प्रमुख विवाद और संवैधानिक प्रश्न (Key Issues)
- कपिल सिब्बल की आपत्ति और ‘शक्तियों के पृथक्करण’ (Separation of Powers) का मुद्दा:वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में खुलासा किया कि JPC की सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा न्यायाधीशों से मिलने की योजना थी। उन्होंने इसे देश के इतिहास में अभूतपूर्व और असंवैधानिक करार दिया:“यह संविधान का मजाक है। कोई संसदीय समिति रिपोर्ट तैयार करने से पहले कार्यरत न्यायाधीशों को किसी विधेयक पर ब्रीफ नहीं कर सकती। विधायिका का काम कानून बनाना है और न्यायपालिका उसकी संवैधानिक वैधता की समीक्षा करती है। यदि कल यह कानून बनता है, तो यही न्यायाधीश इसकी वैधता पर फैसला सुनाएंगे।”
- पूर्व न्यायाधीशों बनाम वर्तमान न्यायाधीशों से परामर्श:JPC इससे पहले कई पूर्व मुख्य न्यायाधीशों (Former CJIs), सेवानिवृत्त न्यायाधीशों और कानूनी विशेषज्ञों से परामर्श कर चुकी है। हालांकि, कार्यरत जजों (Sitting Judges) से चर्चा को लेकर विवाद खड़ा हो गया क्योंकि वे भविष्य में इस कानून से जुड़ी याचिकाओं पर निर्णय देने वाले संभावित जज हो सकते हैं।
- विपक्ष का रुख और बैठक का रद्द होना:संसदीय समिति में शामिल विपक्षी दलों के सदस्यों द्वारा आपत्ति जताए जाने और पी.पी. चौधरी को पत्र लिखे जाने के बाद समिति ने इस प्रस्तावित दौरे को रद्द करने का फैसला लिया।
नई दिल्ली: देश में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने से संबंधित ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ (One Nation, One Election) के संवैधानिक संशोधन विधेयकों का परीक्षण कर रही संयुक्त संसदीय समिति (JPC) और न्यायपालिका के बीच संभावित संवैधानिक टकराव के बीच एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है।
यह निर्णय विपक्षी दलों द्वारा उठाए गए गंभीर संवैधानिक आक्षेपों और वरिष्ठ अधिवक्ता व राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल द्वारा 6 अक्टूबर को प्रस्तावित इस बैठक को “पूरी तरह असंवैधानिक और संविधान के साथ मजाक” करार दिए जाने के बाद आया। पीटीआई (PTI) की रिपोर्ट के अनुसार, विपक्ष के तीखे विरोध और न्यायिक स्वतंत्रता व शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत के हनन की चिंताओं को देखते हुए जेपीसी ने शीर्ष अदालत के वर्तमान न्यायाधीशों से मिलने की अपनी योजना को पूरी तरह रद्द (Dropped) कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और शीर्ष अदालत के वर्तमान न्यायाधीशों (Sitting Judges) के साथ जेपीसी की कोई औपचारिक बैठक नहीं होगी।
संवैधानिक विवाद की जड़: क्या था प्रस्तावित कार्यक्रम और सिब्बल की आपत्तियां?
1. ‘भारतीय इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ; यह शक्तियों के पृथक्करण का खुला उल्लंघन है’: कपिल सिब्बल वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने एक विशेष प्रेस वार्ता में खुलासा किया था कि भाजपा सांसद पी.पी. चौधरी की अध्यक्षता वाली जेपीसी 6 अक्टूबर 2026 को सीजेआई और सुप्रीम कोर्ट के अन्य वर्तमान जजों के साथ विचार-विमर्श करने वाली थी। सिब्बल ने इस कदम पर कड़ा विरोध दर्ज करते हुए कहा: “अपनी रिपोर्ट को अंतिम रूप देने से पहले ही किसी प्रस्तावित विधेयक पर एक संसदीय समिति द्वारा शीर्ष अदालत के सिटिंग जजों को ब्रीफ करना भारतीय इतिहास में सर्वथा अभूतपूर्व और असंवैधानिक है। ऐसा स्वतंत्र भारत के न्यायिक और संसदीय इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। यह कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच संविधान के बुनियादी ढांचे में निहित ‘शक्तियों के पृथक्करण’ (Separation of Powers) के सिद्धांत पर सीधा प्रहार करता है। यह संविधान के साथ एक क्रूर मजाक (Joke on the Constitution) है।“
2. हितों का टकराव (Conflict of Interest) और न्यायिक समीक्षा का दायरा:
- सिब्बल ने संवैधानिक संतुलन को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया:
- संसद का कार्य कानून बनाना है और न्यायपालिका का काम संविधान के दायरे में उसकी वैधता और संवैधानिकता (Judicial Review) का परीक्षण करना है।
- यदि ये संविधान संशोधन विधेयक संसद द्वारा पारित होकर कानून का रूप लेते हैं, तो इन्हीं वर्तमान न्यायाधीशों को संविधान पीठ में बैठकर यह तय करना होगा कि क्या यह कानून संविधान के बुनियादी ढांचे (Basic Structure) का उल्लंघन करता है या नहीं।
- ऐसे में कानून बनने से पूर्व ही जजों के साथ विचार-विमर्श करना न्यायिक निष्पक्षता, हितों के टकराव और पूर्व-ग्रह (Pre-judging) का गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।
जेपीसी (JPC) का कार्यक्षेत्र और विचाराधीन विधेयक
भाजपा सांसद पी.पी. चौधरी की अध्यक्षता वाली 31-सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति संसद में पेश किए गए निम्नलिखित दो प्रमुख विधेयकों का परीक्षण कर रही है:
- संविधान (एक सौ उनतीसवां संशोधन) विधेयक, 2024 [Constitution (129th Amendment) Bill, 2024]: इसके तहत संविधान के अनुच्छेद 83 (संसद के सदनों की अवधि), अनुच्छेद 85 (सत्र एवं विघटन), अनुच्छेद 172 (विधानसभाओं की अवधि) और अनुच्छेद 174 में संशोधन कर एक साथ चुनाव कराने का वैधानिक ढांचा तैयार किया जाना प्रस्तावित है।
- केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024: केंद्र शासित प्रदेशों (जैसे दिल्ली, पुडुचेरी और जम्मू-कश्मीर) की विधानसभाओं के कार्यकाल को आम चुनावों के साथ समन्वयित करने से संबंधित।
- पूर्व परामर्श प्रक्रिया: समिति ने राजनीतिक दलों, मुख्य चुनाव आयुक्त, विभिन्न मुख्यमंत्रियों, संविधान विशेषज्ञों और राज्य विधिक आयोगों से व्यापक परामर्श किया है।
- पूर्व सीजेआई और सेवानिवृत्त जजों से चर्चा: जेपीसी ने खुलासा किया कि उसने एक साथ चुनावों के संवैधानिक प्रभावों पर भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीशों (Former CJIs) और सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट जजों से परामर्श किया है—जिस पर कोई आपत्ति नहीं थी। मुख्य आपत्ति केवल वर्तमान सेवारत न्यायाधीशों (Sitting Judges) को इस प्रक्रिया में शामिल करने को लेकर थी।
विधिक एवं संवैधानिक पहलू: क्यों संवेदनशील है ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’?
- संविधान का मूल ढांचा (Basic Structure Doctrine):
- केशवानंद भारती (1973) और एस.आर. बोम्मई (1994) के ऐतिहासिक निर्णयों के तहत ‘संघवाद’ (Federalism) और ‘लोकतंत्र’ संविधान के बुनियादी ढांचे का हिस्सा हैं।
- आलोचकों और कानूनी विशेषज्ञों का तर्क है कि राज्यों की विधानसभाओं के कार्यकाल को जबरन घटाना या बढ़ाना, सदनों का समयपूर्व विघटन और राज्यों की स्वायत्तता को सीमित करना संविधान के संघीय ढांचे को चुनौती देता है, जिसका अंतिम परीक्षण केवल सुप्रीम कोर्ट ही कर सकता है।
- शक्तियों का पृथक्करण और न्यायिक स्वतंत्रता:
- संविधान का अनुच्छेद 50 राज्य को न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग रखने का निर्देश देता है।
- किसी भी कानून के निर्माण की पूर्व-प्रक्रिया में वर्तमान न्यायाधीशों की औपचारिक भागीदारी न्यायपालिका की संस्थागत स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर सकती है।
विधिक विवरण
- विषय संदर्भ: एक राष्ट्र, एक चुनाव (One Nation, One Election) विधेयकों पर जेपीसी एवं न्यायपालिका के बीच परामर्श विवाद
- संबंधित विधायी निकाय: संयुक्त संसदीय समिति (JPC – अध्यक्ष: सांसद पी.पी. चौधरी)
- संबद्ध न्यायिक संस्था: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
- विचाराधीन प्रमुख विधेयक:
- संविधान (एक सौ उनतीसवां संशोधन) विधेयक, 2024
- संघ राज्य क्षेत्र विधि (संशोधन) विधेयक, 2024
- प्रासंगिक संवैधानिक प्रावधान:
- भारत का संविधान:
- अनुच्छेद 50 (कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण)
- अनुच्छेद 83 एवं 172 (लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं की सामान्य 5-वर्षीय अवधि)
- अनुच्छेद 85 एवं 174 (सदनों के सत्रावसान और समयपूर्व विघटन की राष्ट्रपति/राज्यपाल की शक्तियां)
- अनुच्छेद 324 (चुनाव आयोग का अधीक्षण, निदेशन एवं नियंत्रण)
- अनुच्छेद 368 (संविधान संशोधन की शक्ति एवं कम से कम 50% राज्यों के अनुसमर्थन की अनिवार्यता)
- भारत का संविधान:
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973, सुप्रीम कोर्ट 13-जज संविधान पीठ) — ‘संसद संविधान के किसी भी हिस्से में संशोधन कर सकती है, परंतु बुनियादी ढांचे (जिसमें संघवाद और शक्तियों का पृथक्करण शामिल है) को नष्ट नहीं कर सकती।’
- इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण (1975, सुप्रीम कोर्ट) — ‘शक्तियों का पृथक्करण और निष्पक्ष चुनावी प्रणाली संविधान की अपरिवर्तनीय आत्मा हैं।’
- सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ (NJAC केस, 2015) — ‘न्यायपालिका की स्वतंत्रता कानून के शासन की रक्षा के लिए गैर-परक्राम्य है।’
- वर्तमान स्थिति: जेपीसी द्वारा सुप्रीम कोर्ट के सिटिंग जजों से मिलने का प्रस्ताव औपचारिक रूप से वापस लिया गया; समिति अब पूर्व न्यायाधीशों, विशेषज्ञों और हितधारकों के साथ अपनी रिपोर्ट को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया जारी रखेगी।
Election Reform: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित विधेयक | संविधान (129वां संशोधन) विधेयक, 2024 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक, 2024 |
| संसदीय समिति (JPC) | पी.पी. चौधरी (भाजपा सांसद) की अध्यक्षता वाली संयुक्त संसदीय समिति |
| विवाद का कारण | JPC द्वारा 6 अक्टूबर को CJI और सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जजों के साथ चर्चा का प्रस्ताव। |
| सुप्रीम कोर्ट व JPC का रुख | बैठक का प्रस्ताव रद्द; कोर्ट ने कहा ऐसी कोई बैठक निर्धारित नहीं है। |

