अदालत में क्या हुआ?
- वकील का तर्क (तत्काल सुनवाई की मांग):सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत से अपील की कि मामले को 29 सितंबर की जगह 5 अक्टूबर को सूचीबद्ध दिखाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि ट्रिब्यूनल के समक्ष 18,000 से अधिक अपीलें लंबित हैं।
- ये वे लोग हैं जो SIR प्रक्रिया के कारण पहले विधानसभा चुनाव में मतदान नहीं कर पाए थे।
- यदि 6 अक्टूबर के उपचुनाव से पहले सुनवाई नहीं हुई, तो वे दूसरी बार भी मताधिकार से वंचित रह जाएंगे।
- CJI की टिप्पणी:जल्द सुनवाई के आग्रह पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा:“ये तो सिर्फ उपचुनाव हैं, बस इतनी सी बात है।” (“These are only by-elections, that’s all.”) पीठ ने सुनवाई की तारीख पहले करने से इनकार करते हुए केस को 5 अक्टूबर को ही सूचीबद्ध रखने का निर्देश दिया।
पृष्ठभूमि और आरटीआई (RTI) से सामने आए आंकड़े
- लाखों मतदाता प्रभावित: सुप्रीम कोर्ट के आदेश से गठित अपीलीय न्यायाधिकरणों के समक्ष लाखों लोगों की अपीलें लंबित हैं, जिनके नाम SIR के बाद मतदाता सूची से हटा दिए गए थे।
- RTI का खुलासा: हाल ही में पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय से मिली एक आरटीआई रिपोर्ट (कांग्रेस सांसद ईशा खान चौधरी द्वारा मांगी गई) के अनुसार:
- कुल दर्ज अपीलों में से 97.83% अपीलें अब भी लंबित हैं।
- जिन अपीलों का फैसला हुआ है, उनमें से 91.13% मामलों में मतदाताओं का नाम वापस जोड़ा गया, जिससे यह स्पष्ट होता है कि शुरुआत में बड़ी संख्या में पात्र लोगों के नाम गलत तरीके से हटाए गए थे।
नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के विशेष सघन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) के दौरान बाहर किए गए लाखों मतदाताओं की लंबित अपीलों के निपटारे और आगामी उपचुनावों में मताधिकार के प्रयोग से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तात्कालिक राहत देने से इनकार कर दिया है।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने मौखिक रूप से टिप्पणी करते हुए कहा कि “ये केवल उपचुनाव ही तो हैं, बस इतनी सी बात है” (“These are only by-elections, that’s all”). अदालत ने स्पष्ट किया कि मामले को पूर्व निर्धारित अनंतिम तिथि—5 अक्टूबर 2026—को ही कॉज लिस्ट में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा। शीर्ष अदालत ने 6 अक्टूबर 2026 को राज्य की दो महत्वपूर्ण विधानसभा सीटों—नंदीग्राम (Nandigram) और रेजीनगर (Rejinagar)—पर होने वाले उपचुनावों के दृष्टिगत मामले की सुनवाई 6 अक्टूबर से पहले (Advance) करने के वकीलों के विशेष अनुरोध को अस्वीकार कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष वकीलों की दलीलें और अदालत की टिप्पणी
1. ‘18,000 से अधिक अपीलें लंबित; लोग दूसरी बार वोट डालने से वंचित रह जाएंगे’ सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ताओं के वकील ने मामले को मेंशन करते हुए तत्काल सुनवाई की गुहार लगाई:
- वकील का पक्ष: वकील ने अदालत को अवगत कराया कि यह मामला पहले 29 सितंबर के लिए सूचीबद्ध था, लेकिन अब रजिस्ट्री के डिजिटल पोर्टल पर इसे 5 अक्टूबर के लिए टेंटेटिव (अनंतिम) रूप से दिखाया जा रहा है।
- वकील ने पीठ से आग्रह किया:“हम त्वरित निर्देश मांग रहे हैं ताकि इसे 5 अक्टूबर से पहले सूचीबद्ध किया जा सके। 18,000 से अधिक अपीलें ऐसी हैं जिनका अब तक निस्तारण नहीं किया गया है। ये वे नागरिक हैं जो आम विधानसभा चुनावों में भी वोट नहीं डाल पाए थे। यदि अभी सुनवाई नहीं हुई, तो यह दूसरा अवसर होगा जब ये लोग अपने मताधिकार से पूरी तरह वंचित रह जाएंगे।”
- सीजेआई सूर्यकांत की दो-टूक टिप्पणी: सीजेआई सूर्यकांत ने चुनाव के पैमाने को देखते हुए सुनवाई पहले करने से इनकार किया और कहा: “ये केवल उपचुनाव ही तो हैं, बस।” अदालत ने निर्देश दिया कि मामला 5 अक्टूबर को ही रोस्टर के अनुसार सुना जाएगा।
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पश्चिम बंगाल SIR का सांख्यिकीय संकट: RTI के चौंकाने वाले खुलासे
इस मामले में सबसे बड़ा विधिक और प्रशासनिक मुद्दा राज्य में अपीलीय अधिकरणों (Appellate Tribunals) की कछुआ गति है। कांग्रेस सांसद ईशा खान चौधरी द्वारा सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत मांगी गई जानकारी पर पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) कार्यालय द्वारा दिए गए आधिकारिक आंकड़ों ने चुनावी तंत्र की गंभीर विसंगतियों को उजागर किया है:
- कुल लंबित अपीलें (37.27 लाख से अधिक):
- 7 अगस्त 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, मतदाता सूची से बाहर किए गए नागरिकों द्वारा दायर लगभग 38 लाख (37,27,838) अपीलों में से 97.83% अपीलें अभी भी लंबित हैं।
- मार्च 2026 से अब तक केवल 2% अपीलों का ही निस्तारण हो सका है; यानी प्रत्येक 46 अपीलों में से केवल 1 अपील का ही फैसला हो पाया है।
- 91.13% अपीलों में नागरिक पाए गए वैध मतदाता:
- अब तक तय की गई अपीलों में से 75,443 मामलों में अधिकरणों ने मतदाताओं को सही पाया और उन्हें मतदाता सूची में शामिल करने का आदेश दिया, जबकि केवल 7,339 अपीलें खारिज हुईं।
- इसका सीधा अर्थ है कि जिन अपीलों का फैसला हुआ, उनमें से 91.13% अपीलकर्ता वास्तव में वैध भारतीय नागरिक और मतदाता थे।
- प्रशासनिक विफलता और अपीलों के लंबित रहने के कारण इन 75,000 से अधिक वैध मतदाताओं को 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा आम चुनावों में मतदान करने से अवैध रूप से वंचित रहना पड़ा था।

मामले की कानूनी पृष्ठभूमि: सुप्रीम कोर्ट का मई 2026 का ऐतिहासिक फैसला
यह पूरी कानूनी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट के उस पूर्ववर्ती आदेश से जुड़ी है जिसमें शीर्ष अदालत ने मतदाता सूची के शुद्धिकरण की प्रक्रिया को जारी रखने की अनुमति दी थी:
- SIR कराने का अधिकार बरकरार: मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के पास मतदाता सूचियों का विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) कराने का पूर्ण संवैधानिक अधिकार है।
- नागरिकता परीक्षण का सीमित दायरा: शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया था कि चुनाव आयोग किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता की जांच केवल इस सीमित उद्देश्य (Limited Purpose) के लिए कर सकता है कि उसका नाम मतदाता सूची में शामिल किया जाना चाहिए या नहीं।
- सक्षम प्राधिकारी को संदर्भ (Reference): यदि आयोग संतुष्ट नहीं होता है कि कोई व्यक्ति मतदाता बनने की वैधानिक शर्तें पूरी करता है, तो वह ऐसे मामलों को कानून के अनुसार अंतिम निर्णय हेतु केंद्र सरकार के सक्षम प्राधिकारी (Competent Authority) को संदर्भित कर सकता है।
- अपीलीय अधिकरणों का गठन: सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ही बाहर किए गए मतदाताओं की शिकायतों के निपटारे के लिए न्यायिक अधिकारियों की अध्यक्षता में अपीलीय अधिकरण गठित किए गए थे, लेकिन बुनियादी ढांचे और कर्मियों की कमी के चलते लाखों अपीलें आज भी अनसुलझी पड़ी हैं।
विधिक एवं संवैधानिक प्रभाव
- अनुच्छेद 326 (वयस्क मताधिकार): संविधान के तहत प्रत्येक बालिग नागरिक को चुनाव में वोट देने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। जब 91% से अधिक मामलों में अपीलकर्ता सही पाए जा रहे हों, तो अपीलों के निपटारे में अत्यधिक विलंब लाखों वास्तविक नागरिकों को उनके सबसे मौलिक लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित करता है।
- उपचुनाव का महत्व: यद्यपि शीर्ष अदालत ने प्रशासनिक दृष्टिकोण से इसे ‘केवल उपचुनाव’ माना, परंतु नंदीग्राम जैसी राजनीतिक रूप से संवेदनशील सीट पर हजारों मतदाताओं का बाहर रहना चुनावी परिणामों की निष्पक्षता और प्रतिनिधित्व के सिद्धांत पर सीधा असर डालता है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: पश्चिम बंगाल विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) अपीलीय अधिकरण मामला [विशेष अनुमति याचिका / विविध आवेदन – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- प्रासंगिक कानून एवं संवैधानिक प्रावधान:
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 326 (लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं के लिए वयस्क मताधिकार)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 324 (चुनाव आयोग द्वारा निर्वाचक नामावलियों की तैयारी का अधीक्षण व नियंत्रण)
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21, 22 एवं 24 (निर्वाचक नामावलियों का पुनरीक्षण और अपीलीय प्रक्रिया)
- निर्वाचकों का रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 (Registration of Electors Rules, 1960)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- लक्ष्मी चरण सेन बनाम ए.के.एम. हसन उज्जामन (1985, सुप्रीम कोर्ट संविधान पीठ) — ‘मतदाता सूचियों में संशोधन या पुनरीक्षण की प्रक्रिया चुनावी कैलेंडर को अनिश्चितकाल के लिए नहीं रोक सकती, परंतु पात्र नागरिकों को मताधिकार से वंचित होने से बचाने के लिए अपीलीय तंत्र का त्वरित कार्य करना अनिवार्य है।’
- इंद्रजीत बरुआ बनाम चुनाव आयोग (सुप्रीम कोर्ट) — ‘चुनावी प्रक्रिया शुरू होने के बाद अंतिम क्षणों में मतदाता सूची के विवादों पर अदालतें सामान्यतः स्थगन देने से बचती हैं।’
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना (सर्वोच्च न्यायालय)
- अंतिम आदेश: उपचुनावों के मद्देनजर सुनवाई पहले करने की अर्जी खारिज; मामला पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 5 अक्टूबर 2026 को ही सुनवाई हेतु सूचीबद्ध रहेगा।
West Bengal Election: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | CJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना |
| उपचुनाव क्षेत्र | पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटें (6 अक्टूबर 2026) |
| मुख्य मुद्दा | मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के खिलाफ लंबित 18,000+ अपीलों का समय पर निपटारा न होना। |
| अदालत का फैसला | पूर्व-निर्धारित तारीख 5 अक्टूबर 2026 को ही होगी सुनवाई; तारीख पहले खिसकाने से इनकार। |

