सुनवाई के दौरान कोर्ट में हुई बहस
- ‘रात के 2 बजे तक फैसले लिखने को मजबूर’:न्यायाधीश गुप्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने अदालत को बताया कि गुप्ता राज्य के सबसे वरिष्ठ जिला न्यायाधीश हैं। इसके बावजूद उन्हें बिना किसी स्टेनोग्राफर और दफ्तर के काम करना पड़ रहा है, जिससे उन्हें देर रात 2 बजे तक बैठकर स्वयं फैसले टाइप करने पड़ रहे हैं।
- सुप्रीम कोर्ट की सलाह:CJI सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि राजस्थान हाईकोर्ट में हाल ही में नए मुख्य न्यायाधीश ने पदभार ग्रहण किया है। इसलिए उचित होगा कि जज अपनी शिकायतों और सुविधाओं की मांग को लेकर सीधे राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष अपनी बात रखें।
- याचिका वापस लेने की अनुमति:वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने सुप्रीम कोर्ट से अपनी यह टिप्पणी आदेश में दर्ज करने और याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी ताकि वे हाईकोर्ट के समक्ष जल्द से जल्द राहत के लिए आवेदन कर सकें। सुप्रीम कोर्ट ने इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान के सबसे वरिष्ठ जिला न्यायाधीश और वर्तमान में लेबर कोर्ट-सह-औद्योगिक न्यायाधिकरण (Labour Court-cum-Industrial Tribunal) के पीठासीन अधिकारी के रूप में कार्यरत दिनेश कुमार गुप्ता की उस याचिका पर सुनवाई की, जिसमें उन्होंने अपनी सेवानिवृत्ति से ठीक चार दिन पहले कार्यालयीन बुनियादी सुविधाओं (Basic Facilities) के पूर्ण अभाव का मुद्दा उठाया था।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने मामले पर विचार करते हुए सुझाव दिया कि चूंकि राजस्थान हाईकोर्ट में हाल ही में नए मुख्य न्यायाधीश ने कार्यभार संभाला है, इसलिए याचिकाकर्ता अपनी सभी शिकायतों और बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर सीधे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष औपचारिक अभ्यावेदन (Representation) प्रस्तुत करें। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने अदालत को बताया कि राज्य के वरिष्ठतम जिला जज होने के बावजूद उन्हें स्टेनोग्राफर और कार्यालय जैसी बुनियादी सुविधाएं तक प्रदान नहीं की गई हैं, जिसके कारण उन्हें रात के 2 बजे तक बैठकर खुद अपने फैसले लिखने पड़ रहे हैं।
सुनवाई के दौरान मुख्य बातें और अदालती कार्यवाही
1. ‘रात 2 बजे तक फैसले लिखने को विवश हैं वरिष्ठतम जिला जज’
- वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने अदालत के समक्ष न्यायिक अधिकारी की दयनीय कार्य-स्थितियों को रखते हुए कहा कि याचिकाकर्ता राज्य के वरिष्ठतम जिला न्यायाधीश हैं, परंतु उन्हें बुनियादी प्रशासनिक स्टाफ (स्टेनोग्राफर) और दफ्तर जैसी सुविधाएं भी मयस्सर नहीं कराई गई हैं।
- श्री सिंह ने पीठ को बताया:“वह (याचिकाकर्ता) अभी भी रात के 2 बजे तक जागकर खुद अपने फैसले लिख रहे हैं।”
2. CJI की सलाह और याचिका की वापसी
- मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्थिति पर संज्ञान लेते हुए कहा कि राजस्थान उच्च न्यायालय में नए मुख्य न्यायाधीश ने अभी हाल ही में कार्यभार संभाला है। ऐसे में याचिकाकर्ता को अपनी सभी प्रशासनिक और बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी शिकायतों के साथ हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष जाना चाहिए।
- इसके बाद याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत से अनुरोध किया कि उन्हें याचिका वापस लेने की अनुमति दी जाए ताकि वे संबंधित सक्षम प्राधिकारी (राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश) के समक्ष अपनी मांगें रखकर उनके त्वरित निस्तारण का आग्रह कर सकें।
- सीजेआई ने इस अनुरोध को स्वीकार कर लिया और याचिका को स्वतंत्रता के साथ वापस ली गई के रूप में निस्तारित (Dismissed as withdrawn with liberty) कर दिया।
मूल विवाद और जनवरी 2026 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश की पृष्ठभूमि
यह मामला असल में एक अवमानना याचिका (Contempt Petition) के रूप में दायर किया गया था, जिसे दिनेश कुमार गुप्ता ने राजस्थान हाईकोर्ट की रजिस्ट्रार जनरल चंचल मिश्रा के खिलाफ दाखिल किया था।
- उत्पीड़न और मनमाने तबादले का आरोप: याचिकाकर्ता ने पूर्व में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाकर आरोप लगाया था कि उन्हें लक्षित (Targeted) किया जा रहा है और लागू स्थानांतरण नीति का उल्लंघन करते हुए बार-बार उनका तबादला किया गया है। उनकी जयपुर लेबर कोर्ट में की गई पोस्टिंग उनके प्रधान जिला न्यायाधीश (Principal District Judge) के रैंक के अनुरूप नहीं थी।
- सुप्रीम कोर्ट का 29 जनवरी 2026 का ऐतिहासिक आदेश: शीर्ष अदालत ने जनवरी 2026 में अपने आदेश में स्पष्ट निर्देश दिए थे कि:
- याचिकाकर्ता की मूल पद-स्थिति (Substantive Rank) प्रधान जिला न्यायाधीश की बनी रहेगी।
- लेबर कोर्ट-सह-औद्योगिक न्यायाधिकरण में कार्यरत रहने के दौरान भी वे प्रधान जिला न्यायाधीश को मिलने वाले सभी भत्तों और वेतन के हकदार होंगे।
- याचिकाकर्ता किसी भी कनिष्ठ अधिकारी और/या जिला जज को रिपोर्ट नहीं करेंगे। उनका प्रशासनिक नियंत्रण सीधे तौर पर उस सत्र संभाग के प्रशासनिक/पोर्टफोलियो जज के अधीन होगा जिसके अधिकार क्षेत्र में लेबर कोर्ट स्थित है।
यही अवमानना याचिका जब बुनियादी सुविधाओं की कमी और कथित प्रशासनिक असहयोग के मुद्दों के साथ सुनवाई पर आई, तो अदालत ने न्यायिक अनुशासन और संस्थागत पदानुक्रम को ध्यान में रखते हुए याचिकाकर्ता को राजस्थान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष अपनी प्रशासनिक शिकायतें रखने की स्वतंत्रता दी।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: दिनेश कुमार गुप्ता बनाम चंचल मिश्रा (रजिस्ट्रार जनरल, राजस्थान हाईकोर्ट) [अवमानना याचिका (सिविल) – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (न्यायिक अधिकारी दिनेश गुप्ता) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह
- प्रासंगिक संवैधानिक व सेवा नियम:
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 142 एवं अनुच्छेद 136 (सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना और न्याय का क्षेत्राधिकार)
- राजस्थान न्यायिक सेवा नियम (RJS Rules) — जिला न्यायाधीशों की कार्यदशाएं और प्रशासनिक नियंत्रण
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 235 (राज्य में अधीनस्थ न्यायसंगत अदालतों पर उच्च न्यायालय का नियंत्रण)
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना (सर्वोच्च न्यायालय)
- अंतिम निर्णय: याचिकाकर्ता को राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष अभ्यावेदन देने की स्वतंत्रता देते हुए याचिका वापस ली गई के रूप में निस्तारित की गई।
Facility In Court:मामले का विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ के न्यायाधीश | CJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची, न्यायमूर्ति वी. मोहाना |
| याचिकाकर्ता | दिनेश कुमार गुप्ता (प्रधान जिला न्यायाधीश, राजस्थान उच्च न्यायिक सेवा) |
| प्रतिवादी | चंचल मिश्रा (रजिस्ट्रार जनरल, राजस्थान उच्च न्यायालय) |
| मुख्य शिकायत | कोर्ट में स्टेनो, कार्यालय व बुनियादी सुविधाओं का न होना; जनवरी 2026 के SC आदेश का पालन न होना |

