At A Glance | एक नजर में
- अदालत का निर्देश: दिल्ली हाईकोर्ट (जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस दिनेश भट्ट की पीठ) ने 29 सितंबर के अपने आदेश में कहा कि जज द्वारा लिखा गया संदेश दो हफ्तों के भीतर बच्ची या उसके परिवार को दिया जाए।
- ट्रायल कोर्ट का फैसला: साकेत/ट्रायल कोर्ट की जज रजनी रंगा ने 20 मई 2026 को आरोपी को POCSO एक्ट के तहत दोषी ठहराया था और 11 जुलाई को उसे अंतिम सांस तक कठोर उम्रकैद और 1 लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।
- मुआवजा राशि: अदालत ने बच्ची के पुनर्वास के लिए ₹10.5 लाख का मुआवजा भी तय किया है।
- सजा पर रोक से इनकार: दिल्ली हाईकोर्ट ने दोषी की सजा को निलंबित (Suspend) करने की याचिका खारिज कर दी है और मामले की अगली सुनवाई 20 जनवरी 2027 तय की है।
नई दिल्ली: यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) के तहत न्याय वितरण प्रणाली की मानवीय संवेदनशीलता, बाल पीड़ितों के मानसिक पुनर्वास (Trauma Healing) और न्यायिक सहानुभूति का एक अभूतपूर्व और अत्यंत भावुक उदाहरण देश की राजधानी में सामने आया है।
न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह और न्यायमूर्ति दिनेश भट्ट की खंडपीठ ने दोषी की दोषसिद्धि को चुनौती देने वाली और उम्रकैद की सजा को निलंबित (Suspension of Sentence) करने की मांग वाली अपील पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया। उच्च न्यायालय ने जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) के सचिव को आदेश दिया है कि वे निचली अदालत के इस भावुक पत्र का प्रिंटआउट लेकर, अदालत द्वारा निर्धारित ₹10.5 लाख के अंतिम मुआवजे के साथ, दो सप्ताह के भीतर पीड़िता या उसके परिजनों को व्यक्तिगत रूप से सौंपें। इसके साथ ही खंडपीठ ने फॉरेंसिक व अन्य ठोस साक्ष्यों के मद्देनजर दोषी की सजा निलंबित करने से साफ इनकार कर दिया। दिल्ली की एक विशेष पोक्सो अदालत की न्यायाधीश द्वारा 7 वर्ष की उम्र में गंभीर यौन उत्पीड़न की शिकार हुई बच्ची को फैसले के साथ लिखे गए एक प्रेरक व्यक्तिगत पत्र को दिल्ली उच्च न्यायालय ने “प्रोत्साहन और संबल का संदेश” (Message of Encouragement) करार दिया है।
निचली अदालत की विशेष जज रजनी रंगा का भावुक पत्र: ‘बेटा, इस अदालत ने तुम्हारी आवाज सुनी’

तीस हजारी/रोहिणी कोर्ट की विशेष पॉक्सो न्यायाधीश रजनी रंगा ने 20 मई 2026 को अभियुक्त को दोषी ठहराते हुए अपने मूल निर्णय के अंत में पीड़िता के नाम एक अत्यंत भावुक पत्र दर्ज किया था। पत्र के मुख्य अंश इस प्रकार हैं:
“बेटा, इस अदालत ने तुम्हारी बात सुनी (Beta, this Court heard you)। आज इस अदालत ने आदेश दिया है कि जिस आदमी को तुम ‘अंकल’ कहती थीं, वह अब कभी आजाद होकर बाहर नहीं घूम सकेगा। यद्यपि यह अदालत तुम्हारा खोया हुआ बचपन तुम्हें वापस नहीं लौटा सकती, परंतु तुम इस अदालत द्वारा देखी गई अब तक की सबसे बहादुर नन्हीं बच्ची हो (You are the bravest little girl this Court has ever seen)। तुम अदालत आईं, तुमने उस आदमी की तरफ उंगली उठाकर पहचान की जिसने तुम्हें चोट पहुंचाई थी, और तुमने पूरी निडरता से केवल सच कहा…अब, बेटा, अपनी जिंदगी पूरी आजादी से जियो। स्कूल जाओ, नए दोस्त बनाओ। खुलकर हंसो। खेलो। बड़े-बड़े सपने देखो। यह अदालत तुम्हारे अदम्य साहस को हमेशा याद रखेगी।”
दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्देश एवं सजा निलंबन पर फैसला
1. DLSA सचिव को पत्र और मुआवजा सौंपने का आदेश: न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह और न्यायमूर्ति दिनेश भट्ट की खंडपीठ ने 29 सितंबर 2026 को पारित अपने आदेश में कहा:
“इस मामले की घटना 23 जुलाई 2023 की है, जब पीड़िता की उम्र मात्र 7 वर्ष थी। अब पीड़िता लगभग 10 वर्ष की हो चुकी होगी। ट्रायल कोर्ट का उसके लिए यह संदेश वास्तव में एक संबल और प्रोत्साहन का संदेश (Message of Encouragement) है। इसलिए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) के सचिव को निर्देश दिया जाता है कि वे फैसले में उद्धृत इस संदेश का प्रिंट निकालें और इस आदेश के दो सप्ताह के भीतर पीड़िता या उसके परिवार के सदस्यों को, स्वीकृत मुआवजे के साथ, व्यक्तिगत रूप से सौंपना सुनिश्चित करें।”
2. उम्रकैद की सजा निलंबित करने से इंकार:
- अपीलकर्ता/दोषी ने अपनी दोषसिद्धि के खिलाफ अपील के लंबित रहने के दौरान कारावास की सजा को निलंबित कर अंतरिम जमानत की प्रार्थना की थी।
- खंडपीठ ने मामले के फॉरेंसिक साक्ष्यों (DNA/Forensic Evidence), चिकित्सकीय रिपोर्टों और 10 वर्षीय बच्ची के सुसंगत बयानों का संज्ञान लेते हुए कहा कि अपराध की वीभत्स प्रकृति और ठोस साक्ष्यों को देखते हुए अदालत इस चरण पर सजा को निलंबित करने की कतई इच्छुक नहीं है।
3. जेल रिकॉर्ड और आपराधिक इतिहास का तलब होना:
- अदालत ने जेल प्रशासन से दोषी के जेल में बिताए गए समय, उसके आचरण और स्वास्थ्य से जुड़े सभी आधिकारिक रिकॉर्ड मंगवाए हैं।
- दोषी को अपने पिछले सभी आपराधिक इतिहास (Past Criminal Antecedents) का ब्योरा देते हुए एक औपचारिक हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया गया है।
- मामले की अगली नियमित सुनवाई 20 जनवरी 2027 को तय की गई है।
मामले की तथ्यात्मक एवं न्यायिक पृष्ठभूमि
- घटना की तारीख: 23 जुलाई 2023 को मात्र 7 वर्ष की मासूम बच्ची के साथ उसके पड़ोस/परिचित में रहने वाले एक व्यक्ति (जिसे बच्ची ‘अंकल’ कहती थी) ने गंभीर प्रवेशन लैंगिक हमला (Aggravated Penetrative Sexual Assault) किया और किसी को बताने पर जान से मारने की आपराधिक धमकी (Criminal Intimidation) दी।
- दोषसिद्धि (20 मई 2026): विशेष पॉक्सो कोर्ट की न्यायाधीश रजनी रंगा ने त्वरित विचारण के बाद अभियुक्त को पॉक्सो अधिनियम की धारा 6 एवं भारतीय दंड संहिता की धारा 506 के तहत दोषी करार दिया।
- सजा का निर्धारण (11 जुलाई 2026): अदालत ने दोषी को “प्राकृतिक जीवन के अंत तक कठोर आजीवन कारावास” (Rigorous Imprisonment for Life) और ₹1 लाख के अर्थदंड से दंडित किया।
- पीड़ित क्षतिपूर्ति: ट्रायल कोर्ट ने बच्ची के दीर्घकालिक शारीरिक, मनोवैज्ञानिक पुनर्वास और शिक्षा के लिए ₹10.5 लाख का अंतिम मुआवजा स्वीकृत किया, जिसे दिल्ली राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (DSLSA) के माध्यम से वितरित किया जाना है।
विधिक एवं मानवीय निहितार्थ: चाइल्ड-फ्रेंडली न्यायशास्त्र
- बाल-सुलभ न्याय और पुनर्वास (Child-Friendly Jurisprudence):
- पॉक्सो अधिनियम केवल दंडात्मक कानून नहीं है, बल्कि इसका मुख्य उद्देश्य पीड़ित बच्चे को न्यायिक प्रक्रिया के दौरान होने वाले ‘पुनः आघात’ (Secondary Victimization) से बचाना है।
- एक न्यायिक अधिकारी द्वारा सीधे बच्चे से संवाद कर उसके साहस को मान्यता देना विधिक इतिहास में एक अनुकरणीय मिसाल है, जो यह दर्शाता है कि अदालतें केवल शुष्क विधिक मंच नहीं बल्कि संवेदनशील न्याय की संरक्षक हैं।
- मुआवजा और संस्थागत संबल:
- पॉक्सो कानून की धारा 33(8) और नालसा (NALSA) की पीड़ित क्षतिपूर्ति योजना के तहत ₹10.5 लाख की वित्तीय सहायता बच्ची की चिकित्सा, परामर्श (Counseling) और स्कूली शिक्षा की निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य कदम है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: दोषी बनाम राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली) [आपराधिक अपील – दिल्ली उच्च न्यायालय]
- निचली अदालत का संदर्भ: राज्य बनाम अभियुक्त [विशेष पॉक्सो वाद – विशेष न्यायाधीश (POCSO) रजनी रंगा, दिल्ली]
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act, 2012):
- धारा 5(m) सहपठित धारा 6 (गंभीर प्रवेशन लैंगिक हमले हेतु कठोर आजीवन कारावास)
- धारा 33(8) (विशेष न्यायालय द्वारा अंतरिम व अंतिम मुआवजा निर्धारित करने की शक्ति)
- धारा 39 एवं 40 (बच्चे के पुनर्वास, परामर्श और बाल-सुलभ वातावरण की अनिवार्यता)
- भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 506 (आपराधिक धमकी)
- दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 389 (अपील लंबित रहने के दौरान सजा के निलंबन का प्रावधान)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन, स्वास्थ्य और पीड़ितों के मौलिक अधिकारों का संरक्षण)
- लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act, 2012):
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- निपुण सक्सेना बनाम भारत संघ (2019, सुप्रीम कोर्ट) — ‘पॉक्सो और बलात्कार पीड़ितों की पहचान की गोपनीयता बनाए रखना अनिवार्य है; न्यायिक प्रणाली को बाल पीड़ितों के मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य और पुनर्वास को प्राथमिकता देनी होगी।’
- अतुल राव बनाम कर्नाटक राज्य (सुप्रीम कोर्ट) — ‘जघन्य अपराधों और पॉक्सो के मामलों में सजा के निलंबन (धारा 389 CrPC) पर विचार करते समय अदालत को अपराध की गंभीरता और समाज पर उसके प्रभाव को देखना चाहिए।’
- पीठ: न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह और न्यायमूर्ति दिनेश भट्ट (दिल्ली उच्च न्यायालय)
- अंतिम आदेश: डीएलएसए सचिव को ₹10.5 लाख के मुआवजे के साथ जज का पत्र 2 सप्ताह में बच्ची/परिवार को सौंपने का निर्देश; दोषी की सजा निलंबन याचिका खारिज; अगली सुनवाई 20 जनवरी 2027।
Judge’s Pen Note: Key Indicators | मुख्य बिंदु
| संकेत बिंदु | विवरण |
| घटना की पृष्ठभूमि | 23 जुलाई 2023 की घटना; पीड़िता की उम्र उस समय 7 वर्ष थी। |
| पत्र लिखने वाली जज | विचारण न्यायालय (Trial Court) की न्यायाधीश रजनी रंगा (20 मई के फैसले में शामिल संदेश)। |
| हाईकोर्ट पीठ | जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस दिनेश भट्ट |
| फैसले में संदेश की पंक्तियां | “बेटा, इस कोर्ट ने तुम्हारी बात सुनी… जिस व्यक्ति को तुम ‘अंकल’ कहती थीं, वह अब कभी बाहर नहीं आ पाएगा।” |
| न्यायालय का रुख | हाईकोर्ट ने माना कि ऐसे संदेश बच्चों में न्याय प्रणाली के प्रति विश्वास और जीवन में आगे बढ़ने का साहस जगाते हैं। |

