अदालत की मुख्य तीखी टिप्पणियां और चिंताएं
- ‘साठगांठ’ और निजी पार्टी से मार्गदर्शन पर सवाल:सुनवाई के दौरान जब ECI और TMC-D के वकीलों के बीच तालमेल देखा गया, तो न्यायमूर्ति कृष्णा राव ने कड़ी आपत्ति जताते हुए ECI के वकील से कहा:“पक्षकारों का आचरण उनके बीच साठगांठ (Connivance) का संकेत देता है। यदि चुनाव आयोग को ही किसी निजी पार्टी द्वारा निर्देशित किया जा रहा है, तो फिर क्या बचता है?! आप किसी निजी पक्षकार की सहायता नहीं ले सकते।”
- बिना कारण बताए आवंटन का मुद्दा:अदालत ने लगभग आधे घंटे तक ECI के वकील से सवाल किया कि आखिर किस आधार या लिखित कारण से तृणमूल कांग्रेस के बागी गुट (TMC-D) के दावे को स्वीकार किया गया और ISF के 17 सितंबर के आवेदन की अनदेखी की गई। कोर्ट ने कहा कि भले ही किसी अमान्यता प्राप्त दल का चुनाव चिह्न पर स्थायी कानूनी अधिकार न हो, लेकिन फैसले में स्पष्ट कारण (Reasons) होने चाहिए।
- न्यायपालिका पर अतिरिक्त बोझ:अदालत ने टिप्पणी की कि चुनाव आयोग के ऐसे विवादास्पद फैसलों के कारण ही राजनीतिक दलों को बार-बार अदालत का रुख करना पड़ता है, जिससे न्यायपालिका पर अनावश्यकत बोझ बढ़ता है।
दोनों पक्षों की कानूनी दलीलें
- ISF (याचिकाकर्ता) का तर्क:वरिष्ठ अधिवक्ता बिकाश रंजन भट्टाचार्य ने तर्क दिया कि ISF ने लोकसभा और पिछले विधानसभा चुनावों में ‘लिफाफा’ चिह्न के साथ चुनाव लड़ा था। हालांकि चुनाव आयोग के पास ‘मुक्त चिह्नों’ (Free Symbols) के आवंटन का विशेषाधिकार है, लेकिन यह अधिकार “निरंकुश या मनमाना” नहीं हो सकता। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि यदि यह आवंटन अवैध है, तो 6 अक्टूबर के उपचुनाव को कुछ समय के लिए स्थगित भी किया जा सकता है, जिससे कोई संवैधानिक संकट पैदा नहीं होगा।
- चुनाव आयोग (ECI) की सफाई:ECI के वकील जिष्णु चौधरी ने साठगांठ के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि ‘लिफाफा’ एक मुफ़्त/साझा चुनाव चिह्न (Common Symbol) था। चूंकि ISF एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त दल है, इसलिए चुनाव खत्म होते ही वह चिह्न मुक्त हो गया और ISF का उस पर कोई स्थायी अधिकार नहीं बनता। आयोग ने कहा कि चुनाव प्रक्रिया काफी आगे बढ़ चुकी है और ISF को पहले ही ‘अलमारी’ चिह्न आवंटित कर दिया गया है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा उपचुनावों के लिए चुनाव चिन्हों के आवंटन, निर्वाचन आयोग के प्रशासनिक विवेकाधिकार (Discretionary Powers) और एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता पर कलकत्ता हाईकोर्ट ने अत्यंत सख्त रुख अपनाया है।
न्यायमूर्ति कृष्णा राव की एकल पीठ ने मामले की विस्तृत सुनवाई करते हुए चुनाव आयोग के वकील से बार-बार पूछा कि एक गैर-पंजीकृत/पंजीकृत दल के दावे को स्वीकार करने और पूर्व में उसी चिन्ह पर लोकसभा व विधानसभा चुनाव लड़ चुकी पार्टी को वंचित करने का लिखित विधिक कारण (Reason) कहां है। पीठ ने दोनों पक्षों की तीखी जिरह सुनने के बाद अपना अंतिम आदेश सुरक्षित (Judgment Reserved) रख लिया है। उच्च न्यायालय ने इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) के पूर्व चुनाव चिन्ह ‘लिफाफा’ (Envelope) को छीनकर ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस-डेमोक्रेटिक (TMC-D / Democratic Trinamool Congress) को आवंटित करने की प्रक्रिया में चुनाव आयोग और निजी पार्टी के बीच कथित “मिलीभगत” (Connivance) की ओर इशारा करते हुए आयोग के आचरण पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
अदालत की तीखी मौखिक टिप्पणियां एवं न्यायिक अवलोकन
1. ‘यदि ईसीआई किसी निजी पार्टी से गाइड हो रही है, तो फिर क्या बाकी रहता है?’ सुनवाई के दौरान जब अदालत ने चुनाव आयोग और टीएमसी-डी के वकीलों के बीच परस्पर समन्वय देखा, तो न्यायमूर्ति कृष्णा राव ने आयोग के वकील को फटकार लगाते हुए कहा:“पक्षकारों का आचरण उनके बीच मिलीभगत (Connivance) को उजागर करता है। यदि भारत निर्वाचन आयोग (ECI) ही किसी निजी पक्षकार द्वारा निर्देशित (Guided) होने लगे, तो फिर व्यवस्था में क्या बचता है?! आप किसी निजी पार्टी से इस प्रकार सहायता या निर्देश नहीं ले सकते।”
चुनाव आयोग के वकील जिष्णु चौधरी द्वारा यह स्पष्टीकरण देने पर कि वे निजी प्रतिवादी से निर्देशित नहीं हो रहे हैं बल्कि वह केवल सुनवाई में लगने वाले समय के बारे में पूछ रहे थे, पीठ ने दो-टूक कहा:“अदालत के समक्ष अधिवक्ताओं और संवैधानिक प्राधिकरणों से निष्पक्ष और पारदर्शी होने की अपेक्षा की जाती है… मैं वही कह रहा हूं जो मैं यहां प्रत्यक्ष देख रहा हूं।”
2. ‘आधे घंटे से पूछ रहा हूं — कारण कहां है? (Where is the reason?)’
- अदालत ने चुनाव आयोग की निर्णय-प्रक्रिया की विसंगति पर सवाल उठाते हुए कहा कि वह लगभग आधे घंटे से लगातार यह पूछ रहे हैं कि टीएमसी गुट के दावे पर विचार करने के पीछे आयोग के पास क्या प्रशासनिक व विधिक कारण था, लेकिन रिकॉर्ड पर कोई लिखित आधार नहीं दिखाया जा सका।
- पीठ ने स्पष्ट किया कि भले ही किसी अमान्यता प्राप्त दल का चुनाव चिन्ह पर कोई निहित विधिक अधिकार न हो, परंतु किसी दावे को स्वीकार या खारिज करने के पीछे प्रशासनिक कारणों का दर्ज होना (Recording of Reasons) कानून के शासन का अनिवार्य हिस्सा है।
3. अप्रयुक्त वैधानिक प्रावधानों पर निर्भरता का विरोध
- अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि टीएमसी-डी के वकील जिस सांविधिक प्रावधान का सहारा लेकर आवंटन को सही ठहराने का प्रयास कर रहे हैं, उस प्रावधान का उल्लेख स्वयं चुनाव आयोग ने अपने विवादित आदेश में किया ही नहीं था।
दोनों पक्षों के मुख्य विधिक तर्क
1. इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) की ओर से दलीलें:
- ISF की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास रंजन भट्टाचार्य (Bikash Ranjan Bhattacharyya) ने दलील दी:
- ISF ने 2024 के लोकसभा चुनाव और 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में ‘लिफाफा’ (Envelope) चुनाव चिन्ह के तहत चुनाव लड़ा था। जनता के बीच पार्टी की पहचान इस प्रतीक से बन चुकी है।
- अचानक नंदीग्राम और रेजीनगर के आगामी उपचुनावों में इस प्रतीक को छीनकर एक नई पार्टी (TMC-D) को देना और ISF को जबरन ‘अलमारी’ (Almirah) थमा देना पूरी तरह दुर्भावनापूर्ण और बिना विवेक के प्रयोग (Non-application of mind) के किया गया कृत्य है।
- उन्होंने कहा: “चुनाव आयोग का विवेकाधिकार तर्कसंगत और उचित (Reasonably and Rationally) होना चाहिए; यह किसी तानाशाह (Autocrat) की तरह पूर्ण या निरंकुश नहीं हो सकता।”
- वरिष्ठ अधिवक्ता ने यह भी सुझाव दिया कि चूंकि यह केवल उपचुनाव है, इसलिए यदि विधिक विवाद को सुलझाने के लिए चुनाव को कुछ समय के लिए स्थगित (Deferred) भी करना पड़े, तो इससे कोई संवैधानिक संकट पैदा नहीं होगा।
2. भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की दलीलें:
- चुनाव आयोग की ओर से पेश अधिवक्ता जिष्णु चौधरी ने आयोग के फैसले का बचाव किया:
- ‘लिफाफा’ चुनाव चिन्ह एक ‘मुक्त प्रतीक’ (Free Symbol / Common Symbol) था, जो एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल होने के नाते ISF को केवल 2026 के आम विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए अस्थायी तौर पर दिया गया था।
- यह आवंटन ISF के पक्ष में भविष्य के उपचुनावों के लिए कोई स्थायी विधिक अधिकार (Vested Right) सृजित नहीं करता।
- उपचुनाव आम विधानसभा चुनाव का विस्तार (Continuation) नहीं होता।
- चिन्ह आवंटन आदेश (Election Symbols Order, 1968) के तहत प्रतीकों का आवंटन आयोग के विवेकाधिकार का विषय है, और आयोग ने कानून सम्मत प्रक्रिया के तहत टीएमसी-डी को ‘लिफाफा’ और आईएसएफ को ‘अलमारी’ आवंटित किया है।
- आयोग ने दलील दी कि ISF पहले से ही आवंटित नए चुनाव चिन्ह पर प्रचार कर रही है और यह याचिका केवल चुनाव प्रक्रिया को बाधित करने के उद्देश्य से लाई गई है।
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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि
- उपचुनाव का संदर्भ: पश्चिम बंगाल की दो हाई-प्रोफाइल विधानसभा सीटों—नंदीग्राम (Nandigram) और रेजीनगर (Rejinagar)—पर 6 अक्टूबर 2026 को उपचुनाव निर्धारित हैं।
- विवादित दल:
- इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF): पंजीकृत अमान्यता प्राप्त राजनीतिक दल, जिसका पिछला चुनाव चिन्ह ‘लिफाफा’ था।
- तृणमूल कांग्रेस-डेमोक्रेटिक (TMC-D): पूर्व तृणमूल नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाला एक गैर-पंजीकृत/नया गुट, जिसने उपचुनाव में ‘लिफाफा’ चिन्ह की मांग की थी।
- अधिसूचना का अभाव: सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने आयोग से यह भी पूछा कि ‘मुक्त प्रतीकों’ (Free Symbols) की घोषणा करने वाली उसकी आधिकारिक अधिसूचना कहां है, जिस पर आयोग ने माना कि इस संबंध में कोई अलग आदेश अधिसूचित नहीं किया गया था।
विधिक एवं संवैधानिक निहितार्थ
- चुनाव चिन्ह (आरक्षण व आवंटन) आदेश, 1968 (Election Symbols Order, 1968):
- अमान्यता प्राप्त पंजीकृत दलों को सामान्य चुनाव चिन्ह का आवंटन आयोग के विवेक पर निर्भर करता है, परंतु प्रशासनिक कानून के तहत यह विवेक मनमाना (Arbitrary) नहीं हो सकता।
- समान स्तर का अवसर (Level Playing Field) और अनुच्छेद 14:
- चुनाव आयोग का संवैधानिक दायित्व स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना है। किसी स्थापित दल के स्थापित चुनाव चिन्ह को अचानक किसी अन्य गुट को दे देने से मतदाताओं में भ्रम की स्थिति पैदा होती है, जो निष्पक्ष चुनावी प्रतिस्पर्धा के सिद्धांत के विपरीत है।
- अदालती हस्तक्षेप की सीमा:
- न्यायालय के समक्ष सबसे बड़ा प्रक्रियात्मक प्रश्न यह है कि जब चुनाव प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, नामांकन पत्र दाखिल हो चुके हैं और प्रचार चल रहा है, तो क्या इस चरण पर चुनाव चिन्ह आवंटन को रद्द किया जा सकता है या चुनाव को टाला जा सकता है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) बनाम भारत निर्वाचन आयोग व अन्य [रिट याचिका – कलकत्ता उच्च न्यायालय]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (ISF) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता विकास रंजन भट्टाचार्य
- भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की ओर से: अधिवक्ता जिष्णु चौधरी
- तृणमूल कांग्रेस-डेमोक्रेटिक (प्रतिवादी) की ओर से: पैनल अधिवक्ता
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- चुनाव चिन्ह (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 (Election Symbols (Reservation and Allotment) Order, 1968) के पैरा 10B एवं पैरा 12
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार एवं मनमाने प्रशासनिक निर्णयों के विरुद्ध संरक्षण)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 324 (चुनाव आयोग का अधीक्षण, निर्देशन और निष्पक्ष चुनाव का दायित्व)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 329(b) (चुनावी मामलों में अदालतों के हस्तक्षेप पर सामान्य प्रतिबंध, चुनाव याचिका के माध्यम से चुनौती)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- मोहिंदर सिंह गिल बनाम मुख्य चुनाव आयुक्त (1978, सुप्रीम कोर्ट) — ‘अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग की शक्तियां अनियंत्रित नहीं हैं; प्रत्येक प्रशासनिक कार्यवाई को निष्पक्षता और प्राकृतिक न्याय की कसौटी पर खरा उतरना होगा।’
- एन.पी. पोन्नुस्वामी बनाम रिटर्निंग ऑफिसर (1952, सुप्रीम कोर्ट संविधान पीठ) — ‘चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद अदालतों द्वारा सामान्यतः हस्तक्षेप नहीं किया जाता, परंतु प्रक्रियागत घोर अवैधताओं के मामलों में संवैधानिक समीक्षा के द्वार खुले रहते हैं।’
- पीठ: न्यायमूर्ति कृष्णा राव (कलकत्ता उच्च न्यायालय)
- वर्तमान स्थिति: दोनों पक्षों की लंबी बहस पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित (Reserved); 6 अक्टूबर के मतदान से पूर्व अदालत का अंतिम आदेश आना प्रतीक्षित है।
EC Vs Party:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | कलकत्ता उच्च न्यायालय (Calcutta High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति कृष्णा राव (Justice Krishna Rao) |
| याचिकाकर्ता | इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF – नौशाद सिद्दीकी के नेतृत्व वाली पार्टी) |
| विवाद का केंद्र | ‘लिफाफा’ (Envelope) चुनाव चिह्न का TMC-D को आवंटन और ISF को ‘अलमारी’ चिह्न दिया जाना। |
| अदालत का फैसला | विस्तृत सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने अपना आदेश सुरक्षित (Reserved) रख लिया है। |

