DHCBA की मुख्य आपत्तियां और चिंताएं
- न्यायिक समीक्षा का अधिकार छीनना: संशोधन के तहत अब विवादित चालान का शुरुआती फैसला स्वतंत्र अदालतों/न्यायिक मंचों के बजाय कार्यकारी या विभागीय अधिकारियों (Executive Authorities) द्वारा किया जाएगा। DHCBA का तर्क है कि साक्ष्य, तथ्य और देनदारी से जुड़े सवालों का फैसला केवल स्वतंत्र न्यायपालिका द्वारा ही होना चाहिए।
- 50% राशि जमा करने की शर्त (Pre-deposit Impediment): नियमों में यह शर्त रखी गई है कि अदालत जाने से पहले चालान की राशि का 50% पहले जमा करना अनिवार्य होगा। बार एसोसिएशन ने इसे आम नागरिकों के लिए वित्तीय बाधा बताया, जो उनके न्याय पाने के मौलिक अधिकार को सीमित करती है।
- 45 दिनों में स्वचालित स्वीकृति (Deemed Acceptance): नए नियम के तहत यदि कोई व्यक्ति 45 दिनों के भीतर चालान को चुनौती नहीं देता है, तो उसे चालान स्वीकार किया हुआ माना जाएगा। DHCBA ने कहा कि यह नियम उन लोगों के लिए अन्यायपूर्ण है जो डिजिटल रूप से सक्षम नहीं हैं या जिन्हें जटिल ऑनलाइन प्रक्रियाओं की समझ नहीं है।
नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट बार एसोसिएशन (Delhi High Court Bar Association – DHCBA) ने केंद्र सरकार द्वारा केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 (Central Motor Vehicles Rules, 1989 – CMVR) में ट्रैफिक चालानों के न्यायनिर्णयन (Adjudication) से संबंधित हालिया संशोधनों पर गहरा विरोध दर्ज किया है।
एसोसिएशन ने स्पष्ट किया कि यातायात नियमों के त्वरित प्रवर्तन (Expeditious Enforcement) के नाम पर नागरिकों के निष्पक्ष न्यायिक परीक्षण और स्वतंत्र अदालती पहुंच के मौलिक अधिकार से समझौता नहीं किया जा सकता। प्रस्ताव पर DHCBA अध्यक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन और सचिव विक्रम सिंह पंवार द्वारा आधिकारिक रूप से हस्ताक्षर किए गए हैं। बार निकाय की कार्यकारी समिति ने बुधवार (23 सितंबर 2026) को एक आधिकारिक प्रस्ताव पारित कर इन संशोधनों को तत्काल वापस लेने या उन पर पुनर्विचार करने की मांग की है।
DHCBA द्वारा प्रस्ताव में उठाए गए तीन प्रमुख विधिक ऐतराज
1. न्यायिक अदालत के बजाय विभागीय/कार्यकारी अधिकारियों द्वारा न्यायनिर्णयन (Executive Adjudication)
- संशोधित नियमों के अनुसार, यदि कोई नागरिक ट्रैफिक चालान का विरोध (Contest) करता है, तो प्रारंभिक स्तर पर उसका फैसला स्वतंत्र न्यायिक मजिस्ट्रेट या अदालत द्वारा नहीं, बल्कि पुलिस या परिवहन विभाग के ही कार्यकारी अधिकारियों (Departmental Authorities) द्वारा किया जाएगा।
- बार निकाय ने इस पर सख्त विधिक आपत्ति जताते हुए प्रस्ताव में दर्ज किया:“चालान से उत्पन्न होने वाले तथ्यों, साक्ष्यों और विधिक दायित्व से जुड़े सभी विवादित प्रश्नों का न्यायनिर्णयन केवल और केवल एक स्वतंत्र न्यायिक मंच (Independent Judicial Forum) द्वारा ही किया जाना चाहिए। अभियोजन पक्ष (पुलिस/परिवहन विभाग) स्वयं अपने ही मामले में न्यायाधीश की भूमिका नहीं निभा सकता।”
2. अदालत जाने से पूर्व 50% राशि का अनिवार्य प्री-डिपॉजिट (Pre-Deposit Condition)
- नए नियमों के तहत यह अनिवार्य शर्त लगाई गई है कि यदि कोई व्यक्ति विभागीय निर्णय से असंतुष्ट होकर सक्षम न्यायालय का दरवाजा खटखटाना चाहता है, तो उसे पहले चालान की कुल राशि का 50 प्रतिशत प्री-डिपॉजिट के रूप में जमा कराना होगा।
- DHCBA ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त ‘न्याय तक पहुंच’ (Access to Justice) पर एक गंभीर वित्तीय अवरोध (Substantial Financial Impediment) करार दिया।
- एसोसिएशन ने कहा कि यह शर्त विशेष रूप से आम और आर्थिक रूप से कमजोर नागरिकों के लिए अपनी बेगुनाही साबित करने के रास्ते बंद कर देगी।
3. 45 दिनों में चुनौती न देने पर ‘डीम्ड स्वीकृति’ (Deemed Acceptance Clause)
- नए नियमों में यह प्रावधान किया गया है कि यदि जारी होने के 45 दिनों के भीतर चालान को ऑनलाइन पोर्टल पर चुनौती नहीं दी जाती है, तो उसे स्वतः ‘स्वीकार’ (Deemed Accepted) मान लिया जाएगा और वसूली की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।
- बार एसोसिएशन ने इस समय-सीमा और व्यवस्था को पूरी तरह अनुचित बताया:
- भारत में डिजिटल डिवाइड (Digital Divide) और सीमित तकनीकी साक्षरता के कारण बड़ी आबादी तुरंत ऑनलाइन नोटिस देखने या जटिल डिजिटल पोर्टल्स का उपयोग करने में असमर्थ है।
- तकनीकी गड़बड़ियों, गलत मोबाइल नंबर फीड होने या सर्वर डाउन रहने पर नागरिकों पर बिना सुनवाई के आर्थिक दंड थोप दिया जाएगा, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों (Principles of Natural Justice) का खुला उल्लंघन है।
संतुलित व्यवस्था की मांग
DHCBA ने अपने प्रस्ताव के समापन में रेखांकित किया कि बार संस्था सड़कों पर सुरक्षा और सुगम यातायात प्रबंधन के लिए सख्त व त्वरित प्रवर्तन की आवश्यकता को भली-भांति समझती है, परंतु: “कार्यकारी समिति त्वरित ट्रैफिक प्रवर्तन की आवश्यकता को स्वीकार करती है, किंतु यह सुधार निष्पक्ष न्यायनिर्णयन और सार्थक न्याय तक पहुंच की कीमत पर नहीं हो सकता।”
एसोसिएशन ने सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) तथा संबंधित प्राधिकारियों से इन विवादास्पद नियमों की तुरंत समीक्षा करने और अदालती क्षेत्राधिकार को बहाल करने की मांग की है।
विधिक विवरण
- प्रस्ताव पारितकर्ता: दिल्ली उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन (DHCBA) – कार्यकारी समिति
- हस्ताक्षरकर्ता: वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन (अध्यक्ष) एवं विक्रम सिंह पंवार (मानद सचिव)
- संबंधित कानून एवं संशोधन:
- केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 (CMVR, 1989) में चालान निस्तारण संबंधी 2026 के नवीनतम संशोधन
- मोटर वाहन अधिनियम, 1988 (Motor Vehicles Act, 1988) की धारा 208 (चालान का संक्षेप विचारण)
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 229 / पूर्ववर्ती CrPC धारा 206 (विशेष समन एवं छोटे अपराधों में प्रक्रिया)
- संवैधानिक उल्लंघन के आधार:
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 14 (मनमानेपन के विरुद्ध संरक्षण), अनुच्छेद 21 (न्याय तक निष्पक्ष व सुलभ पहुंच का अधिकार) एवं अनुच्छेद 50 (कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- अनिता कुशवाहा बनाम पुष्पा सदन (2016, सुप्रीम कोर्ट संविधान पीठ) — ‘सुलभ, निष्पक्ष और बिना किसी अनुचित वित्तीय बाधा के न्याय प्राप्त करना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है।’
- मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) — ‘प्रशासनिक प्रक्रियाओं को न्यायसंगत, निष्पक्ष और तार्किक (Just, Fair and Reasonable) होना अनिवार्य है; प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करने वाले नियम शून्य हैं।’
- प्रस्ताव तिथि: 23 सितंबर 2026
Traffic Challan:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित संस्था | दिल्ली हाईकोर्ट बार एसोसिएशन (DHCBA) |
| अध्यक्ष एवं सचिव | एन. हरिहरन (अध्यक्ष) एवं विक्रम सिंह पंवार (सचिव) |
| मुख्य मुद्दा | केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 में ट्रैफिक चालान के निपटारे से जुड़े नए संशोधन |
| प्रमुख चिंताएं | विभागीय अधिकारियों द्वारा सुनवाई, 50% पूर्व-जमा (Pre-deposit) शर्त, 45 दिनों की समय सीमा |

