केरल हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के मुख्य निष्कर्ष
- समान्य CrPC की जगह विशेष सैन्य कानून लागू होता है: डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि कोर्ट-मार्शल की कार्यवाही सामान्य दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के बजाय नौसेना अधिनियम और उसके तहत बने विशेष नियमों द्वारा संचालित होती है।
- अनुच्छेद 33 के तहत अधिकारों का विनियमन: अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 33 (Article 33) का हवाला दिया, जो संसद को सशस्त्र बलों (Armed Forces) के सदस्यों में अनुशासन और कर्तव्यों के सही पालन के लिए उनके मौलिक अधिकारों में संशोधन या सीमा तय करने की शक्ति देता है।
- जांच अधिकारी ही सबसे उपयुक्त व्यक्ति: कोर्ट ने टिप्पणी की कि नेवी रेगुलेशन 163(1) में ‘उपयुक्त व्यक्ति’ (Suitable Person) शब्द का प्रयोग हुआ है। चूंकि जांच अधिकारी केस के सभी तथ्यों, सबूतों और चार्जशीट से पूरी तरह वाकिफ होता है, इसलिए वह कोर्ट-मार्शल के सामने अभियोजन का पक्ष रखने के लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति हो सकता है।
- अभियोजक का काम केवल साक्ष्य प्रस्तुत करना है: पीठ ने एकल पीठ के उस विचार को खारिज कर दिया जिसमें अभियोजक का एक स्वतंत्र निकाय होना अनिवार्य माना गया था। अदालत ने कहा कि कोर्ट-मार्शल में सजा सुनाने का अधिकार कोर्ट-मार्शल बेंच के पास होता है, न कि अभियोजक के पास। इसलिए निष्पक्ष सुनवाई पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
अदालत ने केंद्र सरकार की अपील को स्वीकार करते हुए सैनिक की चुनौती को खारिज कर दिया।
कोच्चि: केरल हाईकोर्ट ने सैन्य न्यायशास्त्र (Military Jurisprudence), नौसेना अधिनियम, 1957 के तहत कोर्ट-मार्शल कार्यवाहियों, जांच अधिकारी (Investigating Officer) की अभियोजक (Prosecutor) के रूप में नियुक्ति और संविधान के अनुच्छेद 21 व अनुच्छेद 33 के अंतर्संबंध पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण व निर्णायक फैसला सुनाया है।
न्यायमूर्ति के. नटराजन और न्यायमूर्ति जॉनसन जॉन की खंडपीठ ने एकल पीठ के वर्ष 2025 के उस आदेश को निरस्त कर दिया जिसमें कहा गया था कि जांच अधिकारी को अभियोजक नियुक्त नहीं किया जा सकता। खंडपीठ ने केंद्र सरकार की अपील स्वीकार करते हुए 31 साल तक नौसेना में सेवा देने वाले अधिकारी संतोष करवाड़े की अपील को खारिज कर दिया। अदालत ने व्यवस्था दी है कि नौसेना कर्मियों के विरुद्ध मामले की जांच करने वाला अधिकारी उसी मामले में कोर्ट-मार्शल के समक्ष अभियोजक के रूप में नियुक्त किया जा सकता है, क्योंकि नौसेना विनियमों में ऐसी दोहरी भूमिका पर कोई कानूनी रोक नहीं है और यह व्यवस्था अपने आप में संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) के अधिकार का हनन नहीं करती।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं सिद्धांत
1. ‘जांच अधिकारी अभियोजक के रूप में सबसे उपयुक्त व्यक्ति हो सकता है’: खंडपीठ नौसेना विनियमों के विस्तृत विश्लेषण के बाद न्यायमूर्ति के. नटराजन और न्यायमूर्ति जॉनसन जॉन की पीठ ने कहा: “विनियमों के गहन अध्ययन से यह स्पष्ट है कि किसी जांच अधिकारी को अभियोजक नियुक्त किए जाने पर कोई विधिक रोक नहीं है। कोर्ट-मार्शल के समक्ष अभियोजन का संचालन करने के लिए जांच अधिकारी एक ‘उपयुक्त व्यक्ति’ (Suitable Person) हो सकता है, क्योंकि वह मामले के सभी तथ्यों से भली-भांति परिचित होता है और वही अंततः सशस्त्र बल कर्मी के विरुद्ध आरोप पत्र (Charge Sheet) दाखिल करता है।”
2. अभियोजक का ‘स्वतंत्र प्राधिकारी’ होना अनिवार्य नहीं
- खंडपीठ ने एकल पीठ के इस दृष्टिकोण से स्पष्ट असहमति जताई कि अभियोजक को अनिवार्य रूप से एक स्वतंत्र प्राधिकारी (Independent Authority) होना चाहिए:“अभियोजक का एकमात्र कर्तव्य कोर्ट-मार्शल के समक्ष साक्ष्य प्रस्तुत करना है। निर्णय या सजा का आदेश स्वयं कोर्ट-मार्शल द्वारा दिया जाता है, अभियोजक द्वारा नहीं। अभियोजक की भूमिका केवल आरोपी को अदालत के समक्ष प्रभावी रूप से प्रस्तुत करने और पत्रावली पर साक्ष्य रखने तक सीमित है। इसलिए अभियोजक का एक स्वतंत्र प्राधिकारी होना अनिवार्य नहीं है, बल्कि उसका कोर्ट-मार्शल के समक्ष मामले की पैरवी के लिए एक ‘उपयुक्त व्यक्ति’ होना पर्याप्त है।”
3. सामान्य दंड प्रक्रिया (CrPC/BNSS) बनाम नौसेना विशेष अधिनियम
- अदालत ने स्पष्ट किया कि कोर्ट-मार्शल कार्यवाहियां सामान्य दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC / BNSS) से संचालित नहीं होतीं, बल्कि वे नौसेना अधिनियम, 1957 और ‘नेवी (डिसिप्लिन एंड मिसलेनियस प्रोविजन्स) रेगुलेशंस, 1965’ के तहत दी गई विशेष प्रक्रिया के अधीन आती हैं।
- यह विशेष ढांचा नौसेना कर्मियों की जांच, गिरफ्तारी, साक्ष्य दर्ज करने और ट्रायल के लिए एक स्वायत्त प्रक्रियात्मक व्यवस्था प्रदान करता है।
4. अनुच्छेद 33: सशस्त्र बलों के मौलिक अधिकारों को सीमित करने की संसदीय शक्ति
- पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 33 का विशेष रूप से उल्लेख किया, जो संसद को यह अधिकार देता है कि वह सशस्त्र बलों के सदस्यों द्वारा अपने कर्तव्यों के उचित निर्वहन और उनमें अनुशासन बनाए रखने के लिए संविधान के भाग III के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों के अनुप्रयोग को विधि द्वारा प्रतिबंधित या संशोधित कर सकती है।
- अतः सामान्य आपराधिक मुकदमों के सिद्धांतों को अक्षरशः कोर्ट-मार्शल कार्यवाहियों पर थोपकर नियमों को असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं विनियमों को चुनौती
- आरोपों की प्रकृति: नौसेना में 31 वर्ष तक सेवा देने वाले अधिकारी संतोष करवाड़े नौसेना अधिनियम, 1957 के तहत कोर्ट-मार्शल की कार्यवाही का सामना कर रहे थे। उन पर एक साथी अधिकारी को बेईमानी से ₹1.10 लाख ट्रांसफर करने के लिए प्रेरित करने सहित कई अन्य गंभीर आरोप थे।
- याचिकाकर्ता की विधिक चुनौती:
- करवाड़े ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाते हुए आरोप लगाया कि उन्हें स्वतंत्र और निष्पक्ष सुनवाई (Free and Fair Trial) से वंचित किया गया है, क्योंकि जिस अधिकारी ने उनके खिलाफ आरोपों की जांच की थी, उसी को कोर्ट-मार्शल में अभियोजक बना दिया गया।
- उन्होंने विनियम 178(3) की वैधता को चुनौती दी, जो यह अनुमति देता है कि अभियोजक कोर्ट-मार्शल के दौरान एक ‘सक्षम गवाह’ (Competent Witness) भी हो सकता है।
- उन्होंने तर्क दिया कि एक ही व्यक्ति का जांचकर्ता, अभियोजक और गवाह होना आपराधिक न्यायशास्त्र के बुनियादी सिद्धांतों और अनुच्छेद 21 का घोर उल्लंघन है।
- एकल पीठ का पूर्ववर्ती दृष्टिकोण (2025):
- एकल पीठ ने विनियम 178(3) को असंवैधानिक घोषित करने से तो इनकार कर दिया था, परंतु यह व्याख्या की थी कि विनियम 163(1) में प्रयुक्त शब्द ‘उपयुक्त व्यक्ति’ (Suitable Person) की व्याख्या जांच अधिकारी को अभियोजक बनाने के रूप में नहीं की जा सकती क्योंकि इससे निष्पक्ष सुनवाई प्रभावित होगी।
- इसी व्याख्या के खिलाफ केंद्र सरकार ने अपील दायर की थी, जबकि करवाड़े ने विनियम 178(3) को निरस्त न किए जाने के खिलाफ अपील की थी।
उच्च न्यायालय का अंतिम आदेश
- केंद्र सरकार की अपील स्वीकृत: खंडपीठ ने माना कि विनियम 163 और विनियम 178 को एक साथ पढ़ने पर जांच अधिकारी को अभियोजक नियुक्त करने पर कोई वैधानिक निषेध नहीं निकलता। एकल पीठ के प्रतिकूल निष्कर्षों को अपास्त (Set aside) कर दिया गया।
- करवाड़े की अपील खारिज: अदालत ने पुष्टि की कि केवल इस आधार पर कि अभियोजक को एक गवाह के रूप में भी परीक्षित किया जा सकता है, विनियम 178(3) को असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता। संतोष करवाड़े की अपील को योग्यताहीन मानकर खारिज कर दिया गया।
- कोर्ट-मार्शल की वैधता बहाल: जांच अधिकारी द्वारा अभियोजन संचालन को पूर्णतः विधिसम्मत ठहराया गया।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: भारत संघ व अन्य बनाम संतोष करवाड़े व अन्य [रिट अपील संख्या – केरल उच्च न्यायालय]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- भारत संघ (केंद्र सरकार) की ओर से: अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) पी. श्रीकुमार एवं केंद्र सरकार के वकील सुविन आर. मेनन
- प्रतिवादी (नौसेना अधिकारी) की ओर से: अधिवक्ता यशवंत शेनॉय एवं आयशा अब्राहम
- प्रासंगिक कानून एवं विनियम:
- नौसेना अधिनियम, 1957 (Navy Act, 1957)
- नेवी (अनुशासन और विविध प्रावधान) विनियम, 1965 के विनियम 163(1) (अभियोजक की नियुक्ति – ‘उपयुक्त व्यक्ति’) एवं विनियम 178(3) (अभियोजक का सक्षम गवाह होना)
- प्रासंगिक संवैधानिक प्रावधान: भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 (निष्पक्ष सुनवाई एवं प्राण व दैहिक स्वतंत्रता) तथा अनुच्छेद 33 (सशस्त्र बलों के मूल अधिकारों को संशोधित करने की संसद की विशेष विधायी शक्ति)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- मेजर जी.एस. सोढ़ी बनाम भारत संघ (1991, सुप्रीम कोर्ट) — ‘सैनिक अदालतों (Court-Martial) की प्रक्रिया विशेष सैन्य कानूनों और सेवा अनुशासन द्वारा शासित होती है; नागरिक आपराधिक प्रक्रिया के हर तकनीकी नियम को अक्षरशः कोर्ट-मार्शल पर लागू नहीं किया जा सकता।’
- यूनियन ऑफ इंडिया बनाम जे.एस. बराड़ (सुप्रीम कोर्ट) — ‘अनुच्छेद 33 के तहत सैन्य कर्मियों के मौलिक अधिकारों का दायरा सैन्य अनुशासन और संस्थागत अखंडता के अधीन वैध रूप से सीमित किया जा सकता है।’
- पीठ: न्यायमूर्ति के. नटराजन और न्यायमूर्ति जॉनसन जॉन (केरल उच्च न्यायालय)
Armed Forces:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | केरल उच्च न्यायालय (Kerala High Court) |
| पीठ (Judges) | न्यायमूर्ति के. नटराजन और न्यायमूर्ति जॉनसन जॉन |
| मामला | Union of India & Ors v. Santosh Karwade & Anr |
| कानूनी प्रावधान | नौसेना अधिनियम, 1957 और नेवी रेगुलेशन 1965 (नियम 163 व 178) |
| मुख्य बिंदु | नौसेना कोर्ट-मार्शल में जांच अधिकारी ही अभियोजक (Prosecutor) बन सकता है |

