Thursday, October 1, 2026
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Junior Lawyers: शुरुआती दिनों में जब जूनियर वकीलों के पास अपना काम नहीं होता, तो वे रोजमर्रा और आने-जाने का खर्च कैसे चलाएंगे?; सीनियर्स का काम करने पर वजीफा मिलना उनका हक है

अदालत की मुख्य टिप्पणियां एवं निर्देश

  1. BCI सर्कुलर (15 अक्टूबर 2024) का उल्लेख:न्यायमूर्ति धगट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के 15 अक्टूबर 2024 के सर्कुलर का संदर्भ दिया, जिसमें नामांकन (Enrolment) की तारीख से कम से कम 3 वर्षों के लिए शहरी क्षेत्रों में ₹20,000 और ग्रामीण क्षेत्रों में ₹15,000 मासिक न्यूनतम स्टाइपेंड की सिफारिश की गई है।
  2. 6 महीने के भीतर गाइडलाइंस बनाने का आदेश:हाईकोर्ट ने कहा कि यद्यपि BCI का सर्कुलर केवल अनुशंसित (Recommendatory) प्रकृति का है, लेकिन एक नियामक संस्था (Regulatory Body) होने के नाते मध्य प्रदेश स्टेट बार काउंसिल की यह जिम्मेदारी है कि वह इसे जमीन पर लागू करे। कोर्ट ने निर्देश दिया कि:“स्टेट बार काउंसिल, हाईकोर्ट बार एसोसिएशन और हाईकोर्ट एडवोकेट्स बार एसोसिएशन से परामर्श करके 6 महीने की समय सीमा के भीतर राज्य के शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए जूनियर वकीलों के न्यूनतम स्टाइपेंड से जुड़ी दिशानिर्देश नियमावली (Guidelines) तैयार करे।”
  3. संबंधित सीनियर वकीलों के खिलाफ जांच का आदेश:पीठ ने स्टेट बार काउंसिल को यह जांच करने का भी निर्देश दिया कि मामले से जुड़े संबंधित वरिष्ठ वकील अपनी जूनियर counsel को स्टाइपेंड क्यों नहीं दे रहे थे।
  4. शुरुआती दौर में वित्तीय सुरक्षा जरूरी: हाईकोर्ट ने कहा कि प्रैक्टिस के शुरुआती दिनों में जब जूनियर वकीलों के पास अपना व्यक्तिगत काम नहीं होता, तब अपने सीनियरों के मुकदमों पर काम करने के बदले उन्हें स्टाइपेंड मिलना चाहिए ताकि वे अपने सीखने के शुरुआती चरण में दिन-प्रतिदिन के खर्च और आने-जाने का किराया वहन कर सकें।

जबलपुर: विधिक पेशे में नए प्रवेश करने वाले युवा और कनिष्ठ अधिवक्ताओं (Junior Lawyers) के आर्थिक शोषण, न्यूनतम वित्तीय सुरक्षा के अभाव और वरिष्ठ वकीलों द्वारा बिना स्टाइपेंड के काम कराने की परिपाटी पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कड़ा और ऐतिहासिक रुख अपनाया है।

6 महीने की सख्त समय-सीमा के भीतर कार्रवाई करने के दिए निर्देश

न्यायमूर्ति विशाल धगट की एकल पीठ ने मध्य प्रदेश राज्य बार काउंसिल (MP State Bar Council) को कड़ा निर्देश दिया है कि वह मध्य प्रदेश हाईकोर्ट बार एसोसिएशन और हाईकोर्ट एडवोकेट्स बार एसोसिएशन से औपचारिक परामर्श कर 6 महीने की सख्त समय-सीमा के भीतर शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों के लिए कनिष्ठ अधिवक्ताओं हेतु न्यूनतम स्टाइपेंड निर्धारित करने वाली विस्तृत गाइडलाइंस (Guidelines) तैयार करे और उन्हें कड़ाई से लागू कराए। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट व्यवस्था दी है कि नियामक संस्था होने के नाते बार काउंसिल का यह प्राथमिक और अनिवार्य दायित्व है कि वह जूनियर वकीलों को सम्मानजनक जीवन स्तर बनाए रखने और परिवहन खर्च वहन करने हेतु अनिवार्य स्टाइपेंड (Stipend) सुनिश्चित करे।

अदालत के समक्ष कैसे उठा मामला: कोर्ट रूम में हुआ बड़ा खुलासा

यह ऐतिहासिक आदेश एक नियमित रिट याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आए अप्रत्याशित घटनाक्रम से निकला:

  • बहस करने वाले वकील की अनुपस्थिति: याचिकाकर्ता की ओर से पेश एक कनिष्ठ महिला अधिवक्ता ने पीठ के समक्ष स्थगन (Adjournment) की प्रार्थना करते हुए कहा कि मुख्य बहस करने वाले वरिष्ठ वकील उपलब्ध नहीं हैं।
  • अदालत का सीधा सवाल: जब न्यायमूर्ति विशाल धगट ने जूनियर वकील से उसके काम और चैंबर व्यवस्था के बारे में पूछा, तो उसने अदालत के समक्ष स्वीकार किया कि उसे इस काम के बदले कोई भी स्टाइपेंड (Stipend) नहीं मिलता है।
  • न्यायिक संज्ञान: इस खुलासे को अत्यंत गंभीरता से लेते हुए अदालत ने न केवल मामले को नीतिगत स्तर पर उठाया, बल्कि संबंधित चैंबर के उन 5 वकीलों के आचरण की जांच के आदेश भी दे दिए जिनके लिए वह कनिष्ठ वकील अदालत में पेश हो रही थी।

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उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं तीखी टिप्पणियां

1. ‘शुरुआती दिनों में सीखने और रोजमर्रा के खर्च के लिए स्टाइपेंड जरूरी’ न्यायमूर्ति विशाल धगट ने नए वकीलों की आर्थिक लाचारी को रेखांकित करते हुए दर्ज किया:

“मध्य प्रदेश राज्य बार काउंसिल, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट बार एसोसिएशन और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट एडवोकेट्स बार एसोसिएशन को उपरोक्त तथ्य का संज्ञान लेने और यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया जाता है कि सभी कनिष्ठ अधिवक्ताओं को उनके वरिष्ठ वकीलों का काम करने के बदले अनिवार्य रूप से स्टाइपेंड का भुगतान किया जाए, ताकि वे अपनी वकालत के शुरुआती दौर में—जब उनके पास अपना स्वतंत्र काम नहीं होता—सीखने के दौरान अपने दिन-प्रतिदिन के खर्चों और आने-जाने के साधनों का वहन कर सकें।”

2. बार काउंसिल की नियामक जिम्मेदारी: 6 महीने की समय-सीमा

  • अदालत ने जोर दिया कि बार काउंसिल केवल एक प्रशासनिक संस्था नहीं है, बल्कि कानूनी पेशे में आने वाले युवाओं की संरक्षक भी है:“नियामक संस्था होने के नाते स्टेट बार काउंसिल पर यह भारी दायित्व है कि वह यह देखे कि कनिष्ठ अधिवक्ताओं को उनके जीवन-यापन के खर्च और परिवहन व्यय को पूरा करने के लिए स्टाइपेंड दिया जाए। इस संबंध में मध्य प्रदेश राज्य के बार एसोसिएशनों के माध्यम से दिशा-निर्देश जारी करने के लिए छह महीने की सीमित समय-सीमा के भीतर ठोस निर्णय लिया जाए।”

3. बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के सर्कुलर का संदर्भ

  • अदालत ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) द्वारा 15 अक्टूबर 2024 को जारी किए गए ऐतिहासिक परिपत्र का विशेष उल्लेख किया।
  • बीसीआई ने अपने सर्कुलर में नामांकन (Enrolment) की तारीख से कम से कम 3 वर्ष की अवधि के लिए कनिष्ठ अधिवक्ताओं को निम्नलिखित न्यूनतम मासिक वजीफा देने की अनुशंसा की थी:
    • शहरी क्षेत्रों (Urban Areas) में: न्यूनतम ₹20,000 प्रति माह।
    • ग्रामीण क्षेत्रों (Rural Areas) में: न्यूनतम ₹15,000 प्रति माह।
  • यद्यपि बीसीआई का यह सर्कुलर अनुशंसात्मक (Recommendatory) स्वरूप का था, परंतु हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य बार काउंसिल को इसे जमीनी स्तर पर अनिवार्य और व्यावहारिक रूप में लागू करना होगा।

संबंधित वरिष्ठ वकीलों के खिलाफ जांच के आदेश

अदालत ने इस मामले में केवल नीतिगत निर्देश देकर ही इतिश्री नहीं की, बल्कि मामले में शामिल विशिष्ट अधिवक्ताओं की जवाबदेही तय करने के लिए राज्य बार काउंसिल को स्वतंत्र जांच का आदेश दिया:

  • पीठ ने मध्य प्रदेश राज्य बार काउंसिल को निर्देश दिया कि वह इस बात की औपचारिक जांच (Inquiry) करे कि अधिवक्ता:
    1. राजेश दुबे
    2. अनिरुद्ध कुमार मिश्रा
    3. चंद्रिका प्रसाद द्विवेदी
    4. धनंजय चतुर्वेदी, और
    5. नवीन कुमार पाठक उक्त कनिष्ठ महिला अधिवक्ता को स्टाइपेंड का भुगतान क्यों नहीं कर रहे थे।

विधिक एवं सामाजिक निहितार्थ: विधिक पेशे में ‘समान अवसर’ की रक्षा

  • आर्थिक बाधाएं और प्रतिभा पलायन:
    • कानूनी पेशे में पारंपरिक रूप से प्रथम पीढ़ी के वकीलों (First-Generation Lawyers) और आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आने वाले युवाओं को वर्षों तक बिना किसी मानदेय के काम करना पड़ता है, जिससे कई प्रतिभाशाली युवा पेशे को छोड़ने पर मजबूर हो जाते हैं।
  • संविधान का अनुच्छेद 21 एवं गरिमापूर्ण आजीविका:
    • सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों ने बार-बार यह दोहराया है कि गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार में सम्मानजनक आजीविका का अधिकार शामिल है। कनिष्ठ वकीलों से मुफ्त में श्रम कराना संविधान के अनुच्छेद 23 (बेगार और बंधुआ श्रम का निषेध) की मूल भावना के भी प्रतिकूल है।
  • अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के तहत बार काउंसिल का कर्तव्य:
    • अधिवक्ता अधिनियम की धारा 6 के तहत स्टेट बार काउंसिल का यह वैधानिक कर्तव्य है कि वह वकीलों के कल्याण, उनके अधिकारों और विधिक पेशे के नैतिक मानकों की सुरक्षा करे।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: विपिन पांडे बनाम रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर व अन्य [रिट याचिका – मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, मुख्य पीठ जबलपुर]
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • याचिकाकर्ता की ओर से: कनिष्ठ अधिवक्ता आयुषी मिश्रा
    • प्रतिवादी (विश्वविद्यालय) की ओर से: अधिवक्ता दिव्य कृष्ण बिलैया
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act, 1961) की धारा 6 एवं धारा 7 (राज्य बार काउंसिल एवं बीसीआई के कार्य और शक्तियां)
    • बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) का परिपत्र (Circular) दिनांक 15 अक्टूबर 2024 (कनिष्ठ वकीलों के लिए ₹20,000 व ₹15,000 न्यूनतम मासिक स्टाइपेंड की अनुशंसा)
    • भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन और आजीविका का अधिकार) सहपठित अनुच्छेद 23 (बेगार व शोषण के विरुद्ध संरक्षण)
    • प्राकृतिक न्याय एवं व्यावसायिक आचार संहिता (Standards of Professional Conduct and Etiquette under BCI Rules)
  • संबद्ध पूर्ववर्ती न्यायिक नजीरें:
    • सिमरनजीत सिंह बनाम भारत संघ व अन्य (दिल्ली हाईकोर्ट) — ‘कनिष्ठ अधिवक्ताओं को वित्तीय सुरक्षा और न्यूनतम स्टाइपेंड देने के लिए बार काउंसिल को संस्थागत ढांचा तैयार करने के निर्देश।’
    • इंदिरा जयसिंह बनाम सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया (सुप्रीम कोर्ट) — ‘विधिक पेशे में भाई-भतीजावाद समाप्त करने और युवा, पहली पीढ़ी के वकीलों को समान अवसर व पारिश्रमिक देने की वकालत।’
  • पीठ: न्यायमूर्ति विशाल धगट (मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर)
  • अंतिम निर्देश: राज्य बार काउंसिल को 6 माह के भीतर हाईकोर्ट के दोनों बार एसोसिएशनों से परामर्श कर अनिवार्य स्टाइपेंड नियमावली बनाने का आदेश; आदेश की प्रमाणित प्रति अनुपालन हेतु स्टेट बार काउंसिल और दोनों उच्च न्यायालय बार एसोसिएशनों को प्रेषित।

Junior Lawyers: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतमध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (Madhya Pradesh High Court)
पीठन्यायमूर्ति विशाल धगट (Justice Vishal Dhagat)
मुख्य निर्देशमध्य प्रदेश स्टेट बार काउंसिल 6 महीने के भीतर जूनियर वकीलों के लिए न्यूनतम स्टाइपेंड तय करने की गाइडलाइंस बनाए।
BCI सर्कुलर का संदर्भबार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) द्वारा अनुशंसित: शहरी क्षेत्रों में ₹20,000 और ग्रामीण क्षेत्रों में ₹15,000 मासिक स्टाइपेंड।
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