प्रमुख कानूनी विवाद और अदालती टिप्पणियां (Key Highlights)
- सॉफ्टवेयर की खामी और प्रशासनिक विवशता पर नाराजगी:
- ECI के सॉफ्टवेयर के तहत, यदि कोई मतदाता अपने पुराने पते पर गणना फॉर्म (Enumeration Form) जमा नहीं करता, तो ड्राफ्ट रोल से उसका नाम अस्थायी रूप से हट जाता है। इसके बाद जब वह पते के बदलाव के लिए फॉर्म 8 भरता है, तो पोर्टल इसे “सिस्टम ग्लिच” या ड्राफ्ट रोल में नाम न होने का हवाला देकर खारिज कर देता है।
- कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा:“यह आपके सॉफ्टवेयर की समस्या है। क्या आप सोच सकते हैं कि इस तरह से कितने मतदाता सूची से बाहर हो जाएंगे? आप किसी को गलत/झूठा घोषणापत्र भरने या नया फॉर्म 6 भरने के लिए कैसे मजबूर कर सकते हैं जब वह पहले से पंजीकृत मतदाता है?”
- खारिज करने के बजाय लंबित (Abeyance) रखने का सुझाव:पीठ ने कहा कि पुराने पते को खाली करने वाले मतदाता नए पते पर ‘फॉर्म 8’ भरकर खुद अपनी सही जानकारी दे रहे हैं। ECI को ऐसे आवेदनों को तुरंत खारिज करने के बजाय प्रक्रिया पूरी होने तक लंबित रखना चाहिए ताकि कोई नागरिक मतदान से वंचित न रहे।
- जनभावना और कानून की सीमा पर ECI को फटकार:
- जब ECI के वकील ने चुनाव प्रक्रिया में ‘सार्वजनिक धारणा’ (Public Perception) और व्यवस्था का हवाला दिया, तो कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अदालतें जनभावना से नहीं बल्कि कड़े कानूनी प्रावधानों से चलती हैं।
- जज ने कहा: “हमारे बारे में जनता क्या सोचती है, यह अप्रासंगिक है। हम यहाँ अदालत में कानून की व्याख्या कर रहे हैं।”
- सुनवाई के बिना नाम हटाने पर रोक:हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल ड्राफ्ट रोल के आधार पर या सॉफ्टवेयर रिजेक्शन के कारण किसी भी नागरिक का नाम बिना उचित सुनवाई दिए मतदाता सूची से नहीं हटाया जा सकता।
पणजी (गोवा): भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) के दौरान अपनाए जा रहे तकनीकी सॉफ्टवेयर प्रोटोकॉल, स्थान बदलने वाले (Shifted) वैध मतदाताओं के फॉर्म 8 के स्वतः निरस्तीकरण (Automated Rejection) और जनप्रतिनिधित्व कानून के वैधानिक प्रावधानों की अनदेखी पर बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ ने कड़ा रुख अपनाया है।
न्यायमूर्ति वाल्मीकि मेनेजेस और न्यायमूर्ति अमित जामसांडेकर की खंडपीठ ने गोवा के सांताक्रूज विधानसभा क्षेत्र में एक ही परिवार के सदस्यों के नाम मतदाता सूची से हटाने और उनके फॉर्म 8 को पोर्टल द्वारा खारिज किए जाने की चुनौती पर सुनवाई करते हुए यह गंभीर टिप्पणियां कीं। अदालत ने साफ कहा कि कोई भी प्रशासनिक सॉफ्टवेयर या चुनाव आयोग की गाइडलाइंस संसद द्वारा पारित मूल अधिनियम और निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियमावली को निलंबित नहीं कर सकती। उच्च न्यायालय ने कहा कि चुनाव आयोग की मौजूदा प्रक्रिया गैर-निवासियों के नाम हटाने में तो सफल हो रही है, परंतु नए पते पर स्थानांतरित नागरिकों को मतदाता सूची में बनाए रखने के अपने मुख्य संवैधानिक उद्देश्य को पूरी तरह विफल कर रही है।
नागरिक वोट डालें और इस मकसद को दरकिनार नहीं कर सकते: हाई कोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा बेंच ने एसआईआर के दौरान फॉर्म 8 खारिज करने पर चुनाव आयोग को जमकर फटकार लगाई। जस्टिस वाल्मिकी मेनेजेस और जस्टिस अमित एस जमसांडेकर की बेंच ने कहा- आयोग का मुख्य मकसद यह सुनिश्चित करना है कि नागरिक वोट डालें और इस मकसद को दरकिनार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने टिप्पणी की कि एसआईआर प्रक्रिया परेशान करने वाली है। इसने पूरी व्यवस्था दरकिनार कर रखी है। यह कहती है कि सभी कानून भूल जाओ। सॉफ्टवेयर का पालन करो। ऐसा नहीं हो सकता।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘सॉफ्टवेयर के कारण मौजूदा मतदाता नए नहीं बन जाते’
सुनवाई के दौरान जब यह तथ्य सामने आया कि सिस्टम ग्लिच के कारण अधिकारियों ने फॉर्म 8 खारिज कर नए सिरे से फॉर्म 6 (नया मतदाता) भरने को कहा, तो पीठ ने तीखा सवाल किया: “वह कभी भी नया मतदाता नहीं था। वह पहले से मौजूद एक वैध मतदाता था। वह केवल आपके सॉफ्टवेयर सिस्टम के लिए नया बन गया! अधिकारियों ने फॉर्म 8 को खारिज करने के आदेश में ‘सिस्टम ग्लिच’ (System Glitch) दर्ज कर दिया, जिससे जाहिर होता है कि पोर्टल अधिकारियों को इसे खारिज करने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं दे रहा था। क्या अधिकारी सॉफ्टवेयर के आगे पूरी तरह लाचार हो गए हैं? जब फॉर्म 8 आता है, तो अधिकारी को अपना न्यायिक विवेक लागू करना चाहिए कि क्या संबंधित व्यक्ति वास्तव में स्थानांतरित हुआ है। कानून सॉफ्टवेयर के पीछे नहीं चल सकता।”
2. ‘जनता क्या सोचती है, अदालत में यह अप्रासंगिक है; यहां केवल कानून चलेगा’
चुनाव आयोग के वकील द्वारा यह दलील दिए जाने पर कि मतदाता सूची पुनरीक्षण से जनता में चुनावी प्रक्रिया के प्रति विश्वास (Public Confidence) बढ़ता है, खंडपीठ ने आयोग को फटकार लगाते हुए कहा: “जनता हम सभी के बारे में क्या सोचती है, यह पूरी तरह अप्रासंगिक (Immaterial) है। हम यहां अदालत में बैठे हैं और कानूनी प्रावधानों पर फैसला कर रहे हैं। किसी भी प्रशासनिक व्यवस्था या जनभावना को वैधानिक प्रावधानों को दरकिनार (Bypass) करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।”
3. बिना व्यक्तिगत सुनवाई (Hearing) के नाम काटना कानून के खिलाफ:
- खंडपीठ ने चुनाव आयोग से पूछा कि अधिनियम का कौन सा प्रावधान आयोग को बिना प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) और बिना सुनवाई का अवसर दिए मतदाता सूची से नाम काटने की शक्ति देता है:“हमें अधिनियम में वह प्रावधान दिखाइए जो आपको बिना किसी सुनवाई के नागरिकों के नाम मतदाता सूची से हटाने का अधिकार देता हो? चुनाव आयोग का पूरा उद्देश्य नागरिकों को मतदान का अधिकार सुनिश्चित कराना है, न कि तकनीकी खामियों के बहाने लाखों लोगों को मतदाता सूची से बाहर धकेलना।”
क्या है SIR का विवाद और ‘फॉर्म 8’ का तकनीकी पेच?
- SIR की वर्तमान कार्यप्रणाली:
- स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत बूथ लेवल अधिकारी (BLO) घर-घर जाकर पूर्व मतदाता डेटाबेस से पहले से भरे हुए प्रगणक फॉर्म (Pre-filled Enumeration Forms) वितरित करते हैं।
- यदि कोई मतदाता अपना पुराना घर छोड़कर उसी क्षेत्र या नए पते पर चला गया है और पुराने पते पर प्रगणक फॉर्म जमा नहीं कर पाता, तो आयोग का सिस्टम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से उसका नाम अस्थायी रूप से हटा देता है।
- झूठी घोषणा के लिए विवश करने की विसंगति:
- जब स्थानांतरित मतदाता अपने नए पते पर पंजीकरण के लिए फॉर्म 8 (पते में परिवर्तन / सुधार हेतु वैधानिक फॉर्म) भरता है, तो आयोग का ई-पोर्टल और निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) इसे स्वतः खारिज कर देते हैं।
- आयोग का तर्क है कि फॉर्म 8 तभी स्वीकार हो सकता है जब ड्राफ्ट सूची में पुराने पते पर नाम सक्रिय हो। यदि नाम हट गया है, तो मतदाता को नए मतदाता की तरह फॉर्म 6 भरना होगा।
- अदालत का ऐतराज: पीठ ने कहा कि यह व्यवस्था स्थानांतरित मतदाता को अपने पुराने पते के फॉर्म पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य करती है, जो कि एक तरह से उससे झूठी घोषणा (False Declaration) कराने जैसा है, क्योंकि वह अब वहां रह ही नहीं रहा है।
अदालत के समक्ष चुनाव आयोग की दलीलें
- आयोग की ओर से अधिवक्ता गौरेश अग्नि ने सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों का हवाला दिया जिनमें बिहार में अतीत में हुए एसआईआर अभियानों को वैध ठहराया गया था।
- उन्होंने दलील दी कि संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करने के लिए व्यापक अधीक्षण और पर्यवेक्षी शक्तियां देता है।
- आयोग ने दलील दी कि यदि कोई मतदाता वर्षों तक अपने पते के बदलाव की सूचना नहीं देता, तो वह सीधे फॉर्म 8 की मांग नहीं कर सकता जबकि उसके पास फॉर्म 6 भरने का विकल्प खुला है।
- इस पर अदालत ने पलटवार करते हुए कहा कि ऐसे हजारों-लाखों नागरिक हो सकते हैं जो पुराने पते पर प्रगणक फॉर्म साइन नहीं करेंगे क्योंकि वे वहां से शिफ्ट हो चुके हैं। ऐसे में आयोग को फॉर्म 8 को खारिज करने के बजाय उसे लंबित (Abeyance) रखकर अंतिम सूची तैयार करते समय समाहित करना चाहिए।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: परेश सालगांवकर व अन्य बनाम गोवा राज्य व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – बॉम्बे उच्च न्यायालय, पणजी पीठ]
- पीठ: न्यायमूर्ति वाल्मीकि मेनेजेस और न्यायमूर्ति अमित जामसांडेकर
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ताओं की ओर से: निजी अधिवक्ता
- भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की ओर से: अधिवक्ता गौरेश अग्नि
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक नियमावली:
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (RPA, 1950) की धारा 22 (मतदाता सूची में प्रविष्टियों का सुधार/स्थानांतरण) एवं धारा 23
- निर्वाचकों का रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 (Registration of Electors Rules, 1960):
- नियम 13 (दावे और आपत्तियां प्रस्तुत करने की प्रक्रिया)
- नियम 21A (स्थानांतरित या मृत मतदाताओं के संबंध में विशेष प्रक्रिया व सुनवाई की बाध्यता)
- फॉर्म 6 (नए निर्वाचक के रूप में नाम शामिल कराने हेतु आवेदन)
- फॉर्म 8 (निवास परिवर्तन, मौजूदा प्रविष्टि में संशोधन और स्थानांतरण हेतु आवेदन)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 324 (चुनाव आयोग का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण) एवं अनुच्छेद 326 (वयस्क मताधिकार)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- प्रशासनिक दिशानिर्देश या आंतरिक सॉफ्टवेयर नियम संसद द्वारा पारित सांविधिक नियमों (Statutory Rules) को निष्प्रभावी नहीं कर सकते।
- किसी भी नागरिक के मताधिकार को बिना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किए प्रशासनिक आदेश से छीना नहीं जा सकता।
- वर्तमान स्थिति: मामले पर विस्तृत विधिक बहस जारी; आगे की सुनवाई सोमवार, 5 अक्टूबर 2026 को नियत।
Form Glitch: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | बॉम्बे हाईकोर्ट की गोवा पीठ (Bombay High Court at Goa) |
| पीठ | न्यायमूर्ति वाल्मीकि मेनेजिस एवं न्यायमूर्ति अमित जमसांडेकर |
| याचिकाकर्ता | परेश सालगांवकर और उनके परिवार के सदस्य (जिनके नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए) |
| मुख्य मुद्दा | SIR प्रक्रिया के तहत पुराने पते पर फॉर्म न मिलने पर नए पते का ‘फॉर्म 8’ ऑटोमेटेड सॉफ्टवेयर से खारिज होना। |
| अगली सुनवाई | 5 अक्टूबर (सोमवार) |

