मुख्य संकेतक और सुनवाई के बिंदु (Key Highlights)
- मेटा की ओर से दी गई दलील:मेटा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने स्पष्ट किया कि मेटा ने शिकायत वाले सभी URL (फेसबुक पोस्ट्स) को पहले ही हटा दिया है। उन्होंने तर्क दिया:“मुझे फैसले से कोई शिकायत नहीं है, मैंने संबंधित URL हटा दिए हैं। लेकिन मैं फेसबुक हूँ, कोई Google जैसा सर्च इंजन नहीं… इसलिए नाम के आधार पर सर्च डी-इंडेक्स करने के निर्देश मुझ पर लागू नहीं होने चाहिए।”
- पीठ की हल्की टिप्पणी:सुनवाई के दौरान जस्टिस हरिशंकर ने हल्के-फुल्के अंदाज में टिप्पणी करते हुए कहा:“अब फेसबुक का इस्तेमाल कौन करता है; आप पुराने हो चुके हैं। रोहतगी जी, आप कभी पुराने नहीं होंगे, लेकिन फेसबुक पुराना हो चुका है।”
- अदालत का स्पष्टीकरण:अदालत ने स्वीकार किया कि सर्च रिजल्ट्स और न्यायिक रिकॉर्ड्स को डी-इंडेक्स करने के निर्देश फेसबुक/मेटा के संदर्भ में अप्रासंगिक हैं। विरोधी पक्षों द्वारा भी इस पर कोई आपत्ति न जताए जाने के बाद कोर्ट ने मेटा की याचिका का निपटारा कर दिया।
- 29 मई का मूल फैसला (‘Right to be Forgotten’):
- जस्टिस सचिन दत्ता की एकल पीठ ने अनुच्छेद 21 के तहत निजता के अधिकार (Right to Privacy) के हिस्से के रूप में ‘भूल जाने के अधिकार’ को मान्यता दी थी।
- कोर्ट ने Google जैसे सर्च इंजनों और Indian Kanoon जैसे लीगल डेटाबेस को आदेश दिया था कि वे अदालती फैसलों में से याचिकाकर्ताओं के व्यक्तिगत नाम और पहचान छिपाएं और नाम-आधारित खोजों (Name-based Search) को ब्लॉक/डी-इंडेक्स करें।
- हालांकि, केस नंबर, तारीख और साइटेशन के जरिए फैसलों की सार्वजनिक उपलब्धता बनी रहेगी।
नई दिल्ली: इंटरनेट और डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर ‘भूल जाने के अधिकार’ (Right to be Forgotten), सर्च इंजन प्रदाताओं के दायित्वों और सोशल मीडिया मध्यवर्तियों (Intermediaries) की तकनीकी सीमाओं पर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक स्पष्ट और व्यावहारिक आदेश जारी किया है।
न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर और न्यायमूर्ति निवेदिता अनिल शर्मा की खंडपीठ ने मेटा की ओर से दायर स्पष्टीकरण याचिका का निस्तारण करते हुए यह आदेश पारित किया। सुनवाई के दौरान जब मेटा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि फेसबुक कोई सर्च इंजन नहीं है और वह पहले ही आपत्तिजनक यूआरएल (URLs) हटा चुका है, तो पीठ ने हल्के-फुल्के अंदाज में टिप्पणी करते हुए कहा कि फेसबुक अब पुराना (Outdated) हो चुका है और लोग अब इसका ज्यादा इस्तेमाल नहीं करते। उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि 29 मई के एकल पीठ के उस फैसले में दिए गए निर्देश, जिसके तहत सर्च इंजनों को न्यायिक फैसलों और अदालती आदेशों को नाम-आधारित खोज परिणामों (Name-based search results) से डी-इंडेक्स (De-index) और निष्क्रिय करने का आदेश दिया गया था, मेटा प्लेटफॉर्म्स (Meta Platforms – Facebook) पर लागू नहीं होते हैं।
उच्च न्यायालय के प्रमुख अवलोकन एवं कानूनी स्पष्टीकरण
1. सर्च इंजन बनाम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म (तकनीकी अंतर):
- मेटा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने खंडपीठ के समक्ष स्पष्ट किया कि फेसबुक एक सर्च इंजन (जैसे Google, Yahoo या Bing) के रूप में कार्य नहीं करता है, इसलिए वह वेब-व्यापी डी-इंडेक्सिंग (De-indexing) के निर्देशों का पालन करने में तकनीकी रूप से सक्षम नहीं है:“हमें 29 मई के मूल निर्णय से कोई शिकायत नहीं है। हमने शिकायत से जुड़े यूआरएल को अपने प्लेटफॉर्म से हटा दिया है। हम फेसबुक हैं, सर्च इंजन नहीं। मूल निर्णय का दायरा अत्यधिक व्यापक था। हम केवल यह स्पष्टीकरण चाहते हैं कि यूआरएल हटाने के बाद हमारे ऊपर डी-इंडेक्सिंग का कोई अन्य दायित्व लागू नहीं होता।”
- खंडपीठ ने इस तकनीकी तथ्य को स्वीकार किया कि न्यायिक रिकॉर्ड के डी-इंडेक्सिंग संबंधी निर्देश केवल वेब सर्च इंजनों और कानूनी डेटाबेसों के लिए प्रासंगिक थे, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए नहीं।
2. अदालत की रोचक मौखिक टिप्पणी:
- सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर ने वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी से हल्के-फुल्के अंदाज में कहा:“अब कोई आपका (फेसबुक का) उपयोग नहीं करता; आप (फेसबुक) अब आउटडेटेड हो चुके हैं। आप (रोहतगी) कभी आउटडेटेड नहीं होंगे, लेकिन फेसबुक अब पुराना पड़ चुका है।”
3. विपक्षी पक्षकारों की गैर-आपत्ति:
- खंडपीठ ने दर्ज किया कि मामले के मूल याचिकाकर्ताओं और विपक्षी पक्षों ने मेटा के इस स्पष्टीकरण पर कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई।
- अतः अदालत ने औपचारिक रूप से दर्ज किया कि 29 मई 2026 के एकल पीठ के आदेश में निहित डी-इंडेक्सिंग और नाम-आधारित खोज निष्क्रिय करने के निर्देश मेटा/फेसबुक पर लागू नहीं होते हैं।
29 मई 2026 का मूल ऐतिहासिक फैसला: ‘राइट टू बी फॉरगॉटन’ का ढांचा
दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सचिन दत्ता की एकल पीठ ने 29 मई 2026 को याचिकाओं के एक समूह पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया था, जिसमें आपराधिक व दीवानी मामलों से बरी हो चुके वादियों ने अपने व्यक्तिगत विवरणों और मुकदमों की ऑनलाइन रिपोर्टिंग को हटाने की गुहार लगाई थी:
- अनुच्छेद 21 के तहत निजता का अंग:
- एकल पीठ ने माना था कि ‘भूल जाने का अधिकार’ (Right to be Forgotten) भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत निजता के मौलिक अधिकार का एक अभिन्न अंग है।
- मास्किंग और एनोनिमाइजेशन (Masking & Anonymisation):
- अदालत ने न्यायिक आदेशों से पक्षकारों के नाम और व्यक्तिगत पहचानकर्ताओं (Personal Identifiers) को छिपाने/मास्क करने की रूपरेखा तैयार की थी, जबकि फैसले के कानूनी सिद्धांत, अनुपात और निष्कर्ष सार्वजनिक रूप से सुलभ रखे जाने थे।
- सर्च इंजनों और लीगल पोर्टलों को निर्देश:
- अदालत ने Google और अन्य सर्च इंजनों को निर्देश दिया था कि वे ऐसे मामलों में नाम-आधारित खोज परिणामों को डी-इंडेक्स करें।
- इसके अलावा कानूनी डेटाबेस पोर्टल ‘इंडियन कानून’ (Indian Kanoon) को भी निर्देश दिया गया था कि वह नाम-आधारित खोजों को प्रतिबंधित करे, यद्यपि साइटेशन, केस नंबर और तिथि के आधार पर फैसलों तक पहुंच की अनुमति दी गई थी (इंडियन कानून ने इस आदेश के खिलाफ खंडपीठ में अपील दायर की है, जो अभी विचाराधीन है)।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: मेटा प्लेटफॉर्म्स बनाम मिस्टर एक्स व अन्य [अपील / विविध आवेदन – दिल्ली उच्च न्यायालय]
- मूल निर्णय संदर्भ: मिस्टर एक्स बनाम भारत संघ व अन्य [29 मई 2026 फैसला – न्यायमूर्ति सचिन दत्ता]
- पीठ: न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर और न्यायमूर्ति निवेदिता अनिल शर्मा (खंडपीठ)
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- मेटा प्लेटफॉर्म्स (Meta Platforms) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी, वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक रेड्डी (शार्दुल अमरचंद मंगलदास टीम: अधिवक्ता वरुण पाठक, अमी राणा, यश करुणाकरण, सना बन्याल, विशेष शर्मा, प्रसिद्धि अग्रवाल, रवि शंकर पांडे एवं शिवम चौधरी)
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act, 2000) की धारा 79 (मध्यवर्तियों का सुरक्षित आश्रय / Safe Harbour Protection for Intermediaries)
- सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियमावली, 2021
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 (प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता और निजता का अधिकार – Right to Privacy)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (2017, सुप्रीम कोर्ट 9-जज संविधान पीठ) — ‘निजता एक मौलिक अधिकार है जिसमें सूचनात्मक निजता (Informational Privacy) और स्वयं के डेटा पर नियंत्रण का अधिकार शामिल है।’
- गूगल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड बनाम विशाखा इंडस्ट्रीज (सुप्रीम कोर्ट) — ‘सर्च इंजन और वेब होस्टिंग प्लेटफॉर्मों के मध्यवर्ती दायित्वों में स्पष्ट अंतर होता है।’
- अंतिम निर्णय: मेटा की याचिका का निस्तारण; 29 मई के डी-इंडेक्सिंग संबंधी अदालती निर्देश मेटा/फेसबुक पर लागू न होने की विधिक पुष्टि।
Meta Platforms: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति सी. हरिशंकर एवं न्यायमूर्ति निवेदिता अनिल शर्मा |
| याचिकाकर्ता | मेटा प्लेटफॉर्म्स इंक (Meta Platforms) |
| मुख्य मुद्दा | क्या 29 मई 2026 के ‘Right to be Forgotten’ फैसले के डी-इंडेक्सिंग निर्देश फेसबुक/मेटा पर लागू होते हैं? |
| अदालत का फैसला | याचिका स्वीकार; मेटा/फेसबुक को नाम-आधारित डी-इंडेक्सिंग निर्देशों से छूट दी गई। |

