैधानिक शक्ति); भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872; भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 175(3) (पूर्ववर्ती 156(3) CrPC); भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण आजीविका का अधिकार) एवं अनुच्छेद 142
- संबद्ध मार्गदर्शक नजीरें:
- आईसीआईसीआई बैंक लिमिटेड बनाम प्रकाश कौर एवं अन्य (2007) 2 SCC 711 (सुप्रीम कोर्ट) — ‘ऋण वसूली के लिए गुंडों या बाहुबल का प्रयोग कानून के शासन के खिलाफ है।’
- सिटिकॉर्प मारुति फाइनेंस लिमिटेड बनाम विजयलक्ष्मी (सुप्रीम कोर्ट) — ‘ऋणदाता बिना विधिक प्रक्रिया के जबरन वाहन जब्त नहीं कर सकते।’
- पीठ: न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे (सर्वोच्च न्यायालय)
Forcible Repossession: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठासीन पीठ | जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे |
| मुख्य मुद्दा | बिना नोटिस देर रात रिकवरी एजेंटों द्वारा गाड़ी की जबरन जब्ती और बिक्री |
| पीड़ित को राहत | ₹10 लाख मुआवजा, दोनों लोन खाते बंद, गाड़ी की बिक्री राशि (₹4.5 लाख + 6% ब्याज) वापस |
| RBI को निर्देश | 2008-2015 के ‘फेयर प्रैक्टिस कोड’ और रिकवरी नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करना |

